बुधवार, 4 अगस्त 2021

पहली बार जब मैं घर से

 पहली बार जब मैं घर से सूट बूट में निकला या यूँ कहें कि जब पहली बार मैं सूट बूट पहना तो सभी मेरी बलाएं ले रहे थे, खुशी से नाँच गया रहे थे, सारे खुश थे। आज मैं वर्षो बाद एक बार फिर सूट-बूट में क्रीम, पाउडर सेंट मार कर घर से निकल रहा हूँ तो लोग हाय-हाय कर रहे हैं, जल रहे हैं मेरी सुन्दरता से, मेरे कद से मेरी प्रतिष्ठा से। जलें जलें जल कर राख हो जायेगें और कोई माननीय अटल बिहारी वाजपेई जी नहीं हैं वो जो जलने के बाद भी देशाटन का सपना पूरा हो जायेगा। भाजपाई लोटे में भर कर गली-गली घुमा देगें। इस लिए मत जलें और बंद आँखो से मुझे मेरी पूर्व प्रेमिका गजगमिनियाँ  के बाँहो में बाँह डाले, मेरी वाइफ होम की तरह शांति से घघरनियाँपुर रेलवे स्टेशन पर सफाई पखवाड़े का शुभारंभ करने जाते हुए देखें जिसका निमंत्रण मेरे बाबू जी के बाबू जी के समधियाने में समधी के लड़के के दोस्त के चाचा का भांजां घघरनियाँपुर रेलवे स्टेशन पर स्टेशन मास्टर हो कर आये साधू बाबा ने मुझें बहुत बहुत बहुत बड़ा साहित्यकार समझते हुए भेजा है। इसी लिए कल से मेरा कालर टाइट है।  हम तो तय समय से पहले ही स्टेशन पहुँच जाते मगर कीड़े-पड़े सफाईकर्मियों को जो सुबह होने से पहले झाडू लगाने आते ही नहीं, पूरा स्टेशन दुर्गंध युक्त रहता है। चुप चाप इतंजार कर रहे थे,  ये ससुरी घड़ी भी आज दस बजाने में घंटो ले रही थी। मेरा और मेरी गजगमिनियाँ के मेकप की सफाई भाष्कर की तेज किरणें अभी से करने लगी थी।  अचानक मेरा चेहरा खिल उठा, सैकड़ो का काफिला आता दिखा। मेरा भी सीना चौड़ा हो गया लेकिन 56 इंच का नहीं, क्योकि मोदी जी 56 इंच शब्द का जो हाल किया, यह शब्द ही धरने पर बैठ गया। मैं सीना ताने गजगमिनियाँ की हाथ हाथ में लिए खुली जीप में बैठ गया। क्या जलवा था?  जगह जगह स्वागत। मैं भी चेहरे पर गंम्भीरता का लबादा ओढ़े स्टेशन कैंपस में दाखिल हुआ। बेजोड़ स्वागत हुआ।  एसी से आती ठंडी हवा और शिवगति साह के रसोगुल्ले की मौजूदगी में दिव्य नास्ता हुआ, अभी मेरी गजगमिनियाँ ने मात्र 10-12 ही गले के नीचे उतारे थे कि मजधरूआ पोर्टर आकर बतलाया कि सारी तैयारी हो गई।
मैं तो खुशी से पगलाय गया, मगर ऊ कहते हैं न कि मन के भाव को मन में रहने देना चाहिए, वही किया, बेखर अंजान सा सुनता रहता रहा, तभी प्रिंस बाबू आये और बड़ी सालीनता से हमें लौह पथ गामिनी विश्राम स्थल संख्या एक पर चलने का निवेदन करने
लगे। मैने भी एक अदद अंगडाई लिया, एक घूँट पानी पीया और चल दिया, आगे आगे रेलवे स्टाफ, मेरे दलबदलू दल के कार्यकर्ता बीच में मैं।  हम लोग  प्लेटफार्म पर स्थित सफाई अभियान प्रारंभ स्थल पर पहुँच चुके थे जहाँ शानदार सजे हुए कुछ आप के  चुनाव चिन्ह जिन्हें मजबूरी में हाथ से क्या दिल से भी लगाना पड़ा रहा रखे हुए थे और दो बाल्टी कुछ कागज के टुकड़े, कुछ प्लास्टिक, कुछ पत्ते, चाय-पानी के गिलास भरे हुए थे। हम लोगो के पहुँचते ही जिन्दाबाद जिन्दाबाद के नारे शुरू हो गये, मोदी जी जिन्दाबाद होने लगे। उनके सपने को मूर्ति रूप देने के लिए दोनो बाल्टीयों में रखे स्वच्छ और निर्मल कूड़े प्लेटफारम के टाइल्स लगे जगह पर उलाट दिये गये। अब वह कूड़ा मेरै, गजगमिनियाँ, और अन्य लोगो के बीच फुटबाल बनता हुआ बड़े शान से कैमरो में कैद हो रहा था, निगाहे कूड़े पर कम कैमरे पर अधिक थी। दस मिनट  कूडा-कूड़ा खेलते खेलते कैमरो के फ्लैश चमकना बंद होने लगे तब  केजरीवाल के चुनाव चिन्ह को हम लोगो ने  मोदी जी के मंदिर और 370 के वादे की तरह हाथो से मुक्त कर दिया।  अब जोशीले अदांज में लोगो ने मेरी और मैने मोदी जी और स्वच्छता पर फरकट गुरूजी से लिखवाया भाषा जो महीनो से रट रट कर याद किया था दिया। अब बोलने की बारी मैरी गजगमिनियाँ की आने वाली थी,  लेकिन मैं क्या जानता था कि यहाँ भी रमेशाहानाथ मुझसे दुश्मनी निकालेगें।
एक श्याम-स्वेत बालक पीछे से आकर मेरी गजगमिनियाँ के दुपट्टे को खीचने लगा, अभी मैं उस पर अपने क्रोध को प्रकट करने वाला ही था कि मेरी गजगमिनियाँ बैठ कर उसे बात करने लगी और उसके साथ चल दी। अब मेरी कहाँ औकात कि उसके पीछे न जाऊँ। चल दिया उसके पीछे -पीछे। वह दोनो आगे आगे मैं पीछे और पूरा दलबदलू दल पीछे पीछे। यह काफिला उसी प्लेटफार्म के पीछे बने एक शौचालय पर रूका।  तेज दुर्गंध से नाके फटी जा रही थी , हम सभी तेजी से वहाँ से नाके बंद किये आगे निकलना चाहते थे, मगर यह क्या गजगमिनियाँ तो वही रूक गई। इसके पहले कोई कुछ समझ पाता मेरी गजगमिनियाँ ने वहाँ मौजूद सभी के हाथो में दुबारा केजरीवाल का चुनाव चिन्ह पकड़ा दिया। मगर यह क्या? पीछे की भीड़ के हिस्सा फोटोग्राफर, मीडिया कर्मी,  समाजसेवी, अधिकारी सब फरार हो चुके थे। मैं बेचारा गहमरी फँस चुका था। गजगमिनियाँ की चरण पादुका प्रयोग के डर से शौचालय साफ कर रहा था और अब वह दूर खड़ी मीडिया के सामने सफाई के महत्व को बताते हुऐ बार बार मेरी तरफ ईशारे कर रही थी। जैसे तैसे शौचालय सफाई का काम पूरा हुआ।  मैं उसके पास आया, सभी नाके भकौड़ रहे थे। कुछ फ्लैश चमका रहे थे जिनके कैमरे का रूख मेरी तरफ कम गजगमिनियाँ की तरफ अधिक था। मेरे सूट बूट मोदी के वादे की तरह बेवफा हो चुके थे। फिर मैं गजगमिनियाँ की तारीफ में कसीदे पढ़ते कि उसने सही राह दिखाई, मीडिया के सामने आँखो में आये अश्को को छुपाते हुए मोदी की पेट्रोल की कीमतो में कमी करने की कसमें वादे की तरह हमेशा ऐसे ही जरूरमंद जगहो की सफाई करने  कसम की कसम खा रहा था। सफाई के महत्व का गुण गा रहा था और अपनी पूर्व प्रेमिका गजगमिनियाँ को मुस्कुराते हुए देख रहा था।
जय सफाई, जय कैमरा, जय मीडिया और जय सोशलमीडिया।

