शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

घुमक्‍कड प्रव़ति का मैं अाज फिर मैं घूमने निकल गया, दिल्‍ली से दौलताबाद होते हुए हुए अचानक मैं झरनीया में अपनी पूर्व प्रेमिका गजगमिनियॉं के घर जा बैठा। बेहई का आलम तो तब हुआ जब वह नज़रे चुराती रही मैं चाय पानी की फरमाईस कर बैठा। बेचारी करती भी क्‍या वह मुझे बैठा कर चाय पानी दे ही रही थी कि तभी उसका बच्‍चा आ गया और मुझे मामा जी कर कर प्रणाम कर बैठा, मेरी तो दशा आप समझ ही गये होगें, क्‍योकि कभी न कभी तो आप भी इस बिमारी से ग्रस्ति हुए होगें।
मेरे प्‍यारे से भानजें को देख कर उसमें कुछ हिटलरपन आ गया, उसे देखते ही अपने मुहँ से फूल बरसाती हुई बोल पड़ी, आ गये चलो बैग उतारो, टिफीन खाया कि नहीं, खाना खाओं, और होमवर्क करों, टीचर जी आते होगें। उसके इतने सवाल तो सुन कर मैं परेशान हो गया। मैं तो गजगमिनियॉं को देखने लगा कि यह वही है जो मेरे साथ HSBBF कर रही थी, आप आप यह सोच रहे होगें कि यह कौन सी डिग्री है तो आप को बताते चले कि हम दोनो हाई स्‍कूल में बार बार फेल हैं।मैं अपनी सोच में मग्‍न था तभी चटाक- चटाक के साथ गजगमिनियॉं की मोटी आवाज सुनाई दी, टीफिन नहीं खाया, क्‍या करते हो तुम न खाना-पीना कुछ नहीं।
ये शर्ट पर दाग कैसा हैं आज फिर कुछ बाहर का खाया क्‍या। मैं तो जैसे पागल होने लगा, मैं चुपके से वहॉं से चल दिया, न जाने मेरे आने का गुस्‍सा था या बच्‍चे पर आधुनिकता का रौब या दोनो परिस्थितियॉं।
वहॉं से जैसे ही बाहर निकला मेरी एक और पूर्वप्रेमिका मजगमिनियॉं से मुलाकात हो गई।, बड़े ही प्‍यार से उसने मेरा स्‍वागत किया, मैं तो बाग बाग कर उठा। अब आप जलीयेगा मत, आप का चेहरा ही ठीक नहीं है तो मेरी क्‍या गलती, मेरे पर तो लाखों मरती हैं आप मर न मरें तो हम क्‍या करें। मैं अपनी पूर्व प्रेमिका के बाहों में बाहें डाल कर चलता हूँ, गजगौरी के बाग में पहुँच गया, जहॉं आमो से लदें बागीचे देख कर मुझे लगा कि यहॉं तो बच कर बैठना चाहिए, कब कोई पत्‍थर आकर सिर पर न लग जाये, मैं अपने हाथ सिर पर रख कर चलने लगा। तभी मेरी प्रेमिका जोर से हँस पड़ी और बोली मेरे भकबेलन हीरो हाथ हटा लों जो तुम सोच रहे हो एैसा कुछ नहीं होगा, यहॉं बच्‍चे नहीं आते अब आम के बगीचों में जानू, और आराम से बैठों और मेरी जुल्‍फों से जुएं निकालों, बहुत दिनों के बाद मिले हो, देखो मेरे सिर का क्‍या हाल कर दिया है जुएं ने। मैं तो अब प्रेम की दुनिया भूल चुका था, मैं उसे आज की सारी बात बताई। उसने हसते हुए जबाब दिया जानू अब भूल कर भी मत खोजना बचपन, बचपन तो भेटं चढ़कर आधुनिकता के दिखाबे में, अब तो ऑंख भी ठीक से बच्‍चा स्‍कूल में खोलता है। किताबों के बोझ से उसके कन्‍धे झुके हैं। बाहर खाना पीना घूमना और खेलना तो अब अपराध हो गया हैं जानू। मॉं बाप आधुनिकता और दिखावें के चक्‍कर में बच्‍चों को किताबी कीडा से अधिक कुछ समझते ही नहीं। आज तुम्‍हारी पहली प्रेमिका ने जो किया वह नया नहीं है कहानी घर घर की हैं, बच्‍चें स्‍कूल से आने के बाद दो प्‍यार के बोल को तरस जाते हैं, आते ही पहले नौवां घंटा उनका घर में शुरू हो जाता है। सवाल जबाब, जैसे तैसे दो रोटी मुहँ के नीचे और फिर शुरू दिखावे की जिन्‍दगी। सकून के दो पल के लिए तरस जाता है आज का नौनिहाल और फिर ढ़ाल लेता है अपने आपको उसी परिवेश में। मेरे जानू और मॉं कहती है मेरा बेटा ठीक से खाता नहीं, हसता नहीं, वह कहॉं से हसेगा जब आप उसे जीने ही नहीं दोगें। समाज के सामने दिखावे में उसे रोबेट बना कर खडा कर दोगो, अंग्रेजी और पश्चिमी करण के चक्‍कर में उसे अपनी संस्‍कृति से दूर कर कुछ सीखने नहीं दोगें। वह बोले जा रही थी और मैं उसका चेहरा देखे जा रहा था।
यह सोच रहा था कि कल की पागल मेरी यह प्रेमिका मजगमिनियॉं कितनी चालक हो गई।सही बात है घुमकड़ प्रवृति का अखंड गहमरी घूमता ही रहता है, इस गली उस गली। बहुत कुछ देखा उसने बहुत कुछ सुना उसने। पर उसकी ऑंखे कुछ तलाशती रहती है। लेह से कन्‍याकुमारी तक, जीरो से द्वारिका तक हर जगह हर समय तलाशती हैं उसकी ऑंखे। वो खोजता फिरता है बचपन मगर उसे बच्‍चों में बचपन तो कही दिखाई ही नहीं देता। वह तो 2 साल के बच्‍चों में उदासी, कर्तव्‍य-बोध, मोटापा, गंम्‍भीरता और ऑंखों में डर, हाथो में मोबाइल, कंधे पर बोझ ही देख पता है। वह खोज रहा है आज के बच्‍चो में बचपन, वो फुदकना, चहकना, दौड़ना, हसना, खाना, मगर दिखता ही नहीं। समझ में नहीं आता कि वह कौन सा राक्षस है जो बच्‍चों से यह छीन ले गया। शायद दादी की कहानीयों में जो राक्षस था वह निकल आया और प्रवेश कर गया आज के आधुनिक समाज में और छीन बैठा बच्‍चों का बचपन।
अब जब मेरी प्र‍ेमिका ही ऐसा कर रही है तो मैं कैसे और किससे कहूँ
मत छीनो बचपन, मतछीनो बचपन।
अखंड गहमरी, गहमर, गाजीपुर।।

