मंगलवार, 3 अगस्त 2021

आदरणीय रविश कुमार जी

 

आदरणीय रवीश कुमार जी
वर्तमान पत्रकारिता के दौर में जहॉं मेरे यानि अखंड गहमरी जैसे अशिक्षित और अभ्रद भाषी पत्रकारिता जगत में पर्दापण कर पत्रकारिता जगत को घूमिल कर रहे हैं वहॉं आपको सम्मान मिला मैं आपका सम्मान करता हूँ।
रविश कुमार जी भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दास मोदी को मैं बचपन से नहीं जानता था, बचपन तो दूर 20 वर्ष की उम्र तक नहीं जानता था, मगर जब गोधरा कांड के बाद उन्होनें ने मुल्लो की बिन बारात बैंड बजाई मैं उनका समर्थक हो गया। मैं ही नहीं देश का हर युवा उनका सर्मथक हो गया। 2014 में शासन आने के बाद से आज तक इसी बात का इंतजार रहा कि कब यह धारा हटें। मैं ही नहीं धारा 370 के विरोध में बोलते हुए, उनके चेहरे पर लाल रंग आते मैने अपने ऐसे ऐसे अग्रजो को सुना और देखा जो एक मुझे हमेशा शालीनता की पाठशाल में शालीनता पढ़ाते है।
रविश जी आपने मोदी के विरोध में बोला, आपने हिन्दुत्व के विरोध में बोला मैं चुप रहा, लेकिन जब कल आप धारा 370 के विरोध में जिस प्रकार बोल रहे थे मुझे पुराने दिन याद आ गये।
आप शायद भूल गये होगें लेकिन मैं नहीं भूला जब आपने गहमर पर अपने एक कार्यक्रम को लेकर मेरे बड़े भाई उदय गुप्ता जो आजतक के चन्दौली पत्रकार है सम्पर्क किया तो उन्के द्वारा आपको गहमर में पूर्ण मदद का भरोसा दिया गया ।
आपने शायद उन पर विश्वास नहीं किया और आप अकेले गहमर गॉंव आये और यहॉं की कहानी को आपने केवल चाय की चुस्कीयों में डूबाते हुए यहॉं का इतिहास इस प्रकार प्रस्तुत किया कि गहमर की पहचान आपके कार्यक्रम से दूर रही।
मैंने आपको कई मेल किया, आपको कई फोन किये मगर आपका रवैया मेरी समझ से बाहर था। आपको पत्र भी मिला जब मैने गाजीपुर के पत्रकार/अधिवक्ता ह़दय कुमार सेवराई के द्वारा आपको कोर्ट का लिगल नोटिस भेजा, मगर शायद आपकी पहुँच मेरी पहुँच से अधिक निकली और मेरे अधिवक्ता ने यह कहते हुए कि फाइल कहीं गुम हो गई कार्यवाही का पटाक्षेप कर दिया। बाद में उदय भाई ने भी इस प्रकरण को समाप्त करने का आग्रह किया। तब से लेकर आज तक मैं आपके किसी बात को गंम्भीरता से नहीं लेता। आपसे देश हित की कोई बात की आशा भी नहीं करता, आपसे हिन्दुत्व की आशा भी नहीं करता ।
रविश जी मैं आपसे सीधा प्रश्न करना चाहता हूँ कि मेरी औकात तो एक खटीया खरीदने की भी नहीं ऐसे में मैं काश्मीर में प्लाट लेने की सोच भी नहीं सकता।
मेरा विवाह हो चुका है दो बच्चे है ऐसे में मैं काश्मीरी लड़की औरत के साथ विवाह भी नहीं करता ।
दिल्ली में सुभाष सर का अपना मकान, मम्बई में श्री सतीश वर्मा का अपना मकान खाली पड़ा है जो बार बार मुझे कहते है चले आओ गहमर छोड़ कर, मगर ये दिल है कि मानता ही नहीं, गहमर से 35 किलोमीटर गाजीपुर जिला मुख्यायल दो साल रहा छोड कर चला आया।
मेरे पास पूँजी भी नहीं है कि मैं काश्मीर में जाकर कोई व्यवसाय कर सकूँगा, तो फिर मुझे क्यों जरूरत थी कि धारा 370 हटे। इस लिए जरूरत थी कि काश्मीर में मेरे बाबा अमरनाथ है, जम्मू में मेरी वैष्णो मॉं है, काश्मीर में मेरे अन्य कई देवताओं के स्वरूप हैं। काश्मीर भारत का अंग था और रहना चाहिए था, मेरा काश्मीर से कोई व्यक्तिगत लाभ हो न हो।
आप द्वारा बार बार धारा 370 हटने से नुकसान- नुकसान कहने का क्या आधार है, यह तो मैं नहीं जानता और ना ताे आपने ही साफ किया है कि नुकसान क्या है।
ऐसे में रविश कुमार जी आप केवल अपनी उल्टी प्रवाह के पत्रकारिता के लिए धारा 370 हटाने का विरोध कर रहे हैं यही सत्य है, वरना मैं तो प्रमाण दे सकता हूँ कि आप किसी स्थान, किसी वस्तु, किसी व्यक्ति के विषय में पूरी जानकारी प्राप्त किये बिना केवल प्राइम शो चलाते हैं, टीवी पर आने की बात कह अपने पीछे कुछ लोगो को दौड़ाते हैं। रवीश जी अभी भी वक्त है छोडीये 14.29 प्रतिशत की चमचागिरी और आईये 83 प्रतिशत के साथ कदम से कदम मिला कर चलीये।
भारत को एक स्वस्थ हिन्दू, हिन्दी, राष्ट्र बनाने के दिशा में मिल कर झंडा बुलंद करीये।
*आपका एक पुराना परिचित अखंड गहमरी'उग्र'*