अखंड गहमरी

बाजार की गलियों तक

 
सोशलमीडिया से लेकर बाजार की गलियाँ, सरकारी और गैर सरकारी प्रतिष्ठानो में बड़ी रौनक थी। मेरी पूर्व प्रेमिका गजगमिनियाँ भी बड़ी खुश थी, उसके तो पाँव जमीन पर पड़ ही नहीं रहे थे। पहली बार उसने समाज को काँव-काँव कर बता रही थी कि वह मुझे जानती है। मेरी प्रेमिका मेरी प्रेयसी है। शायद उसे भारत में एक पखवारे के अंदर लगभग 100 करोड़ रूपये के व्यवसाय में से लाख रूपये गटकने का तरीका पता चल गया था। मारीशस से लेकर भारत की गलियों तक वह चीख-चीख कर कौवे जैसी आवाज में उस पखवाड़े की तारीफ करती उसकी शान में अपनी टूटी फूटी जानकारी देती और अंत में प्यार से अपना पर्स खोलती एक लिफाफा अंदर कर चल देती। हाँ मौका मिलते ही अपने कथन और पखवाड़ा भूल कर मुझे मोबाइल पर  Hi Dear My Sweet Heart I love. Good night sweet dream  कहना नहीं भूलती। मैं तो बस सुनता ही रहता क्योंकि मोदी, गजगमिनियाँ और अपनी वाइफ होम के आगे विरोध करने का साहस मुझ में नहीं था।
मैं तो पागल दिल्ली से दौलताबाद घूमता रहता, मगर हर जगह पखवारे के समारोह को बाद ही कोई इसके तरफ ध्यान नहीं देता। वैसे हीआज गजगमिनियाँ ने शाम मेरे साथ गुजारने का वादा किया था, मगर उसका वादा मोदी के वादे की तरह हवा-हवाई निकलना। शाम से रात हो गई  हो गई उसका पता नहीं चला। मैं उदास उस हाल के बाहर बैठा था जहाँ से आज दिन भर उसकी आवाज में हिन्दी को भीगँते देखा, तभी मेरी नज़र सामने उठ गई , देखा कि मेरी एक और पूर्व प्रेमिका मजगमिनियाँ हाफ्ते हुए भागी आ रही है। मुझे देखते ही अपने चरण-दास को निकाल बड़े ही बोली ''अरे गहमरीया तू पागल हो गईल बाड़े का रे, तोरा के कहा कहा खोजली अ तू एइजा मूअत बाड़े, चल हमरा संगे''।
मैं कुछ समझ पाता इससे पहले ही वो मेरा हाथ पकड़ कर पास खड़ी टैक्सी में खींच लिया। टैक्सी कहाँ जायेगी? मुझे क्या करना है कुछ पता नहीं। 10 मिनट के बाद वह एक बड़े मकान के सामने रूकी जहाँ काफी रौनक थी। बाहर बड़े बड़े अच्छरो में बोर्ड लगा था, Welcome To Hindi Divas. गाडी रूकते ही वह मुझे खीच कर अंदर ले गई जहाँ एक आदमी आधी हिन्दी आधी अँग्रेजी में हिन्दी भाषा के प्रयोग का महत्व समझाते हुए हिन्दी का प्रयोग करने और कराने की बात कह रहा था।  मैं बोलते हुए आदमी को पहचानने की कोशिश कर रहा था मगर याद नहीं आ रहा था कहाँ देखा है। अचानक दिमाग में बिजली कौंधी यह तो वही आदमी था बिहरनिया बैंक का मैनेजर एतवरूआ था जो एक दिन मेरे हिन्दी में भरे फार्म को लेने से इन्कार कर दिया और मुझे जाहिल अनपढ़ बता रहा था, अँग्रेजी सीखने की सलाह दे रहा था।  तब तक मेरी प्रेमिका मुझे मंच पर लेकर पहुँच चुकी थी। उसने माइक सीधे माइक लेते हुए और लेते क्या छीनते हुए मेरे शान में बोलना शुरू किया। आज पहली बार उसके मुहँ से पागल, उल्लू, सनकी, दिलजले शब्द को छोड़ तारीफ के शब्द सुन कर मेरा सीना चौड़ा हो गया । मैं अब अपने सीने को 56 इंच का नहीं कहता क्योंकि अकसर 56 इंच का सीना बताने वालो का सीना 5-6 इंच भी नहीं रह जाता है। खैर मैं अभी अपने विचारो में मग्न था कि तालीयों की जोरदार आवाज सुनाई दी और मेरी मजगमिनियाँ ने हिन्दी दिवस पर बोलने के लिए माईक मूझे थमा दिया।
अब मैं क्या बोलता हिन्दी और हिन्दी दिवस पर जब हिन्दी खुद असहाय हो गई है अपने ही देश में, हिन्दी तो उस वाइफ होम की भाँति हो गई है जिसे हम साल में एक बार सजा-सवरा कर निकालते हैं, उसे खिलाते -पिलाते, घुमाते हैं, उसकी तारीफ  करते है, उसके साथ जीने मरने की कसमें खाते हैं, लाखो क्या करोडों के वारे-न्यारे करते है, फिर ढ़केल देते हैं उसी काल कठोरी में और अपनी फैशनेबुल प्रेमिका अंग्रेजी के साथ पूरे 350 दिन ऐश करते हैं।