मंगलवार, 12 जून 2018

गंगा घूमेगी गजगमिनयॉं

आज तो पुदीने के पेड़ से कूद जाने का जी कर रहा था। जुल्म ढा रही थी मेरी पूर्व प्रेमिका गजगमिनियाँ। कसम वाइफ होम की मैं अगर झूठ बोलू तो मेरे मुहँ में कटहल का आचार चला जाये। मैं उसे देख रहा था, वो मुझे देख रही थी। मेरे और उसके प्यार के दुबारा दीप जल रहे थे, मगर सोमरूआ का दिल जल रहा था। वो गजगमिनियाँ के सामने ही मुझे लंगूर उसे हूर कह कर जले दिल को ठंडा करने और अपने उस अपमान का बदला लेने की असफल कोशिश किया , जब अपनी वाइफ फस्ट को लेकर गंगा किनारे टहलते हुए यह भूल गया कि वह अपनी शेरनी के साथ है, मेरी गजगमिनियाँ पर फितरे कस बैठा । कसम गजगमिनियाँ की आखों की उसकी सुन्दरी ने अपने सुन्दर सुन्दर चरणपादुका का प्रयोग कर उसे मस्त कर दिया।
मेरा और उसका प्यार तो गंगा की तरह पवित्र और निर्मल है, जो कल-कारखानों की गंदगी जैसे गंदे सोमरूवा से दूषित नहीं हो सकता। और फिर जब मेरे जैसा विद्वान, सुन्दर-सुशील, गबरू नौजवान जब अपनी पूर्व प्रेमिका के साथ बैठा हो तो लोग नज़र लगा ही देते हैं, और उसका खामियाजा आपके इस सीधे साधे भोले अखंड गहमरी को भोगना पड़ता है। आज भी कुछ ऐसा ही हुआ। न जाने कहाँ से मेरी प्रेमिका के हाथ गौमुख और गंगासागर की वीडियो लग गई। अब वह उसे देख कर जिद पकड़ ली कि हम दोनो जगह जायेगें।
पहले तो वह अपनीं अदाओं से रिझा कर अपनी बात मनवाना चाहती और जब मैं नहीं माना तो वह माँ गंगे में कूदने की धमकी देने लगी। मरता क्या न करता तैयार हो गया चलने को..मेरे तैयार होते ही उसने मेरी तरफ हजारो उछाल दिये.. मैं भी धन्य हो गया।
चल पड़ा मैं सिर पर कफन बाधें। वैसे इसके पहले भी मैं अपनी एक पूर्व प्रेमिका मजगमिनियाँ के साथ आ चुका था, मगर इस बार का मंजर काफी बदला हुआ था
गौमुख से गंगोत्री का मार्ग काफी सरल था, गंगा के किनारे किसी प्रकार का प्रदूषण नहीं था। मैने महसूस किया कि जल की मात्रा भी पहले से तीन गुना अधिक है।
हम लोग एक दूसरे के हाथो में हाथ डाले न जाने कितनी दूर चले आये पता ही नहीं चला। यह तो होना ही था। एक तो गंगा का किनारा दूसरे चाँद हाथो में, दिमाग कहाँ काम करेगा।
हम दोनो रिषिकेश, हरिद्वार होते हुए कानपुर पहुँच चुके थे, जून के महीने में भी कानपुर में गंगा माता के पाट को स्वच्छ और निर्मल जल से भरा देख कर आँखे खुली की खुली रह गई, गंगा में कोई नाला, केमिकल नहीं गिरता देख मैं और गजगमिनियाँ एक दूसरे की आँखो को मलने लगे कि कहीं स्वपन तो नहीं, परन्तु यह स्वपन नहीं था।
माँ गंगे को प्रणाम कर हम आगे बढ़े और इलाहाबाद पहुँचे।
वाह क्या दृश्य था संगम तट का, चारो तरफ रौशनी, हजारो मटकी लिये नवयौवनाएं, कोई पानी भर रहा है कोई लेकर जा रहा है।
विश्वास ही नहीं हुआ कि आज आरो के युग में ''गंगा का पानी''।
हमने भी अपनी पूर्व प्रेमिका गजगमिनियाँ के साथ संगम में डूबकी लगाई और चला पड़ा बनारस की तरफ।
बनारस के अस्सी घाट पर आते ही मेरे बाबा का चेहरा सामने आ गया जब वह तैराकी सिखाने के लिये हमें गंगा में फेंक दिया करते थे और हम छपर छपर करते किनारे आ जाया करते। आज यहाँ भी गंगा की निर्मलता, पानी और घाटो की सफाई का वर्णन शब्दो में बया ही नहीं कर पा रहा हूँ। हम दोनो अभी बैठे ही थे कि तेज शोर सुनाई दिया, शायद गंगा आरती शुरू हो चुकी थी, हम दोनो माँ गंगे की आरती देख कर
मोटरसाइकिल स्टार्ट कर पटना चल दिये। पटना में भी गंगा अपने पुराने स्वरूप में लौट चुकी थी, घाटो से दूर गंगा घाटो को चूम रहीं। इतनी लम्बी यात्रा में मैं यह नहीं समझ पा रहा था जब हर जगह गंगा इतनी पावन हो गई हैं तो मेरे प्रेमस्थल में गंगा इतनी मलीन क्यो? वहाँ घाटो से दूर क्यों? गन्दगी का अंम्बार क्यो?
इन सवालो का जबाब तलाशते हम दोनो सुल्तानगंज पहुँच चुके थे।मुझे क्या मालूम था सुल्तानगंज जिस अजगैबीनाथ कहा जाता है, वहाँ मेरी पिटाई होने वाली है। सुल्तानगंज पहुच कर अभी हम गंगाघाट पर नजारा देखने ही जा रहे थे कि डबल डेकर ट्रेन जैसी काया की स्वामी मेरी वास्तविक पत्नी की प्रतिरूप मेरी आधी घरवाली ''नीतू'' (वास्तविक नाम) ने अपनी बहन से बेवफाई का दाग मेरे दामन पर लगाते हुए एरियल सर्फ से मेरी सफाई शुरू कर दी.. वो डबल स्टोरी, मैं सिंगल चेचिस किसी तरह कसम वसम खा खुद और गजगमिनियाँ को बचाया।
मगर आप जानते हैं न जो सुधर जाये वो अखंड गहमरी नही..दुनिया सुधर जाये मगर हम नहीं सुधरेंगे।
हम दोनो चोट खाये प्राणी का आगे सफर जारी रख पाना शायद नहीं निश्चित तौर पर असंभव था। किसी तरह गिरते पड़ते हम लोग सुल्तानगंज के घाटो पर पहुँचे, चारो तरफ गंदगी का अंबार था, पानी भी कोसो दूर, समझ में नहीं आ रहा था कि गंगोत्री से पटना तक गंगा की हालत सच थी या पटना से आगे।
मैं सोच में पड़ा हुआ था , परेशान था, कहूँ तो किससे? मेरी इस उलझन को शायद गजगमिनियाँ जान चुकी थी। वह मेरे चेहरे को अपने हाथो में लेकर बोली '' मेरे मोहन तुम जो सोच रहे हो गलत भी है और सच भी''।
सत्तर सालो से गंगा मैली थी, प्रदूषित थी, लोग उनके नाम पर करोडों खा रहे थे। मगर अब चार साल से गंगा माँ की हितैषी पार्टी की सरकार बनी है। हमारे दौरा मंत्री जी और इन चार सालो में इतनी दूर तक गंगा को निर्मल कर दिये, जलयुक्त कर दिये। अब क्या चाहते हो मेरे जानू मेरे जानम? थोड़ा सब्र रखो गंगा पूरी तरह साफ हो जायेगीं, भागिरथ खुश हो जायेगें, उन्हें गंगा को धरती पर लाने का अफसोस नहीं होगा। दुबारा मोदी जी का करो वेट, अभी नहीं हुआ है लेट।
उसकी बातो में मुझे सच्चाई नज़र आ रही थी, मोदी जी ने चार साल में 70 प्रतिशत गंगा की दूरी पूरी तरह शुद्ध कर दिया तो आगे मौका देने पर तो पूरा हो ही जायेगी। मैं मोदी चचा की जय जय करता अपनी गजगमिनियाँ के ज्ञान पर इतराते हुए उसे लगे से लगा लिया, तभी सामने फिर अपनी डबल डेकर काया वाली साली नीतू को हाथो में दुखहरण सुखदाता लिये आते देखा। मरता क्या न करता जानता था वह तैर तो सकती नहीं, मैं गजगमिनियाँ को लिए गंगा में कूद पड़ा और तैरते हुए गुनगुनाने लगा '' मोदी तेरी गंगा साफ हो गई '।
अखंड गहमरी, गहमर गाजीपुर।