मैनै तो मन की बात करना तब से छोड़ दिया जब से मन की बात  बदलने लगी। मगर इतना तो मन से मन कहने लगा कि जिस देश में आज तक हिन्दी को पूरे भारत में अनिवार्य नहीं कर सके, हिन्दी कामकाज को सम्मान नहीं दे सके , उस देश में हम राम मंदिर बनने, धारा 370 और आरक्षण हटने जैसे कभी न पूरे होने वाले सपनो की तरह विश्व भाषा बनाने चले हैं।
फिर भी अपनी मजगमिनियाँ को खुश करने के लिए कुछ तो बोलना ही था मैनें उसे अपने पास खींचा, उसकी आँखो में आँखे डाल कर हिन्दी पर बोलना शुरू किया  My Dear gentleman... तभी सामने देखा मेरी पूर्व प्रेमिका गजगमिनियाँ आती दिखाई दी। अब भारत-पाक जैसे युद्ध के हालात होने वाले थे और मैं चीख चीख कर हिन्दी दिवस पर बोले जा रहा था ताकि बम की आवाज से बचा जाये।नहीं तो आज हिन्दी दिवस के खत्म होते होते मेरे काले धने मुलायम बाल भी खत्म होकर हिन्दी की तरह बेचारे हो जायेगें।

अखंड गहमरी,

लतीफेबाज गहमरी

 
आज बैठे बिठाये लतीफों की तरफ ध्यान चला गया। लतीफा,जोक,चुटकुला और न जाने कितने और नाम होगें और इसकी परिभाषा क्या होगी यह तो कोई साहित्यकार या अध्यापक ही बता सकता है, मगर मैं इतना जरूर बता सकता हूँ कि आज जो इसका रूप मेरे समाज में उभर कर आया है ये मेरा किया-धरा है।
मैने लतीफों को केवल एक उद्वेश्‍य पूर्ति का साधन बना कर रख दिया है। सॉंप भी मर जाये लाठी भी न टूटे। अब मैं लतीफे कभी हसाँने के नहीं लिखता, गुददुदाने के लिए नहीं लिखता, मैं तो लतीफो के शक्‍ल में प्रहार करता हूँ हिन्‍दू धर्म पर, सम्‍मानित रिश्‍तों पर, भारत की सभ्‍यता संस्‍कृत पर, पति-प‍त्‍नी, गुरू- श्‍ािष्‍य के रिश्‍तो पर। करूँ भी तो क्‍यों नहीं करूँ, लोग ताली बजाते है, एक दूसरे को भेजते हैं, भले नाम मेरा नहीं आता मगर मेरे विचार तो सब तक पहुँच जाते ही है, तो मैं सफल हो जाता हूँ अपने मकसद में।  किसी को बुरा भी नहीं लगता और मेरी बात भारत ही नहीं वरण पूरे विश्‍व में फैल गई।
हाँ लतीफे मैं मंचो से भी पढ़ता हूँ, कविता के नाम पर परोसता हूँ। परोसें भी क्यों नही? जब उद्देश्य पूर्ति के लिए लिखी गई दो कौड़ी के लतीफे जब मंच पर ताली, माला और दाम दिलातें हैं तो मैं लाखो की कविता क्यो बर्बाद करूँ?  मैं पागल थोडे हूँ कि जिससे आयोजक, संयोजक, साक्षात देवता स्वरूप श्रोता खुश हो रहे हो उसे बंद कर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारूँ।
ऐसा नहीं है कि सभी को मेरी यह करतूत अच्छी लगती है, कुछ लोग है जिनको नागवार लगती है, मगर बेचारे करे तो क्या? किसका गला पकड़े? भेजने वाले का तो पता है मगर लिखने वाले का तो पता नही? पता चल भी गया तो जब मेरे गले में फूलो का हार हैं तो वह चाह कर भी जूतो का हार मेरे गले म़े नहीं डाल सकते। थक- हार कर विरोध लिखेगें, तो लिखो न भाई विरोध किसने मना किया है। मेरे जैसे लिखने और सोचने वाले तो लाखो हैं और तुम मुट्ठी भर लोग क्या कर लोगे, कितने साथ देगे़ं तुम्हारा? अब ये मत कोई समझे कि हाथी को चीटी सूढ़ में घुस कर मार सकती है। न अब वो चीटी है न अब वो हाथी। लाज-शर्म और संस्कारो की दुहाई देकर भी तुम मुझको मना नही सकते क्योकि मैं लाज-शर्म, संस्कार सब शर्बत बना कर पी चुका हूँ। रिश्तों की अहमियत, मान-मर्यादा सब चुल्हे में भस्म कर चुका हूँ। जानते हैं क्यों?
क्योकि मेरा उद्देश्य ही है, सस्ती लोकप्रियता, हिन्दू धर्म को नीचा दिखा कर महान सेकुलर बनना। मेरा उद्देश्य है गुरु-शिष्य, पति-पत्नी के संबंधो और मर्यादा को तार-तार करना।
तो बताओ क्या होगा मेरा..कुछ नही न...तो बजाओ ताली मेरे नाम पर। महान लतीफेबाज अखंड गहमरी के नाम पर।।
जय अखंड गहमरी, जय लतीफा।
अखंड गहमरी।।