सोमवार, 16 अक्टूबर 2017

दूसरे की रसोई

जब भी मैं अपनी रसोई छोड़ कर जब दूसरे की रसोई का खाना खाता हूँ, तो मेरा दिमाग बुलेट ट्रेन से भी तेज चलता है। आज जब मेरा दिमाग अजानक उड़ने लगा तरह तरह की बातें सोचने लगा तब मेरा ध्‍यान इधर चला आया कि आखिर मेरा दिमाग उड़ा तो उड़ा क्‍यों? तब याद आया ''कि आज घर तो अपना ही था मगर रसोई बदल गई थी''। मैं खाना कहीं और खाया था। हाँ अब ये बात अलग है कि सोचने की दिशा और दशा भोजन पर निर्भर करती है। जैसे दाल ,चावल , रोटी, चोखा हो तो प्रेम से खाईये, कोई डर नहीं होता, मन शातं रहता है, सोचने की दिशा सकारात्‍मक होती है। वही पूड़ी, पराठा या चिकन, मटन हो तो दिमाग भोजन पर कम जाता है, दिल में ईनो, हाजमोला, डायजिन और अधिक होने पर अस्पताल का रहता है। वैेसे मैं आज अनिल भैया के घर की तरह ज्‍यादा भी खाँ लू तो कोई डर नहीं । मेरे बड़े भाई श्री राजेश सिंह का गाजीपुर में सिंह लाइफ केयर सेन्‍टर, शायद यही नाम है, उनके अस्‍पताल का, समस्‍या तुरन्‍त दूर हो जायेगी। अधिक खाकर गाड़ी चलाया नींद सी आई और गिर-विर गया तो एक बड़े भाई आनन्‍द उपाध्‍याया का बनारस में रामबिलास हास्‍पीटल है, हड्डी तुरन्‍त सही। सरकारी अस्‍पताल की तरफ रूख करने से दोनो भाई बचा लेते हैं क्‍योकि इन दोनो की जानकारी अच्‍छी है, हो भी क्यों नहीं 100 में 90 नम्‍बर लाकर डाक्‍टर जो बने हैं । प्राइवेट नसिंग होम है तो सुविधा भी अच्‍छी है।
 सरकारी अस्पताल और सरकारी डाक्‍टरो के रूतबे तो निराले हैं, हनक-खनक सब दिखाते हैं, चिकित्सा की जानकारी के मामले में तो मेरी औकात कुछ कहने की नहीं है। इन दोनो की कृपा से मैं इनसे दूर ही रह जाता हूँ। इनके चोचले नहीं सहना पडता है।
पर एक बात समझ नहीं आई? दोनो इतने तेज थे तो ये सरकारी डाक्‍टर क्‍यों नहीं बने? तभी मेरा दिमाग खुद बोल पड़ा "अरे अखंड-प्रखंड तुम भी एक दम गदहे हो, जानते नहीं हो पहले 1 आता है यानि नम्‍बर वन तो सरकार पहले 1 नम्‍बर वाले को नौकरी देगी कि पहले 90 नम्‍बर वाले को? निहायत उल्‍लू हो तुम अखंड गहमरी। पहले 1 नम्‍बर वाले नौकरी पायेगें न? याद नहीं है? वो क्‍या कहते हैं पी0एम0टी0 और सी0पी0एम0टी में 0 नम्‍बर वालो को भी प्रवेश मिलता है,जीरो कही लगा दो बिल्कुल सेट, अलबेला है जीरो जैसे इसको पाने वाले होते हैं। अब वह 0 नम्‍बर पर प्रवेश पाने वाले कौन हैं यह तो शायद माया बुआ ही बतायेगीं। जब 0 नम्‍बर पाकर जो डाक्‍टरी में प्रवेश लेगा वो क्‍या और कैसे पढ़ेगा ? क्या समझ में आयेगा? कई साल प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए मिला तो वह आर्याभट्ट जी का अविष्‍कार प्राप्‍त किये और बाबा साहब की कृपा से उनका प्रवेश हो गया , तो वह एक साल में एक वो क्‍या कहते हैं ? हाँ समेस्‍ट कहते हैं , उसे कैसे पास करेगें ? किससे पूछे- किससे पूछे? चलो मुलायम बाबा से पूछे, लेकिन वह बोलेगें तो आधी बात समझ में नहीं आयेगी। तो राहुल चचा से पूछे? लेकिन नहीं सोनिया दादी विदेश गई है, राहुल चचा किससे अनुमति लेगें बताने के लिए। मोदी दादा कि तो सोचना बेकार है वो तो कही भारत की सीमा से दूर ही होगें। चलो छोड़ो अपनी पत्‍नी से पूछ लेता हूँ, गाली भी देगी तो क्‍या हुआ। आधी गाली उसको लगेगी, आधी मुझको, क्‍यो‍कि अर्धगनी जो ठहरी, मगर अगले पल ठिथक गया, फिर उसके सामने अपने ज्ञान का कालर कैसे ऊँचा करेगें। छोड़ो मृतुंन्‍जय चचा से पूछते है, पुराने पतरकार रहे है, नेता भी रहे है, पढ़ने में भी ठीके ठोके ठाक होगें। यानि नई बहू कि तरह सर्वगुण सम्मपन्न।

भारत में बढ़ती तलाक और अलगाव की परम्परा --एक कंलक


मनुष्य में जन्म पाते ही मानव कई प्रकार के बंधनो में बंध जाता है जिसमें से एक संस्कार है विवाह संस्कार जो महज एक संस्कार न होकर तन-मन-का मिलन होता है। सात जन्मों का बंधन कहा जाता है, मगर आज के आधुनिक परिवेश में सात जन्मों का बंधन सात महीने में निभाना मुश्किल हो रहा है। आये दिन न्यायालयों में तलाक के लिये अर्जियॉं लगाई जा रही है। जो परिवार ऐसा नहीं कर पा रहे है वो एक दूसरे से अलग एकाकी जीवन जी रहे है।
इसका क्या कारण है हमारी सभ्‍यता पर हावी होती पश्चिमी सभ्‍यता, बढ़ती महत्वाकांक्षा, माता-पिता द्वारा चयन विवाह, या खुद प्रेम विवाह। मगर यदि इसका दोष प्रेम विवाह को माना जाये तो सबसे अधिक अलगाव और तलाक की घटना गाॅंवो में हो रही है जहाॅं अभी प्रेम विवाह का प्रचलन काफी कम है। फिर ऐसा क्यों। गाॅंवो में बढ़ती यह परम्परा बहुत ही अधिक घातक सिद्व हेा रही है।
ग्रामीण क्षेत्रों में युवा वर्ग अपने माॅं बाप की मर्जी से विवाह तो कर रहा है लेकिन वह एक दूसरे में पश्चिमी करण का मोह नहीं त्याग पा रहे है वह भौतिक सुख सुविधा की चाहत नहीं त्याग पा रहें है। कहा जाये तो हिन्दी फिल्मों के तर्ज पर ही युवा वर्ग अपने साथी को चाहता है। पर अपेक्षाये पूरी न होने पर वह विवाद करने से चूक नहीं रहा है। छोटी से छोटी बात भी पहाड़ो सी नजर आती है। एक दूसरे के जीवन साथी एक दूसरे को देखना पसंद नहीं करते, प्यार मिट जाता दोनो एक दूसरे पर दोषा रोपण करते हुए अलग रहना शुरू कर देते है। यहाॅं तक की समाज,घर परिवार की बाते सुनने को तैयार नहीं होते समझौते के सारे रास्ते बंद कर वह तलाक लेकर अकेले रहने की बात करते है। दाम्प्तय जीवन के बिगड़न के पीछे एक कारण शक भी निभाता है। पुरूष या स्त्री दोनो में कोई अगर गैर पुरूष या स्त्री से बात करे उसके साथ काम करें तो वह अवैध संबंध के दायरे में आ जाता है। बिना हकीकत जाने एक दूसरे पर दोषा रोपण और फिर विवाद नौबत तलाक तक पहुॅंच जाती है। और तलाक लेकर ही वह संतुष्ठ होते है।
आज देखा जाये तो विवाह विच्छेद में मोबाइल, फेसबुक, टिविटर और वाटस्प जैसे सोसल नेटवर्किग साइटो का भी कम योगदान नहीं है। पति घंटों कार्यालय में काम करके आने के बाद मनोरजंन के रूप में देर रात तक सोसल साइटों का इस्तमाल करता है। बाते करता है। कभी कभी वह दूसरो में अपनी पंसद की छवि तलाशते हुए अपने परिवार से दूर होने लगता है। पत्नी दिन भर एकाकी जीवन जीने के बाद रात बिस्तर पर भी अपने को अकेला पाती है। साथ ही दूसरे पक्ष से देखा जाये तो दिन भर घर में अकेली पड़ी स्‍त्रियों ने भी इसका प्रयोग शुरू में अकेला पन काटने के लिये किया मगर धीरे धीरे उनका आर्कषण दूसरो के प्रति बढ़ा और वह अपना अकेला पन दूसरो से बाँटते बाँटते दूसरे के साथ संबंध बना लेती है। राज खुलने पर तलाक या हत्या जैसी वारदार पर खत्म होता है।
आज के युग की यह विडम्बना हो गयी है कि पति-पत्नी दोनो एक दूसरे में राम सीता की छवि देखना तो पंसद करते है, मगर राम-सीता बनना नहीं चाहते है। खुद करें तो सही दूसरा करें तो गलत तो एक विवाद का कारण बनता है।
तलाक के बाद भी युवाओं की मुसकिल आसान नहीं होती। तलाक के बाद दूसरा विवाह करने के पश्चात भी स्त्री और पुरूष दोनो के दिमाग में ‘‘एक हाथ से ताली नहीं बजती ‘‘ की बात घूमते रहती है। शुरू में तो सब ठीक लगता है मगर फिर एक दूसरे पर शक शुरू हो जाता है। ‘‘शायद इसी लिये तलाक हुआ‘‘ जैसा जुमला आम होता है और फिर बात बात में डर की कही इस बार भी नहीं निभ पाया तो क्या होगा, हर तरफ अविश्‍वास ही अविश्वास, जिसका असर संतानो पर भी पडता है।
विवाह विच्छेदन में एक अहम पहलू परिवार भी साबित हेा रहा है पुरूष के परिवार के लोग अपने बेटे-भाई की गलतीयों को मानने को तैयार नहीं होते चाहे वह नशे की हालत में आकर पत्नी को प्रड़ाडित करना हो या पत्नी के इच्छाओं का गला घोटने की बात हो सभी मामलों में लडको के परिवार के लोग लडकेा का ही साथ देते है, जिससे शिकार औरत के मन में ससुराल पक्ष में प्रति नकारत्मक भाव आता चला जाता है और वह अपने पति के साथ साथ अपने ससुराल के लोगो के साथ भी रहना पंसद नहीं करती और पिता के घर चली है, और फिर काफी प्रयास करने पर भी वह जाने को तैयार नहीं होती।
वही दूसरा पहलू यह भी है कि बेटी के परिवार के लोग विवाह के बाद भी पुत्री के परिवार में हस्तक्षेप करने से बाज नहीं आते उनके घर की समस्या में बिना वजह टाॅंग अड़ातेे है और बात बात में लडकी को गलत सलाह दे डालते है। जिससे ससुराल पक्ष के लोग अपनी तौहीन समझते हुए लडकी को और प्रताडित करते है। बात को न समझते हुए पुत्री को अपने पास ले आते है और कानूनी कार्यवाही करने की धमकी देते है।
गाजीपुर जिले के एक गाँव में एक गुप्ता परिवार की एक लडकी ने अपना विवाह केवल इस लिये तोड दिया कि उसका पति उसको अपने माइके में रह कर स्नातक की परीक्षा देने से मना कर दिया और न मानने पर उस के उपर हाथ उठाया दोनो पति अपनी अब एक दूसरे से अगल रहते है लडकी जहा माइके में है वही उसका पति दिल्ली के नीजी संस्थान में कार्य करता है
वही गाजीपुर जिले के ही एक पंडित परिवार की एक लडकी ने अपना ससुराल छोड कर माइके में रह रही है कि दूसरे से प्रेम विवाह करने की चाहत केवल इस लिये रखती है कि उसके परिवार के लोगो को उसका आधुनिक जीवन पंसद नहीं है वह अपने मन पंसद परिधान नहीं पहन सकती ना तो वह अपनी भौतिक आकांक्षो को पूर्ण कर सकती है मगर उस लडकी ने यह सोचने की जहमत नहीं उठाई की उसके पिता ने किसी तहर उसका विवाह किया और उसके बाद उसकी तीन बहने और शादी योग्य है आखिर यह कहा की महत्वाकांक्षा जो अपने स्वार्थ के लिये अपनो की सुख की बलि चढा दे।
आखिर जो भी हो तलाक और विवाह विच्छेद हमारे समाज के लिये एक कंलक है, विवाह आपसी मेल का पर्याय है इसे सोच समझ कर निभाना ही होगा। जिससे एक तरफ तो परिवार टूटने से बचे और दूसरी तरह इस प्रकार के विच्छेद पर होने वाले अपराध को रोका जा सके।