आदरणीय इन्‍द्रदेव जी

 आदरणीय इंद्र देव जी
आपके चरणों में अखंड गहमरी का कोटि कोटि प्रणाम।
हम सब पृथ्वीलोक वासी आपके राज्य में सुखी  हैं आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आप भी स्वस्थ, सुखी होगें।
वैसे लगता है कि या तो आप की मानसिक स्थिति कुछ ठीक नहीं या फिर आप पर तुलसी दास जी की समरथ के नहीं दोष गोसाई बात को प्रमाणित कर रहे हैं या फिर लगता है कि आप ने भी अपने गुप्तचरों की नियुक्तियां आरक्षण पद्धति के आधार पर कर दी है जो आपको सत्य रिपोर्ट नहीं दे पा रहे हैं। यदि आपकी मानसिक स्थित ठीक नही हैं तो आप गाजीपुर आ जायें यहाँ डा. राजेश सिंह बिना आरक्षण वाले हैं वह आपका सही इलाज कर देगें,क्योंकि जो अंक वह पाये हैं वह असली है। मुझे इन तीन बिंदुओं पर इस लिए प्रकाश डालना पड़ रहा है क्योंकि लगता है आप भी हमारी सरकार की तरह तुष्टिकरण की नीति अपनाये हैं। अमीरो द्वारा किये जा रहें प्रर्यावरण के दोहन की सज़ा आप भारत में राजनीत की धुरी कहे जाने वाले किसानो और मजदूरो को दे रहे हैं।
आप ने जिस पर बैशाख माह को सावन भादो बना दिया है बेचारे किसान मजदूरों का तो जीवन ही बर्बाद होने के कागार पर है। आपको भी लग रहा होगा कि इस लाकडाउन में अखंड गहमरी शराब कहाँ से पा गया ? जो बहकी बहकी बातें कर रहा है। इंद्र देव जी लाकडाउन तो अमीरो , सेलीब्रेटीयों और नेताओं के हाथ की कठपुतली है जैसे चाहा नचा दिया। किसानो और मजदूर तो नियमों के मार खा करती अपने थाली में  एक दाने अन्न को तरसते हैं। जवान बेटी के ब्याह की आशा तो खड़ी फसलो के स्वरूप पर तय करते हैं। सपने जब स्वरूप पर निर्भर हो जाते हैं तो स्वरूप के टूटने पर सपने अखंड नही खंड खंड हो जाते हैं। बताई देव राज इंद्र ये बेमौसम बरसात कर जिन किसान मजदूरो के खेतो का स्वरूप बिगाड़ कर उनके सपनो को सपना बना रहे हैं उनकी खता बस बता दीजिये। अपने इस पागल बऊचट गहमरी को इतना बता दीजिये कि धरती पर उनके मालिकों द्वारा वादो की चासनी में लपेट कर, दिखावे के मंच से दिये गये जख़्मों में कुछ कमी रह गई थी जो आपने भी तैयार फसलों को जलमग्न कर दिया।
महाराज आपके सामने तो यह मानव कुछ नहीं, विधि का विधान कह आप सौ बातों का एक जबाब दे सकते हैं, परन्तु अपराध क्षमा मत करीयेगा मेरा  मैं पूछना चाहता हूँ इन्द्र देव कि.विधि का विधान केवल गरीबो के लिए है या समर्थवान लोगो के लिए भी है।
चलीये भगवन चलता हूँ, अधिक क्या लिखूँ, अधिक बोलूँगा तो आप कहेंगें बोलता है। जरा विचार करीयेगा किसानो मजदूरों पर भी। उनके सपने पर भी।

आपका पुत्र
अखंड गहमरी।

अरे नसपिटना

 अरे नसपिटना तूअ मनबे कि ना मनबेअ बोल त। सनक मत सनक मत। तू जानत नईखे दगनऊ हमके। बबरिया पकड़ के चढ़ जाइब सिनवा व छतिया के बतिया कुल टूट जाई।
तू भेटो हमरा से दोगलऊ। अनेत कइले बाड़अन। तोहरा बुझात नईखे केतना हम मोबअइलिया से बतियाई रे? बोल त। अऊरी माटी लागो इ अमबनिया के नतिया के टवरवा ठीक नईखे करत। उ वीडिइयो प ठीक से लऊकत नईखे। चमकावे ले नथुनी पहिन के त लागे ला पगहा पहिनले बिया। अरे चिनिया के नतिया एक त हमार बियाह तय ना हो त रहे ,  केतना मेहनत से गुलझरिया चाची हमार बियाह तय करवली अपना ननद के लइकी के चचिया सास के पूआ के नंनदोशी के लइकी के लइका के सास के बेटी से मलतनियापुर में। बियाह क दिन पनडी जी के सजाव दही ऊपर से सवा रूपया दछिना दे के चार गो जयहिन बीड़ी पिया के रखवउनी, तू सरऊ आ के कुल मेहनतिये प पानी फेरत हअव?
अरे दूधकटऊ लतकनिया के, भटकनिया के, धनियवा के,सोमरूआ के,  बुधअना के बिहवा त टरवाईये देहलअ।कुल पइसा गइल पानी में। अब हमरो टरवाबे प लागल बाअडअ। दू महीना से रोज खाली मोबाइल प बतियाई ला। भेंट नइखे होत। कइसे जिनगी जीहीं? बताऊ तूही।
मान जो रे त न दिमगवा घूमी त जियते मुह में आग लगा देब मरहूँ ना देब। हमके कनिया ले आबे द नाही त।
अब जा तू भइल पूसे से तू बाड़े बइसाख आ गईल।
जेठ में बियाह बा हमार, ना होई न त तू बूझ लीहे मटिलगनू , चुल्ही में डार देब तोहके।
जा त बानी  बतियाबे के टाइम हो गई अब तू जनहीहअ तोहार काम जानी। तोहार दवाई करेम खाली हमरा बियबा के दिनवा त रह जा तू।
भड़केले बानि बियाह टरला के सोच सोच के, जानत हवे न हमार नाव मरखंड  सिंह ह, तनि कान नाक खोल के सुन ले  मरखंड सिंह
अखंड गहमरी

दिखा कर पाव के कँगना

 लगाये आँख में लाली सुबह वो पास आती है
दिखा कर पाँव के कंगना खुशी से मुस्‍कुराती है।

कहे कैसी सजी हूँ मैं लगा कर मॉंग में काजल
तुम्‍हें मैं प्‍यार करती हूँ समझना मत मुझे पागल
लगाती नाक पर बिन्‍दियॉं अदा उसकी निराली है
जला कर दिन में वो दीपक कहे मुझसे दिवाली है
बजा कर हाथ की पायल मुझे हरदम सताती है
दिखा कर पाँव के कंगना खुशी से मुस्‍कुराती है।
लगाये आँख में लाली सुबह वो पास आती है

न पूछो बात तुम उसकी बड़ी सीधी बड़ी न्‍यारी
लगाये  गाल में अतला मुझे लगती बड़ी प्‍यारी
गुलाबी होठ हैं उसके पहनती है नया झुमका
अगर आवें कभी भाई लगाती झूम के ठुमका
खिलाने को उसे बकरा मुझे चूना लगाती है
दिखा कर पाँव के कंगना खुशी से मुस्‍कुराती है।
लगाये आँख में लाली सुबह वो पास आती है

पहनती नाक गजरा हमेशा लाल फूलों का
टंगी तस्‍वीर पर मेरी चढ़ाती हार शूलों का
मुझे हो दर्द पैरो में, तो गर्दन मेरा वो मलती।
बड़ा अधिकारी बाहर में, मगर घर में नहीं चलती।
बुला कर घर वो सखियों को, मुझे नौकर बताती है।
दिखा कर पाँव के कंगना खुशी से मुस्‍कुराती है।
लगाये आँख में लाली सुबह वो पास आती है

तेज तुफानी हवा

 तेज तुफानी हवा और ठंड के बाद भी मैं पसीने से लथपथ था। हाथो में उसका खत था, आँखो में अश्क। अश्क की कुछ बूँदे उस अनमोल कागज पर गिर कर शब्दों की दशा बिगाड़ रही थी। बाहर का तूफान मेरे दिल के अंदर के तुफान से कमजोर था।
खत में लिखे शब्दो पर भरोसा नही हो रहा था कि मैं जिसे जान से अधिक चाहता वह इस प्रकार मेरे भावनाओं से खेलते हुए आगे निकल जायेगी। कितनी आसानी से लिख दिया उसने कि आज पढ़े लिखे आधुनिक सोच के लोगो का जमाना है। मैं तुम्हारे जैसे कम पढ़े लिखे देहाती से विवाह कर अपने सपनों को जला नहीं सकती। तुम मुझे भूल जाओ तुम मेरे सपने पूरे नहीं करते।
तीर की तरह चुभ रहे थे दिल में यह शब्द। हा हा हा दिल और मेरे पास? ऐसा हो ही नहीं सकता।
अचानक तेज हवा का झोंका मेरे हाथो से वह खत ले उड़ा और बारिस की बून्दों से उसके अस्तित्व को मिटा दिया। अच्छा हुआ दिल दिल ही है तो किसी के साथ प्यार में जीता और किसको दिलजला नाम दे जाता।

अखंड गहमरी

जाम ऑंखो अपनी पिलाओ मुझे

 जाम आँखो से अपने पिलाओ मुझे।
नींद आती नहीं तुम सुलाओ मुझे।।

जुल्फ़ तेरी उड़े तो धड़कता है दिल।
गिरे आँचल तुम्हारा मचलता है दिल।।
पास आ कर गले से लगाओ मुझे.
जाम आँखो से......