रविवार, 15 अक्टूबर 2017

लगाने पाक का झन्डा, उन्हें कश्मीर में मत दो।
ज़मी यह हिन्द की प्यारी, उन्हें समझा के फिर तू सो।
न माने बात गर तेरी, न वन्देमातरम बोले,
दिखा दो पाक की राहें, अरब के उन लुटेरो को।
अखंड गहमरी।।

लदी है टोकरी सर पे, तड़पता गोद में बालक।
मिटाये भूख कैसे वो, समझ उसकी न कुछ आये।।
बदन पीला पड़ा उसका, न मिलती पेट भर रोटी।
कहाँ से दूध छाती में, वो बालक के लिए लाये।।
अखंड गहमरी


पड़ोसी कर रहा हो घर, अगर रौशन जला दीपक।।
तुम्हारे घर भी आयेगा उजाला, मत जलो उससे।।
अखंड गहमरी।।


स़जा ऐसी मुझे देगी, नहीं मालूम था मुझको।
सहारा प्यार का छीना, न रोने की कस़म देकर।।
जुबा खामोश रखना सीखना मुझको नहीं यारो।
बचे हैं चार दिन इस जिन्दगी के अब करोगे क्या?
अखंड गहमरी।।

जरा अब होश में आओ, दिखाओ हिन्द की ताकत।
बजा शंकर का डमरु तुम, सुनाओ हिन्द की ताकत।।
अगर अब पाक का झन्डा, दिखे कश्मीर में तो तुम..
जला कश्मीरी मुल्लो को, बताओ हिन्द की ताकत।।
अखंड गहमरी।।।

दिया जो जख़्म गाँधी ने, अभी भी भर न पाया वो।
लगा कर आग मुल्लो ने, जला कश्मीर को डाला।।
अखंड गहमरी।।


बता दो याद अब उनकी मिटायूँ मैं कहॉं जाकर
लिखा जो प्‍यार के किस्‍से सुनायूँ मैं कहॉं जाकर
बजाकर जो कभी पायल जिगर के पास आती थी
नज़र उसको लगी मेरी बतायूँ मैं कहाँ जाकर
न मैखाना शहर में है न उसका घर पता मुझको
जरा कोई बताये दिल लगायूँ मैं कहाँ जाकर
न पीया जाम क्‍यों मैने, अगर पूछो न तुम मुझसे
नजर बोतल में आई तुम दिखायूँ मैं कहाँ जाकर
मिला कर जाम में पानी कभी क्‍यूँ मै नहीं पीता
शहर में अश्‍क बहता है मिलायूँ मैं कहॉं जाकर

मुसीबत आ गई है जब, कहो क्‍यो तुम हो घबडाते।।
सबेरा हो न जब तक क्‍या,‍ दिखाने राह रवि आते।।
पराया कोई न हैं जग में,तुम्‍हारे साथ रहते सब।
मगर जब धूप होती तेज, वो बस छॉंव में जाते।।
अखंड गहमरी।।

गहमर कार्यक्रम

गहमर में आयोजित अखिल भारतीय साहित्यकार सम्मेलन अपनी गरिमा लिये आप सभी के सहयोग और आशीर्वाद से समाप्त हो गया। आप सब के मार्गदर्शन का फल था कि मैं इसे आयोजित कर पाया।

इस कार्यक्रम में मैंने कुछ बातें आप सभी के मंच से हट कर आपसी वार्तालाप के दौरान सीखी और कुछ मंच संचालन और आपके गहमर भ्रमण से और कुछ गायकी के कार्यक्रम से महसूस किया।

आप सब ने एक बाते बहुत अच्छी उठाई कि '' आज अधिकांश केवल सुनाना, दिखाना, पढ़ाना तो चाहते हैं, पर दूसरो की सुनने, पढ़ने और देखने को तैयार नहीं," । बहुत यह एक कटू सच है, जिस पर सभी को गम्भीरता से विचार करना होगा। इसका कारण क्या है? यह तो समद नही आ रहा मगर आज इस समस्या के कारण साहित्य की पौधशाला सूखती जा रही है। युवाओं की एक अच्छी फसल तैयार नहीं हो पा रही है। युवा लेखक/ रचना कार सही- गलत का निर्धारण नहीं कर पा रहे हैं। जिससे वह समय से पहले दम तोड़ दे रहे हैं। जो वर्ग कुछ सुन, देख, पढ़ भी रहा है उसम़े से भी अधिकाशं एक कोरम पूरा कर वाह,बधाई और शुभकामनाएं तक ही खुद को समेट ले रहा है। इस समस्या को खोजने और समाप्त करने की दिशा में अग्रज साहित्यकारों को हर हाल में बढ़ना होगा, समाधान चाहे कितना भी जटिल क्यों न हो हम युवावर्ग को साथ लेकर उसे करना होगा, नहीं तो क्षमा के साथ कहना चाहूँगा कि ''आने वाला समय न युवाओं को माफ करेगा न अग्रज साहित्यकारों को''।

दूसरी बात जो मैनें दो सालो में महसूस किया कि '' कभी-कभी हर व्यक्ति अपनी वर्तमान चोले से बाहर आना चाहता है ,जैसै वर्णाली बर्नजी जी, बीना श्रीवास्तव जी और रविता पाठक के भक्ति लोकगीत के प्रस्तुति के बाद के बाद कई साहित्‍यकारों ने न सिर्फ लोकगीतो की प्रस्‍तुति देनी चाही बल्कि वाद्ययन्‍त्र बजाने की भी इच्‍छा जाहिर किया। ठीक वैसे ही जैसे द्वितीय वर्ष अपनी जीवन पर आधारित कहानी सुनाने को कोई तैयार नहीं था और जब कार्यक्रम शुरू हुआ तो साहित्‍यकार तो साहित्‍यकार मेरे गॉंव के मृतुन्‍जय चाचा, धीरेन्‍द्र चचा एवं ग्राम प्रधान मुरली कुशवाहा तक कहानी सुना गये। इस लिए मैं आगामी कार्यक्रम में '' यादो के झरोखें से'' नाम का एक आयोजन जरूर रखने का प्रयास करूगॉं जिसमें आप वाद्ययन्‍त्रों का प्रदर्शन, गायकी, कहानी या मन की बात जरूर रख सकेगें।

तीसरी बात जो गुरूवर आदरणीय विश्‍वभर शुक्‍ल जी एवं आदरणीय संजीव सलिल वर्मा जी ने प्रस्‍ताव दिया कि कार्यक्रम के दौरान गहमर भ्रमण कार्यक्रम में एक सत्र मॉं कामाख्‍या देवी के प्रांगण में जरूर रखा जाये जहॉं केवल माँ कामाख्‍या पर आधारित एक-एक छोटी रचना सभी सुनाये, यह भी निश्‍चित रूप से किया जायेगा। वहॉं एक काव्‍य गोष्‍ठी के बाद सीधे भोजन और तब सम्‍मान समारोह कार्यक्रम स्‍थल पर आयोजित किया जायेगा।

चौथी बात कान्ति मॉं द्वारा कही गई जिसमें उन्‍होनें साफ कहा गया कि यह स्‍थान सिर्फ काव्‍य सम्‍मेलन और सम्‍मान का स्‍थान न बने यह सभी को कुछ सिखाने का स्‍थान बने,निश्चित रूप से सही रहा, इस कार्यक्रम के दौरान विभिन्‍न विषयों पर कम से 2 कार्याशाला जरूर आयोजित किया जायेगा, जिससे में एक लेखन और एक साहित्‍यकारो को नई टेकनालाजी से जोडने की होगी।

पॉंचवी बात प्‍यासा अंजुम सर, और योगराज प्रभाकर सर ने मेरे इस कार्यक्रम को अप्रैल में कराने के निर्णय पर सीधे आदेश दिया कि अप्रैल हर मायने में व्‍यस्‍त महीना रहता रहता है, शिक्षा का नया सत्र, कार्यालयों का नया सत्र, शादी व्‍याह का मोैसम, गर्मी के साथ कठिनाईयॉं आती है। इस लिए यह कार्यक्रम सीधे दिसम्‍बर माह के तीसरे शनिवार,रविवार एवं सोमवार को दोपहर तक आयोजित हो, जिससे सभी को आने का समय मिले, गर्मी की समस्‍या से निजायत मिले, सोमवार को सीधे गहमर भ्रमण, कामाख्‍या काव्‍यगोष्‍ठी, भोजन और विदाई रखी जाये।

इस प्रकार आप सब के सहयोग से जो बाते समाने आई, मैने सीखी वह आपके सामने है। आपके आशीर्वाद का आकाक्षी अखंड गहमरी, गहमर गाजीपुर।

आभार

अखिल भारतीय साहित्यकार सम्मेलन 2017 गहमर में आये आप सभी अतिथियों को प्रणाम। आशा है कि आप सभी अपने अपने निवास स्थान पर पहुँच चुके होगें। अपनी उच्च स्तर की सुविधा छोड़ गहमर की भीषण गर्मी में आप सब ने न सिर्फ पसीना बहाया बल्कि अपने रहन सहन के स्तर से नीचे जाकर 3 दिन निवास किया, ये आप सब की महानता और प्रेम था। आप के सहयोग से ये तीन दिन कैसे बीत गये पता ही नहीं चला। कार्यक्रम के दौरान आप सब की सुविधाओं का प्रर्याप्त ख्याल रखने का प्रयास किया गया, परन्तु निश्चित रूप से वहाँ कमीयाँ हुई, जिसके लिए हम सब क्षमाप्रार्थी हैं। यह केवल एक सम्मेलन नहीं होता बल्कि यह एक यज्ञ होता है जिसमें मैं अपने कर्तव्यों और परिश्रम की आहुति देकर आप सब का आशीर्वाद प्राप्त करने की कोशिश करता हूँ। उपरोक्त कार्यक्रम ट्रनो के परिचालन और कुछ मेरी नादानियों के कारण काफी विलम्ब से शुरू हुआ.जिसके कारण कई प्रायोजित कार्यक्रम नहीं हो पाये। विमोचन के कार्यक्रम में श्री उमेश कुमार श्रीवास्तव एवं अशोक कुमार गुप्त जी को अपनी किताब के बारे में बोलने का मौका नहीं मिल पाया।श्री प्यासा अंजुम जी कि किताब का विमोचन नहीं हो पाया। प्रो.विश्वम्मर शुक्ल जी को द्वितीय दिन कवि सम्मेलन के बाद दिये जाने वाला साहित्य सरोज सम्मान नहीं दे पाया, इसके लिऐ मैं आप से क्षमायाचक हूँ।
मैं क्षमा याचक हूँ संजीव सलिल वर्मा जी से जिनके छंद लेखन पर आधारित कार्यशाला नहीं हो पाई।
मैं क्षमायाचक हूँ आदरणीया ई.आशा जी , आ. रविता पाठक जी से जो मेरे अकुशल नेतृत्व क्षमता एवं विभिन्न कारणों से अपनी प्रस्तुतियां नहीं दे पाई। मैं क्षमायाचक हूँ कमलापति गौतम और उनके परिवार से जो मेरे सौपी गई एक जिम्मेदारी को निभाने में काफी परेशान हुए।
कई अव्यवस्थाओ के बीच मेरे लिए सुखद ये रहा कि आप सब ने मुझको ऐसे ऐसे ज्ञान दिये जिसको अपना कर न सिर्फ कार्यक्रम को सुखद बना सकूँगा, बल्कि जीवन में उतार आगे बढ़ सकूँगा। मैं आप सब के साथ उदय प्रताप पब्लिक स्कूल पब्लिक स्कूल की बच्चीयों का आभारी हूँ जो कठिनाइयों को झेलते हुए भी गहमर पहुँचीं और अपना बेमिशाल कार्यक्रम प्रस्तुत किया। मैं वर्णाली बर्नजी और बुन्देलखण्ड से आई महिला का विशेष आभारी हूँ जिसने लोकगायन प्रस्तुत कर स्थानीय बच्चों में उत्साह पैदा कर उनको मंच पर आने की प्रेरणा दी।
मैं आभारी हूँ अपने गुरू श्री योगराज प्रभाकर जी का, गिरीश पंकज जी का, ब्रजेश सिंह ब्रजेश जी का, वीर सिंह मार्तण्य जी का, श्रवण कुमार उर्मलिया जी का,गंगा राम शर्मा जी का, राधेश्याम बंधु जी का जिन्होंने समय समय पर मार्ग दर्शन दिया। मैं आप सब आये हुए, अतिथि नीलम श्रीवास्तव जी, समीर परिमल जी, सरोज तिवारी जी, डा.चेतना उपाध्यक्ष जी , बीना श्रीवास्तव जी, सुलक्षणा अहलावत जी, रीता जय हिन्द जी, डा.रश्मी जी, डा.मुक्ता जी, श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय जी, बसंत कुमार शर्मा जी, विनोद पान्डें जी, कपिल कुमार जी, रमेश कुमार सिंह जी, पूनम आन्नद जी, श्रीधर द्विवेदी जी, शान्ति कुमार स्याल जी, देवशरण शर्मा जी,विनय राय बबुरंग जी,ऋचा आर्या जी,कान्ता राँय जी, सुधीर सिंह , श्रीमन्नारायण चारी विराट जी,भवर जी, सन्नी कुमार जी, भोला जी सहित उन सबका आभारी हूँ जो इस कार्यक्रम में उपस्थित हुए और उनका नाम मैं नहीं लिख सका।
मैं आभारी हूँ गहमर के हिन्दुस्तान समाचार पत्र, दैनिक जागरण, राष्ट्रीय सहारा के स्थानीय पत्रकारों का जिन्होनें तैयारी से लेकर समाप्ति तक शानदार कवरेज किया। मैं माँ श्रीमती कान्ति शुक्ला और सुभाषचंदर सर को चरण स्पर्श करता हूँ जिन्होनें हर समय मेरा मार्ग दर्शन किया।
अन्त में आप सबको हुई परेशानीयों के लिए क्षमा याचना करते हुए ये निवेदन करता हूँ कि आप एक स्मरण जरूर लिखें, जिसमें कमियाँ, कष्ट, सुझाव जरूर लिखें।

आप सबको नमन करते हुए अखंड गहमरी।

गहमर पर गीत रमा

रमा दीदी द्वारा गहमर पर लिखा एक नवगीत

गहमर की माटी
सौंधी सौंधी
खुशबू से महके देखो

इस धरती से होकर गुजरे
माँ गंगा की
पावन धारा ...
चाँद और सूरज
नजर उतारे
आशीष पाए गहमर सारा ......
हवा बजाये ढोल मजीरे
कलियाँ सारी चहके देखो |

कामाख्या माँ इसी गाँव में
आन बिराजी
भाग्य हमारे .....
जिनके आशीर्वाद से
उन्नत गाँव हो रहा
साँझ सकारे ...
धूप दीप से हवा सुगन्धित
दीया बाती लहके देखो |

इस माटी में जन्मे
वीरों ने गहमर का
मान बढाया ....
देश की रक्षा की खातिर
सरहद पर जाकर
वचन निभाया ....
देश प्रेम के
जिनकी आँखों में
अंगारे दहके देखो |

यहीं हुए थे पैदा
गोपाल राम गहमरी
सुनो बताऊँ ...
उनके लिक्खे जासूसी
किस्से पढ़ पढकर
आज सुनाऊं ....
जिनके गीतों
में हिंदी और
भोजपुरी भी बहके देखो |

हरियाली की गोद में
बसे हुए गहमर की
बात है न्यारी ....
हवा चैन की बहे
यहाँ के गाँव गली की
छटा है प्यारी....
सदा करोगे याद
आप कुछ दिन
गहमर में रहके देखो |

रमा प्रवीर वर्मा ..........

गहमर पर गीत

गहमर के कुछ इतिहास को एक गीत के माध्‍यम से बताने की कोशिश।

कहानी आज गहमर की सुनो सबको सुनाते हैं!
बना तस्‍वीर इक प्‍यारी सभी को हम दिखाते है!

बकस बाबा का है मंदिर, लिये बस नाम जो आता!
न मरता साँप का काटा, खुशी मन से वो घर जाता!
बचाने में गऊ माँ को, गई थी जान ही जिनकी!
न उस बरसाल को भूलें, करें पूजा सभी उसकी
हमारे गाँव में गंगा, लगे मेला यहाँ हरदम!
बने हैं घाट सब पक्के, न शहरो से दिखे कुछ कम!
निराली है छटा छठ की, सभी दीपक जलाते हैं!
कहानी आज गहमर की.......