लब से लब का मिलन हो चले आओ तुम।
छोड़ मेरा  शहर मत कही जाओ तुम।।
प्यार के छाँव में अब छुपाओ मुझे।
जाम आँखो से अपने.....

है पता तुम न आओगी मेरे सनम ।
प्यार तुमको है मुझसे मेरा वहम ।।
तोड़ सपने सभी तुम जलाओ मुझे
जाम आँखो से अपने...........


अखंड गहमरी

टूटे चश्‍में से

 टूटे चश्में से अखंड गहमरी
कोरोना जी सादर प्रणाम। आज जो मैं लिखने जा रहा हूँ वो आपके जाने के बाद ही नहीं जब तक धरती रहेगी तब तक पढ़ा जायेगा। सोचने पर मजबूर करेगा। मैं आपको बधाई और धन्यवाद देता हूँ  जो आप ने धर्मनिरपेक्ष लोगो , हिंदू-मुसलिम भाई भाई कहने वालों के मुहँ पर ऐसा तमाचा मारा है, जिसकी आवाज और गूँज का जिक्र कर्मा फिल्म में दादा ठाकुर के मारे थप्पड़ पर डाक्टर डैन ने किया था । आपके द्वारा मारे गये तमाचे का असर धर्मनिरपेक्ष ताकतें जन्मजन्मांतर तक याद रखेंगीं। उनके गालों की लाली नहीं जायेगी। परन्तु जिस प्रकार यह अखंड गहमरी अपने वाइफ होम के चरण-पादुका के प्रयोग से गालो और पीठ पर पड़ी लाली को बहाने की चादर का आड़ ले बेसर पैर के दलीलो में छुपाता है, यह ताकते भी आपके द्वारा मारे गये तमाचे की लाली को छुपाने का प्रयास करेगी, दलीले देगीं।
यह दलीलें कितनी उनके आत्मा से निकलेगीं और कितनी उनके गले से यह तो वह खुद समझते होगें मगर मैं दावे के साथ कहता हूँ कि सच वो नहीं होगा जो वह कह रहे होगें। आज पूरा भारत आप से नहीं लड़ रहा। कोरोना जी मैं डंके की चोट पर पहले भी कह चुका हूँ और आज फिर कहता हूँ कि मेरे देश की मिट्टी, मेरे देश की मिट्टी से जुड़े चिकित्सक, मेरे देश का आधात्म और मेरे देश के आयुर्वेद से लड़ कर जीत जाने की औकात आपकी नहीं थी। आपकी  इतनी हैसियत नहीं थी कि हमारे देश की गलियों में प्रवेश कर जिंदा रह जाते क्योंकि हम चाइना, इटली, अमेरिका नहीं। हम तो वह हैं, हमारी प्रतिरोधक क्षमता तो वह है  कि 7 सितारा होटलों में  खाते,फाइलों और कम्प्यूटर के बीच उलक्षते, एसी में जिंदगी बसर करते और बंद लंम्बी गाड़ीयों में घूमते जब गाँव की सरहद में पहुँचे खेतो की मिट्टी को माथे से लगाते हाथ में कुदाल ले उतर जाते हैं. और वही पर रूखा सूखा खा कर लम्बी डकार ओ.....अ....म करते है।  ऐसे भारतवासीओं का आप कुछ न कर पाते। परन्तु आपके साथ वह आये जो खाने की थाली में छेद करना ही अपना फर्ज समझते हैं। भारत की बर्बादी का तरीका खोजते हैं, ऐसे आस्तीन के साँपो ने आपका साथ देकर हमें हराने की पूरी साजिश रच दी। कोरोना जी मगर आप शायद भूल गये, हिन्दुस्तान को बर्बाद करने आज पहली बार आप महजिदो से नहीं निकल रहे आप के पहले भी महजिदो से बंदूक और बम भारत को नेस्तनाबूद करने की चाह में निकल चुकी है। ये पहले भी भारत विरोधी ताकतों का साथ देते हुए हर प्रकार का कृत्य कर चुके हैं मगर देखीये हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष ताकतो की चालाकी जो अपने स्वार्थ के रंग में रंग कर इनको बचाने में लग जा रहे थे, पर आज जब सीधे तौर जिंदगी और मौत के बीच की दूरी सिमट कर रह गई है कौन क्या कहेगा? कौन कैसे सफाई देगा मैं नहीं जानता।
कोरोना जी मैं तो बस इतना जानता हूँ कि आज जो देश काँप गया है उसके लिए कोरोना कम मौलाना जिम्मेदार है।.पूरे देश में मंदिर, गुरूद्वारा बंद हैं। रामनवमी जैसा त्यौहार आ कर चला गया, हमारी सदियों से चली आ रही परम्पराओं ने, हमारे मंदिरो में बैठी माँ भगवती ने की पूजा पद्धति को रोकते  हमें आदेशित किया कि मेरे बच्चों  मैं दस रात भूखी रह सकती हूँ मगर तुम्हें तड़पता मरता नहीं। घर में रहो। मगर इन महजिदो ने , इन मौलानाओ ने क्या किया? आपने देखा। कितने मुसलमानों ने अपने महजिदो और मौलानों के इस कृत्य का विरोध किया आपने देखा ही होगा? शायद एक प्रतिशत भी नहीं।  कोरोना जी आज अखंड गहमरी जल रहा है तो इस लिए कि लिखने के सिवा कुछ कर नही सकता और यह लिखा भी पढ़ कर धर्मनिरपेक्ष तो होगें ही हमारे अपने लोग भी भैवें टेरी कर लेगें।  चश्मा टूट गया है, टूटे चश्में से और क्या लिखूँ बस यही कह कर आप से विदा ले रहा हूँ, कि जब तक भारत में मुसलमानों को मसीहा के रूप में देखा जायेगा आप जैसे देश के दुश्मन स्वस्थ, प्रसन्न, मस्त रहेगें मेरे देश और देशवासियों को बर्बाद करते रहेगें, चाहे शासन प्रशासन और यह अशिक्षित बद्तमीज अखंड गहमरी कितना भी जोर लगा लें, चाहे कुछ भी कर ले।  
न वो इसे रोक पायेगा और ना तो यह समझ  पायेगा कि आखिरकार देश में मुसलमानों का विरोध करने पर हमारे देश के लोगो को किस प्रकार का रोग हो जाया है, किस प्रकार उनकी समाजिक और आर्थिक हैसियत में अंतर पड़ता है? क्यों लगाते है लोग मुसलमानों का तेल? क्यों दिखाते हैं खुद को धर्मनिरपेक्ष? क्या वो तब ही सुधरेगें मुस्लमान उनका ही घर जलायेगें?  यदि ऐसा है तो बस कोरोना जी आपका साथ देकर अल्लाह के फ़जल से हमारे देश के शांतिदूतों ने यह काम शुरू कर दिया है। अब देखना है कि उनकी इस आग में केवल अखंड गहमरी जैसे धर्मनिरपेक्षता के विरोधी लोग जलते है या मेरी तीसरी पूर्वप्रेमिका  मजगमिनियाँ भी जलती है।
, जय गहमर, जय वाइफ होम, जय पूर्व प्रेमिका गजगमिनियाँ।