बसा पन्‍द्रह सौ पैतिस में, जगह ये नाम था गहमर!
बसाया था इसे जिसने, हुए वो धाम देव अमर !
बना कर वो यहॉं मंदिर, बसाये मॉं का'माख्‍या को!
करे विश्‍वास माँ में जो, कभी उसको न दुख इक हो।।;
तभी से रोज पूजा हो, कभी खंडित नही होती!
निराली मॉं की' महिमा है, निराली उसकी' है ज्‍योती!
लगे नवरात में मेला, हजारो भक्‍त आते हैं!
कहानी आज गहमर की......

यहॉं अंग्रेज की कोठी, जिसे मैगर जलाये थे!
नदी में जान अपनी कूद,तब गोरे बचाये थे!
बचाने मान भारत की,लुटा ने जान सरदह पे।
खडे़ है आज सीमा पे,हजारो वीर गहमर के।।
बयालिस में लिया लोहा,यहॉं के वीर गोरो से
किये थे तीस दिन शासन, बनाये अपने' नियमो पे!
हिफाजत देश की कैसे,करे सबको सिखाते हैं!
कहानी आज गहमर की.......

खिला दुश्मन ज़हर आजाद, कर दे जिन्दगी से पर।
तड़प औ दर्द दे जिन्दा,सदा अपने ही रखते हैं।।
अखंड गहमरी

पड़ोसी कर रहा हो घर, अगर रौशन जला दीपक।।
तुम्हारे घर भी आयेगा उजाला, मत जलो उससे।।

अखंड गहमरी।।

अखंड गहमरी updated his status.
स़जा ऐसी मुझे देगी, नहीं मालूम था मुझको।
सहारा प्यार का छीना, न रोने की कस़म देकर।।
जुबा खामोश रखना सीखना मुझको नहीं यारो।
बचे हैं चार दिन इस जिन्दगी के अब करोगे क्या?

अखंड गहमरी।।
महीना जून का पावन ,मुझे तो खूब है भाता।
मगर इसका मुझे है ग़म ,हमेशा ये नही आता।।

बला बीबी टले इस माह, पीहर वो चली जाती।
सुबह से शाम तक करती ,परेशा सर जो है खाती।
यही इक माह है ऐसा ,खुशी जो साथ में लाता।।
महीना जून का पावन ,मुझे तो खूब है भाता।।

लड़ाता जाम विस्‍की के ऩज़र रखता पडोसन पे।
न खाना मैं बनाता हूँ मगाता रोज होटल से।।
पिटाई भी नही होती, जली रोटी नहीं खाता।।
महीना जून का पावन, मुझे तो खूब है भाता।।

सुबह से शाम बाते प्‍यार से, वो फोन पे करती ।
दिखाता प्यार मै झूठा,खुशी में आह वो भरती।।
कहूँ जब मैं तुम्हारे बिन, रहा मुझसे नही जाता।।
महीना जून का पावन मुझे तो खूब है भाता।।

अखंड गहमरी।।गहमर गाजीपुर ।
7 June

हिन्‍दूओं की भावना का खून बहाने वाले, सर्द रात में अपने स्‍वार्थ के लिए म‍हजिदो से हिन्‍दुओं को बाहर कराने वाले, अपने स्‍वार्थ के लिए भारत के दो भाग कर मुसलमानो को दान देने वाले,लाखो हिन्‍दुओं के हत्‍यारे, तथाकथित राष्‍ट्रपिता के विषय में किसी ने एक सही वाक्‍य क्‍या कह दिया, जलजला आ गया। वाह रे वाह।


जरा अब होश में आओ, दिखाओ हिन्द की ताकत।
बजा शंकर का डमरु तुम, सुनाओ हिन्द की ताकत।।
अगर अब पाक का झन्डा, दिखे कश्मीर में तो तुम..
जला कश्मीरी मुल्लो को, बताओ हिन्द की ताकत।।

अखंड गहमरी।।।
29 June
अखंड गहमरी updated his status.
दिया जो जख़्म गाँधी ने, अभी भी भर न पाया वो।
लगा कर आग मुल्लो ने, जला कश्मीर को डाला।।
अखंड गहमरी।।
 
लगाने पाक का झन्डा, उन्हें कश्मीर में मत दो।
ज़मी यह हिन्द की प्यारी, उन्हें समझा के फिर तू सो।
न माने बात गर तेरी, न वन्देमातरम बोले,
दिखा दो पाक की राहें, अरब के उन लुटेरो को।
अखंड गहमरी।।
अखंड गहमरी updated his status.
लदी है टोकरी सर पे, तड़पता गोद में बालक।
मिटाये भूख कैसे वो, समझ उसकी न कुछ आये।।

बदन पीला पड़ा उसका, न मिलती पेट भर रोटी।
कहाँ से दूध छाती में, वो बालक के लिए लाये।।
अखंड गहमरी
उठाना लाज का पहरा ,बहुत आसान है लेकिन।
बचा कर लाज रिश्तों का ,निभाना है नहीं आसां।।
गरीबो के बस्ती में, लगा लो लाख मेले तुम।
मगर इक प्यार की रोटी, खिलाना है नहीं आसां।।

अखंड गहमरी
हुआ हज पर अगर हमला, कभी कश्मीर की माटी में।
तिलक मारा न जाये फिर, कभी कश्मीर की घाटी में।।
 बदन लिपटा तिरंगें में, कही दिखता न उनका सिर।
गरज बेशर्म खादी तब, गिराती दुश्‍मनो के घर।
अखंड गहमरी

मुझे रब नींद वो दे दो, जगा कोई नहीं पाये।
ख्‍ुाली हो ऑंख मेरे पर, नज़र कोई नहीं आये।।
जलाया प्‍यार में जिसने, उसे ऐसे बुला मरघट
जले जब तक न दिल मेरा, नही वो लौट कर जाये।।
15 May
अखंड गहमरी updated his status.
बना कर दर्द को स्‍याही, लिखा कोरा मैं इक कागज।
गिरा कर अश्‍क अपने वो, लिखा था जो मिटा बैठी।।
अखंड गहमरी updated his status.
खुशी मेरी हंसी मेरी, किसी को क्यों नही भाती।
जलाने याद में अपनी , हमेशा वो चली आती।।
सज़ा तो जिन्‍दगी ने ही,मुहब्‍बत का दिया लेकिन
अभी भी याद उसकी दिल, से मेरे क्‍यों नहीं जाती।।

अखंड गहमरी
अखंड गहमरी updated his status.
कसम कोई न दे मुझको , कसम सब तोड़ बैठूगाँ।
सभी खुशियॉं सभी सपने,अभी मैं छोड़ बैठूगाँ।
जरा उनको बुला दो यार मेरे पूछ लू मैं कुछ
नहीं मैं मौत से यारी, कभी भी जोड़ बैठूगॉं।।

अखंड गहमरी ।।
 
चोट खाता रहा मुस्‍कुराता रहा
प्‍यार के फूल हस कर खिलाता रहा
अब भरोसा न है जिन्‍दगी का मुझे
इस लिये मैं उसे बस मनाता रहा

जिन्‍दगी प्‍यार मुझको सिखाती रही
और मैं जिन्‍दगी को भुलाता रहा
साथ वो चल दिये हैं किसी गैर के
प्रीत की रीत पर मैं निभाता रहा
आज की रात आखिरी होगी मेरी
पास अपने उसे मैं बुलाता रहा
बात जब है चली बेवफाई की तो
बेवफा कह मुझे वो बुलाता रहा
बात मुझसे करें वो कभी भी न पर
याद मे अश्‍क उनकी बहाता रहा।
24 May
अखंड गहमरी updated his status.
बता दो याद अब उनकी मिटायूँ मैं कहॉं जाकर
लिखा जो प्‍यार के किस्‍से सुनायूँ मैं कहॉं जाकर

बजाकर जो कभी पायल जिगर के पास आती थी
नज़र उसको लगी मेरी बतायूँ मैं कहाँ जाकर

न मैखाना शहर में है न उसका घर पता मुझको
जरा कोई बताये दिल लगायूँ मैं कहाँ जाकर

न पीया जाम क्‍यों मैने, अगर पूछो न तुम मुझसे
नजर बोतल में आई तुम दिखायूँ मैं कहाँ जाकर

मिला कर जाम में पानी कभी क्‍यूँ मै नहीं पीता
शहर में अश्‍क बहता है मिलायूँ मैं कहॉं जाकर
21 May
अखंड गहमरी updated his status.
मुसीबत आ गई है जब, कहो क्‍यो तुम हो घबडाते।।
सबेरा हो न जब तक क्‍या,‍ दिखाने राह रवि आते।।
पराया कोई न हैं जग में,तुम्‍हारे साथ रहते सब।
मगर जब धूप होती तेज, वो बस छॉंव में जाते।।

अखंड गहमरी।।
 

चित्रहार

समझना है नहीं आसान उनकी मुस्‍कुराहट को
जला भी मुस्‍कुराये वो, मिटा भी मुस्‍कुराते हैं।

अखंड गहमरी गहमर गाजीपुर

अखंड गहमरी updated his status.
करू मैं प्‍यार की बातें, कहूँ उनसे लिपट मुझसे।
मगर क्‍यों बात दिल की वो, छुपा दिल में न कुछ कहते।।
अखंड गहमरी updated his status.
कदम अपने बढ़ा कर वो, नहीं क्‍यों साथ देते हैं।
यही तकदीर क्‍या मेरी, समझ वो चाह चुप रहते।
बताना तो उसे चाहा, हमेशा हाल दिल का मैं।
गवाही दिल न दे मेरा, डरें वो रूठ मत जाये।
 

मुझे आशिक दिया है नाम जिसने ये जरा सुन ले ।
न है दिल जिस्‍म में मेरे, न किस्‍मत प्‍यार पाने की ।।
 

कफन में मैं लिपट कर पास से तेरे अगर गुजरूँ।।
बता कीमत चुकाऊ क्‍या, वहॉं से दूर जाने की।
 
पलें जो भीख पर मेरे, वही गाली सुनाते हैं
बना जो प्‍यार का मंदिर वहॉं दुश्‍मन बुलाते हैं
तवायफ जिस्‍म बेचे तो, कहे उसको बुरा लेकिन
वतन जो बेचता उसको,गले हम सब लगाते हैं।
 
न जाने क्‍यों थमी साँसे, अभी तो छॉंव पे हक था।
बुलायूँगा किसे अब मॉं, भवंँर में जब फसूँगा मैं।
 

कुछ सुना दीजिए
गम मिटा दीजिए
क्‍या लिखू मैं उसे
ये बता दीजिए।।
 

दवा की चाह में जिसके गया था पास मैं वो भी।
बता कर दिल जला मुझको, नया इक जख़्म दे बैठे।।
30 March 2017 22:10
अगर वो स्वपन में भी जिन्दगी का ख्वाब कह दे तो...
भुला कर गम सभी अपने, हकीकत में बदल दूगाँ।।
30 March 2017 11:22
हमेशा राह उसकी देखा, उसने कुछ नहीं बोला
कभी भी जिन्‍दगी के राज उसने क्‍यो नहीं खोला
किसी से प्‍यार करने का नही है हक मुझे लेकिन
न देखू एक दिन उसको, बने दिल आग का गोला।।
 

मिले गर जख्‍़म कुछ मुझसे, उन्‍हें तुम भूल मत जाना।
मुझे ऐसी सजा देना, तड़पता ही रहूँ हर दम।।
अखंड गहमरी

भरोसा अब न करना जिन्‍दगी का दोस्‍त मेरे तुम।
न जाने बंद कब हो ऑंख मेरी मैं चला जाऊँ।।
अखंड गहमरी

न सपने ही किया पूरा, न कोई गम मिटा पाया।
किया था प्यार म़ै जिससे, न चाहत ही जगा पाया।।
अखंड गहमरी

न कोई चाह दिल में अब, न सुख को ही तलाशूँ मैं।
न मिलती मौत है जब तक, मुझे तन्‍हा ही रहना है।।

अखंड गहमरी,

पता जब से चला उनको, वही है जिन्‍दगी मेरी।
नज़ाकत आ गई उनमें, वो मुझसे दूर रहती हैं।।
अखंड गहमरी

अगर ले जा सका तो मैं तुम्हारी याद ले जाऊँ।
नहीं फिर आपकी दुनिया में मैं तो लौट कर आऊँ।।
बचा कर अश्क अपने आप अपनो के लिए रखना..
गिरे गर अश्क मुझ पर तो, नहीं मैं चैन पाऊँगा।
अखंड गहमरी।।।
30 April
अखंड गहमरी updated his status.
भराेसा जुल्‍फ वालो का अगर तुमने किया तो फिर ।
कटोरा हाथ लेकर जिन्‍दगी भर तुम खुशी मॉंगें।।

अखंड गहमरी
अखंड गहमरी updated his status.
न लेना प्‍यार का तुम नाम, ये पागल बना देती।
दवा मिलती नहीं इसकी, न जाने कब रूके सॉंसे।।

अखंड गहमरी
अखंड गहमरी updated his status.
बची है चार दिन की जिन्दगी वो छीन लो तुम अब।
ज़हर खा कर मरा तो दोष तुमको दे बैठेगें सब।
मिलेगा चैन फिर मुझको, नहीं तड़पू वहाँ भी मैं..
न जाने बात मेरी मान कर तुम मौत दोगी कब।।

अखंड गहमरी
अखंड गहमरी updated his status.
मुझे वो दूर होकर दर्द से पहचान करवाये।
जलाते किस तरह से दिल, जला कर मुझको दिखलाये।
न करना प्यार अब तुम जिन्दगी में प्यार की खातिर-
लगा कर आग खुशियों में, मुझे वो आज सिखलाये।।

अखंड गहमरी।।
अखंड गहमरी updated his status.
सितारो को कहाँ हक है, करे वो चाँद से शिकवा।
उसे तो चाँद की महफिल, में बस खुद को सजाना है।।
अखंड गहमरी
April 2017
30 April
नहीं है प्‍यार करने का, मुझे हक भूल ये बैठा।
पड़े साया जहॉं मेरा, वहॉं बस शूल उगते हैं।
अखंड गहमरी
 
जरा लब खोल दो अपने, सुना दो बात दिल की तुम।।
चले जाना जरा रूक कर, अभी तो रात बाकी है।
अखंड गहमरी
 
एक ग़ज़ल.....काफी लम्बे अन्तराल के बाद...

मुझे वो प्यार करती है,जमाने से मगर डरती।।
हजारो बात है दिल में, सुनाने से मगर डरती।।

वफा की बात पर मेरे, भरोसा दिल करे उसका।
जुब़ा वो खोल कर बाते, बताने से मगर डरती।।

हजारो रंग के सपने , बुने मेरे लिए उसने।।
दिखाना चाहती मुझको, दिखाने से मगर डरती।।

न आई चाहते मुझमें, कहा नैना झुका मुझसे।।
लिपटना चाहती है वो , लिपटने से मगर डरती।।

तड़पती प्यार म़े वो भी, हकीकत गहमरी समझो।
मिटाना चाहती दूरी, मिटाने से मगर डरती।।

अखंड गहमरी
 
काफी लम्‍बें अन्‍तराल के बाद एक गी‍त लिखने की कोशिश

तड़पता हूँ तड़प दिल की, मिटाने तुम चली आओ।
लगी है आग दिल में जो, बुझाने तुम चली आओ।।

न दिल जलता, न जाती याद, ये है जिन्दगी कैसी।
तड़प दिल की न मिटती है, चुभे वो शूल के जैसी।।
मुझे गर प्यार के काबिल , न समझो तो मिटा देना।
ख़ता मत माफ़ करना और मुझको तुम सज़ा देना।।
कहे जो दिल अभी मेरा, सुनाने तुम चली आओ।
तड़पता हूँ तड़प दिल की, मिटाने तुम चली आओ।
लगी है आग दिल में जो, बुझाने तुम चली आओ।

खफा है लेखनी भी क्‍यों, नहीं मालूम है मुझको।
बता दो दोष मेरा तुम अगर मालमू है तुमको।।
कहे दुनिया न रोता हूँ, हकीकत पर न जाने सब
न है जब अश्‍क ऑंखो में गिरेगें वो कहॉं से अब
नही वो प्‍यार देती है, दिलाने तुम चली आओ
तड़पता हूँ तड़प दिल की, मिटाने तुम चली आओ।
लगी है आग दिल में जो, बुझाने तुम चली आओ।।

सुबह से शाम तक मैं जाम पीता ही चला आया।
नशे में डूब कर भी मैं नहीं उसको भुला पाया
गिरा हूँ याद में उसकी, बदन भी जल रहा मेरा
मगर उसने नहीं पूछा, बताओं हाल क्‍या तेरा ।।
मुझे बस चैन की नीदें,सुलाने तुम चली आओ
तड़पता हूँ तड़प दिल की, मिटाने तुम चली आओ।
लगी है आग दिल में जो, बुझाने तुम चली आओ।।

अखंड गहमरी
 
 
लगेगी आग दिल में जब, नजारा आप देखेगें।
अभी तो दर्द का मुझको, ठिकाना खोज लेने दें।।
अखंड गहमरी।। 
 
7 May 2017 00:36
बताओ दिलजले मुझको, कहा से दर्द लाते हो।
बडे़ ही प्‍यार से पूछा, किसी ने आज ये मुझसे।।
अखंड गहमरी
 

न कोई दर्द दे दिलको, मगर ये मिल ही जाता है ।
छुपा कर लाख रख ले, अश्‍क ये छुप ही न पाता है।।
किया अब प्‍यार दिल ने तो, उसे खुद मैं जला दूगॉं -
मिलेगा दर्द उसको प्‍यार में क्‍यों समझ न पाता है।

अखंड गहमरी।।
 
ज़हर से मारने का अब ,जमाना लद गया यारो।
मरेगा वो तड़प कर उससे, करो बस बेवफाई तुम।।