अखंड गहमरी टूटे चश्मे से

पारूल

 बिस्तर पर लेटी हुई उसने आवाज दिया पारूल ओ पारूल जरा इधर आ।
(दूसरे कमरे से पारूल का प्रवेश)
पारूल जी मेम माम साब।
जरा मेरे सिर में बाम लगा दे, बहुत दर्द हो रहा है।
जी मेम साहब (वह बाम लेकर उसे लगाने बैठ जाती है)
पारूल एक बात कहूँ मेम साहब ?
कहो, उसने बेरूखी से बोला।
आप उसे भूल क्यों नहीं जाती?
किसे? बहुत ही धीरे आवाज में उसने पूछा।
वही जिसकी तस्वीर देख कर आप दिन रात अपने अश्क बहाती हैं।
मैं तो कोई तस्वीर नहीं देखती, कोई अश्क नहीं बहाती। तू कैसे कह रही है यह सब?
मेम साहब हम गरीब काम धन के लिए जरूर करते हैं लेकिन दिल लगा के, दिल से।
हाँ हाँ जानती हूँ अब फिर शुरू मत हो जा।
तो भूल जाओ न, क्यों अपने को जला रही हो।
क्या क्या भूल जाऊँ?
मैं अनाथ जिसके जीवन में एक बार प्यार आया ये भूल जाऊँ? इस तन के हर हिस्से पर उसके लिखे नाम भूल जाँऊ?
चलो मान लिया कि सब कुछ भूल गई,(कुछ सोचते हुए उसके मन में कुछ दृश्य चल रहे हैं) मगर उस एहसास को कैसे भूल जाऊँ जो उसने मुझे दिया।
आज भी उसकी गर्म साँसे मेरे तन बदन पर महसूस होती हैं।
पारूल ये कैसा प्यार है मैम जो जाने के बाद भी इतनी तकलीफ दे रहा है।
वो हसते हुए पगली प्यार तो तड़प का दूसरा नाम है।
कभी मिलने की तड़प तो कभी बिछुड़ने की तड़प।
(वो शुन्य में खो जाती है)
खोये खोये..बहुत प्यार करती थी मैं उससे, उस दिन उसे के साथ जलैया ताल जाने का प्रोग्राम था। बड़ी मुश्किल से एक दिन का अवकाश आफिस से मिला था।इस प्राइवेट नौकरी में मालिक खून का आखिरी कतरा नोचनें को आतुर रहता मगर एक दिन अपनी खुशी के लिये दे नहीं सकता..
मैं सुबह से खाना बनाने में व्यस्त थी, खाना भी बनाती तैयार भी होती। निश्चित समय पर वो आ गया..
काली परछाई ...बड़ी सुदंर लग रही हो
कहते वह मुझे पकड़ कर अपने प्रेम के निशा देने
मैं अंदर की तरफ भागी।
वह भी वहाँ पहुँच गया।
तभी एक कर्कश आवाज गूँजी..
मैं जानती थी कि तू फिर उसी अनाथ के घर गया हो गया।
चल यहाँ से जिसके कुल खानदान का पता नहीं मैं उसे अपनी बहू नहीं बना सकती।
माँ उसके हाथो को खीचें ले जा रही थी और वह अपने ओठों से माफ कर देना, माफ कर देना बोले जा रहा था।
मैं खड़ी तमाशा देख रही थी..
कहते कहते वो रो पड़ी उसकी आवाज तेज होने लगी।
पारूल उसे छोड़ कर बाहर निकल गई ताकि उसके दिल की ज्वाला आसूँयों से शांत हो सके।

तुम याद न आया करो

 अश्क से ये हिमालय पिघलता नहीं।
देख कर कौन तुमको मचलता नहीं।।

तुम न आया करो, रात में छत पे अब ।
चाँद छुपता है नभ में निकलता नहीं।।

जुल्फ तुमने बिखेरा मैं घायल हुआ।
दिल सभाँला बहुत पर सभलता नहीं।

प्यार मेरा समझती न तुम खेल तो ।
चैन मिलता मुझे मैं, भटकता नहीं।।

बेवफा अश्क होते न मेरे अगर।
रंग तस्वीर का यूँ बिखरता नहीं।।

बात से बात तेरी मिलाता जो मैं।
नाम मेरा तुम्हें तब खटकता नहीं।

दिल ही रखता न अब दिलजला गहमरी।
पास रहती जो तुम वो बदलता नहीं।।

अखंड गहमरी

न थाना पर न पकड़ीतर

 न थाना पर न पकड़ीतर, न गंगा घाट  ही जाना।
अभी भी लाक डाउन है , पड़े मत रोज समझाना।।

पुलिस वाले लिये डंडा, खडे़ हैं बैंक स्‍टेशन पर।
बनायेगें तुम्‍हें मुर्गा, सुनायेगें तुम्‍हें  गाना।।

पड़ा हैं बंद माँ कामाख्‍या,  का मंदिर ये बता दूँ मैं।
उधर का रूख मत करना, पडे़गा मार ही खाना।।
 
किसानो को न रोका है, किसी ने वो करें खेती।
परेशा पशु के कारण वो, न मितला हेै उसे दाना।।

पुलिस भी अब समझती है, बहाना मत बनाना ये।
निकल कर जा रहे हैं हम, दवा लाने  दवाखाना।

डुबुकिया बाग है सूना,  यही है हाल म‍ठिया का।
न कोई पाठशाला पर, न सोचो पचमुखी आना।।

ऐ बुढ़वा महदेवा जी अब, सुनो अब गहमरी की तुम।
न कोरोना ये फैले अब, विजय इस पर हमें पाना।

अखंड गहमरी

मैं एक किसान हूूँ

 मैं एक किसान हूँ। देश विकसित हो या विकासशील। दुनिया  गरीब हो या अमीर। सुख में हो या दु:ख में, न मेरी उपयोगिता न कम हुई न होगी। मेरे कार्य न कम हुए थे न कम होगें। अगर आज आप की बेटी यह कहे कि पृथ्वी पर जीवन की कल्पना हमारे बिना संभव नही है तो कदापि गलत नहीं होगा।  आज मैं आपके सामने कुछ बहुत आसान सी बातें रखते हुए पूछना चाहती हूँ कि जब संसार को संसाधन, शिक्षा, स्वास्थ, सुरक्षा, भौतिक सुख इत्यादि देने वाले मानवो को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है, सुख-सुविधा दी जाती तो हम किसान उपेक्षित क्यों हैं? भारत ही नहीं विश्व की राजनीति हम किसानों के इर्दगिर्द मंडराती है, मगर हकीकत के धरातल आते ही दम तोड़ देती है। चावल, गेहूँ, दलहन और फल यही मुख्य रूप से संसार में बनने समस्त व्यंजनो वह फास्ट फूड का आधार हैं। इनको पैदा करने में एक किसान को कितना  शारिरिक व मानसिक श्रम करना पड़ता है वह तो यहाँ बैठे हमारे सम्मानित बुजुर्ग ही समझते हैं। हम नई पीढ़ी तो उसकी कल्पना भी नही कर सकते कि एक प्लास्टिक के बोरे में भरे बीज को कैसी-कैसी परिस्थितियों से गुजरते हुए किसान हमारी उस थाली तक पहुँचाता जिसकी कीमत किसान की मेहनत से नहीं खिलाने वाले की हैसियत से तय होती है। हम यह सोच भी नही पाते कि कैसे महीनों रातों को जग कर । आँधियों-बारिसों में चल कर। ज्येष्ठ की बदन जला देने वाले तेज धूप को सह कर। पूस की रातों में गल कर । संसाधनों का, असुविधाओं का, प्राकृत की मार सह कर, गुमनामी के अँधेरे जीते एक किसान ने इस थाली को यहाँ तक पहुँचाया है। हमारे सोच का दायरा ही इतना बड़ा नहीं कि हम  संजय, सरिता, राजेश, ममता, चन्द्रभान, लक्की जो खुद को समाज के निर्माण की पहली सीढ़ी कहते हैं, पूछे कि बताओ आपने धरती के भर्ता को क्या दिया? लहलहाती फसलों को देख अपनी बेटी के हाथ पीले करने का , अपने बेटो को उच्च शिक्षा दिलाने , पत्नी के बदन को प्रदर्शित करने कपड़ो  और फटे जूते को बदलने का स्वपन जब प्राकृति की मार से टूटता है तो आप उसके लिए क्या करते हो? कैसे समाज को उसके मदद के लिए आगे लाते हो। हम कभी नही पूछ सकते श्रीमती सुनीता सिंह से, श्रीमती मीरा देवी से कि संविधान में किसानो को प्राप्त अधिकारो को , हकीकत की धरातल पर लाकर दो वक्त की चैन की रोटी का, उनकी बर्वाद फसलो का इमानदारी से मुआवजा का क्या प्रवंध किया?
मैं  बैंक में कर्ज के लिए, खाद और बीज के लिए, बेटी के विवाह के लिए दौड़ते किसान को देख राजनीति जलसे में, जाति के जलसे में दौड़ने और आन्दोलन करने वाले आप आम लोगों की आँखे क्यों नही पथराती।
आज  आप की बेटी   यही कहना चाहती है कि राजनीतिक पोस्टरो और भाषणों से,  सरकार की बंद एसी वाले कमरे में बनने वाली बेसिर पैर की योजनाओं से, प्राकृतिक आपदाओं पर दस पैसे  मुआवजे की और समाज के द्वारा हम किसानो की उपेक्षाओं से निकाल कर हमें भी मान सम्मान से जीने का, दो वक्त की रोटी और परिवारिक जिम्मेदारीओं को आसानी से पूरा करने का अधिकार दें, हौसला दें।
क्योंकि हम भी मानव हैं, संवेदना है, सपने हैं, चाहत है।
हम किसान भी आपका ही अंग है। हमें भी दिल में जगह दें।
जय हिंद, जय भारत, जय जवान, जय किसान।