अखंड गहमरी
 
तुम्‍हारे पास हूँ मैं आज भी वो छुप के है कहती।
सही है बात ये उसकी, हमेशा पास ही रहती ।।
मगर आवाज जब देता उसे मैं माँ कभी कह कर..
न मेरे सामने आती, नदी आँखो से है बहती ।।
अखंड गहमरी।।

न जाने क्‍यों थमी साँसे, अभी तो छॉंव पे हक था।
बुलायूँगा किसे अब मॉं, भवंँर में जब फसूँगा मैं।
अखंड गहमरी।।
 
 
 
 
 

मैं और देव

कुछ साल पहले की बात हैं जब मैं और गहमर भाजपा के देव कुमार उपाध्‍याय एक सैलून में अचानक आमने समाने हो गये। मैं तो उस सैलून के बगल में ही रहता था, वो भी किसी आवश्‍यक कार्य थे आये थे। वर्ष 2012 के चुनाव में जब भाजपा का प्रत्‍याशी दल, बल और धन में कमजोर था, चंद लोग उसके साथ थे, उसमें ये भी थे, इस लिए इस दल का समर्पित कार्यकर्ता के रूप में उनके साथ कभी-कभी बिना चाय की चुस्‍कीयों के राजनैतिक चर्चा भी कर लेता हूँ। मोदी सरकार के कार्यो पर चर्चा शुरू हो गयी । वह साल मोदी सरकार का पहला साल था, फिर भी लोगो की अपेक्षा अौर शिकायतो का दौर शुरू हो चुका था, आरोप प्रत्‍यारोप किये जाने पर भी हम लोगों के बीच गहरी प्रतिक्रिया हुई। चुकि जिस तहर मैं वर्ष 2017 में योगी के मुख्‍यमंत्री बनने लालसा के बावजूद जमानियॉं विधान सभा के प्रत्‍याशी एवं वर्तमान विधायक सुनीता‍ सिंह का विरोध किया उसी तरह वर्ष 2014 के चुनाव में भी मैने मोदी का समर्थन किया मगर वर्तमान तत्‍थाकथित विकास पुरूष मनोज सिन्‍हा का व्‍यापक विरोध अपने नीजी विचारों के आधार पर किया था, इस लिए वो मेरी सभी मेरी बातो को काटते जा रहे थे, तब मैने कहा था कि समय आने दीजिए देखा जायेगा, गंगा में कितना पानी बहता है और क्‍या रंग दिखाता है।

आज गंगा में बहुत पानी बह चुका है, मैं व्‍यक्तिगत तौर पर मोदी सरकार का सर्मथन, काश्‍मीर के मुद्वद्वे, राम मंदिर का मुद्वदा, पाकिस्‍तान को जबाब, गंगा मुक्ति, आतंकवाद, नक्‍सलवाद, देशद्रोहीयों का दमन, मंदिरों की सुरक्षा, घोटालो की जॉंच, सैनिको का सम्‍मान, जैसी गृह मुदद्वो पर किया था। ये मानता था कि पलक झपकते सभी को रोजगार, महगॉंई, काला बाजारी एवं भ्रष्‍टाचार जैसी समस्‍याओं से मुक्ति नहीं मिल सकती, मगर कुछ समस्‍याएे ऐसी थी जिनको 56 इंच के सीने से दो-तीन साल के भीतर दूर किया जा सकता है। कुछ समस्‍याएं अगले 5 साल में दूर होगी।

आज मोदी सरकार स्‍वच्‍छ भारत, नोटबंदी पर ही पूरी अपनी पीठ आप वैसे ही थपथपा रहे हैं, जैसे बिहार में नीतिश बाबू दारूबंदी से। आप भी पुरानी लोक लुभावन जातियों को तोड़ने वाली आरक्षण की राजनीति पर चलने लगे, और वोट बैंक बनाने लगे। आपके लोग कहते है भारत की विश्‍व में इज्‍जत मान बढ़ा है, वैसा इज्‍जत मान किस काम का जब आप के कहने से आप का पड़ोसी शांत न ही हो रहा है। कई देश आपके अपराधीयों और भगोड़ो को छुपा कर बैठे है, और आप की बात एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकाल ले रहे हैं। कागज पर चाहे जितना निवेश हुआ हो मगर हकीकत के धरातल पर आपका निवेश ऩजर नहीं आता। मोदी जी देश का युवा आपको फायर बिग्रेड नेता के रूप में देखा था, हिन्‍दुओं ने आपको अपने सिर का ताज बनाया था आपको, आपके नाम पर एक जुट होकर उत्‍तर प्रदेश का इतिहास बदल दिया, आपको सारी की सारी लोकसभा सीट दे दी, जाति पाति, अमीर-गरीब से ऊपर उठकर , क्‍या बच्‍चे क्‍या बूढे़ सब एक जुट मोदी मोदी। फिर क्‍या कमी थ्‍ाी मोदी जी कि'' जहॉं हुए बलिदान मुखर्जी ---- आप भूल गये।

यहॉं यह भी कहना चाहूँगा कि मोदी सरकार ने जिस मनरेगा का विरोध चुनाव के पूर्व किया उसको न बंद करने की कोशिश किया और न तो उसमें सुधार करने की कोशिश किया, जब की ये बात आम हो चुकी है कि मनरेगा प्रधानो और अन्‍य अधिकारीयों के लिए भ्रष्‍टाचार का एक ऐसा कुॅआ है जिसमे सब कुछ बड़ी आसानी से छिप जाता है। मनमोहन सरकार की जिस जी0एस0टी0 बिल का विरोध आपने किया उसे लागू कर रहे हैं और लागू करन भ्‍ाी रहें हैं अभी तक कड़ाई से उसका पालन करने पर राज्‍य सरकारो को बाध्‍य नहीं कर पाये। बाजार का नीजी करण हो या रेल का मामला हर जगह वो सुविधा जिसका असर सीधे जनता पर पड़ता है आप बुरी तरह नाकाम रहे। मोदी जी आकड़ो की बाजीगरी तो कोई भी कर सकता है, मगर हकीकत के धरातल पर उतर देखीये, आपके अपने शासन और पूर्व सरकारो के शासन मे कोई फर्क नज़र नहीं आयेगा।

अब तीन साल बीतने के बाद मोदी सरकार भले जी ज़श्‍न मना लें, मगर मेरे जैसा आम आदमी मोदी सरकार को सफलता के ईनाम के नाम पर कुछ नहीं दे सकता। काश्‍मीर का हाल वही है जो 14 से पहले था, राम मंदिर पर तो बोलना ही छूट गया, पाकिस्‍तान की हरकत से सैकड़ो शहीद हो चुके है, गंगा माई का हाल आप बहुत दूर नहीं गाजीपुर और गहमर में ही देख लें, आतंकवादी जब जहॉं चाहे बजा दें, देशद्रोही नारे कोई भी कही आसानी से लगा दें, जब केन्‍द्र सरकार के नाक के नीचे विश्‍वविद्यालय में लगता है, तो गहमर गाजीपुर की बात ही अलग है। वैसे गहमर गाजीपुर में तो औकात नहीं है किसी की। मंदिरो का हाल भी देख लें, घोटालो की कोई जॉंच चल भी रही है कि नहीं पता नहीं, कामनवेल्‍थ और कोयला घोटाले जैसे आरोपी आराम से भाजपा जनो के साथ मुर्ग मुस्‍सलम खा रहे है, ये वो बातें हैं जिस पर आप कभी गरजते थे, बरसते थे, आग उगलते थे। कहॉं गया आप का डीजिटल इंडिया। मोदी जी देश एक जुट होकर आपके नोटबंदी जैसे परेशान कर देने वाले फैसले में भी आपके साथ कंन्‍धे से कंन्‍धा मिला कर चल रहा था, वह आपके इन फैसलो पर विपक्षीयों के विरोध के वाबजूद आपके साथ होता, आपको सर्मथन देता, क्‍योंकि आज हम जितने महगॉंई से, बेरोजगार से , भ्रष्‍टाचार से परेशान नहीं उतना उन समस्‍याओं से है जिसके लिए आप को लाये थे, आपके उन फैसलो पर हम सिर उठा कर कहते '' 56 इंचो वाला ग्रेट मोदी।।

स्‍वच्‍छ भारत के नाम पर हाथो में झाडू लिये फोटो के बीच आप जहॉं से चले थे वही खड़े होकर यदि सफलता के ज़श्‍न मना रहे है तो मैं अपनी शुभकामनाएं आपको देता हूँ। आप से वादा करता हूँ कि अगले दो साल तक आप के वादो के पिटारे पूरे होने की राह देखता हूँ साथ ही मॉं कामाख्‍या से प्रार्थना करूगॉं कि वह भारतीय जनता पार्टी को एक बार फिर माननीय अटल बिहारी वाजपेई जी की पुरानी वाली भाजपा बना दें, और इस बार उसके खेवइया मोटीजी आप हो।
जय हिन्‍द जय भारत जय गहमर,

अखंड प्रताप सिंह,ऊर्फ अखंड गहमरी, गहमर,गाजीपुर उत्‍तर प्रदेश 232327 मोबाइल 9451647845, अच्‍छा लगे तो नाम के साथ शेयर करें।।।