गहमर का महाविद्यालय

 

*बहती है गहमर में उल्टी गंगा,स्नातक से कान्वेन्ट का सफर*
मैं पढ़ाई में कितना तेज था इसका अंदाज इस बात से लगा सकते हैं कि मुझे कक्षा 10 से कक्षा 13 यानि B.A प्रथम वर्ष में पहुँचने में कुल 9 साल लग गये। अपनी झुन्नी मौसी की कृपा से किसी तरह बिहार के मुँगेर जिला स्थित कुमसार गाँव से हाई स्कूल पास किया। परीक्षा मेरी थी मगर मेरे साथ लगे थे मेरे मामा हेमन्त, मेरे मौसी के देवर, मेरी मौसी के ननद के लड़के, मेरे बड़े मामा राधेश्याम सिंह के साढू, और न जाने कौन कौन, जैसे सोयेब मलिक को शतक बनबाने में पूरी पाक टीम। वह तो शतक नहीं बना पाया मगर में 59.98 प्रतिशत से पास हो गया।
इन्टर में भी कुछ ऐसा हुआ 4 सालो की जद्दोज़हद के बाद मैं 33 प्रतिशत अंक लेकर यूपी इन्टरमीडिएट बोर्ड पर एस्हसान करते हुए उसका पीछा छोड़ दिया। अब मैं स्नातक का छात्र 2002 में हो गया। मम्मी के जिद आगे मुझे बी.ए में एडमिशन गहमर के माँ कामाख्या महाविद्यालय में लेना पड़ा। माँ कामाख्या महाविद्यालय में प्रवेश लेता भी क्यों नही? घर से नजदीक, योग्य अध्यापक, हिन्दी, अँग्रेजी, इतिहास, समाजशास्त्र, जैसे अन्य विषय उपलब्ध, प्रतिदिन क्लास, लगभग 900 बच्चे, खेल का साजो सामान, अनुशासन, सब कुछ तो था।
मैं पढ़ने लगा , और पढ़ने क्या लगा बस सब जानते थे व्यवसायी है, तो क्लास से नदारद रहना जन्मसिद्ध अधिकार है। इसी बीच शादी हो गई, मैं ठहरा पढ़ने में पीछे से नम्बर एक, बीबी ठहरी आगे से नम्बर एक।
कक्षा 12 की परीक्षा दे रही थी , परीक्षा के दौरान ही शादी थी, एक पेपर तो शादी के बाद भी था, फिर भी 80 प्रतिशत से 12 पास l मैं 33 प्रतिशत से 12 पास वो 80 प्रतिशत से। अब वो भी माँ कामाख्या की स्टूडेंट और मैं भी। समय बीतने लगा, सबको आशा थी कि अब महाविद्यालय में विषयो की संख्या में बढ़ोत्तरी होगी, स्नातकोत्तर की उपाधि मिलेगी। पर यहाँ तो उल्टी गंगा बहने लगी, गहमर रेलवे स्टेशन से 400 और बस स्टेशन से 200 मीटर, एक तरफ गहमर इन्टर कालेज, दूसरी तरफ जुनियर हाई स्कूल, सामने पंचायत भवन, गहमर का स्टेशन रोड होने के बावजूद यह महाविद्यालय बैक गेयर लगा बैठा। भवन बढ़े, मुख्य गेट पर कार्यालय बना, मुख्य गेट का सुन्दरी करण हुआ, दुकाने भी बनी और इसके साथ एक तरक्की और हुई, माँ कामाख्या महाविद्यालय ने एक कदम पीछे बढ़ाया और शुरू किया, माँ कामाख्या किड्स के नाम से माँ कामाख्या कान्वेंनट स्कूल।
महाविद्यालय के जिन कमरों में, जिन भवनो में कभी स्नातक छात्र पढ़ा करते थे वहाँ अब नन्हें मुन्हें बच्चे पढ़ने लगे, वहाँ कृर्षि एवं अन्य विशेष कार्य होने लगे। मध्य दोपहरिया में जहाँ स्नातक के बच्चे निकलते थे वहाँ अब नन्हें मुन्हें बच्चे निकलने लगे। पूरी ग्रेजुएट की पढ़ाई व्यवस्था चौपट हो गई। विद्यार्थियों के नाम रजिस्टर पर चलने लगे। जो छात्र-छात्रा क्लास भी करना चाहें, उन्हें बच्चों के न आने का बहाना बना दिया गया।
हालात यह हुए माँ कामाख्या डिग्री कालेज संसार के चंद ऐसे महाविद्यालय में सामिल हो गया जिसमें बच्चों की संख्या केवल परीक्षा के समय दिखाई देती है। 70-75 उपस्थिति पर परीक्षा दे पाने की अनिवार्यता सुविधा शुल्क के नीचे दब गई। गहमर की विशेष तौर पर बच्चीयो के उच्चशिक्षा पर ग्रहण लग गया। महाविद्यालय का प्रवंधन अपने पहुँच के बल पर अपने स्वार्थ सिद्धि में लगा हुआ है और बर्बाद कर रहा है गहमर के बच्चों खास तौर से बच्चीयो का भविष्य जिनके पास कोई विकल्प नहीं।
बाप सेना में कार्यरत है, बेटी गाँव में है, आज के हालात को देखते हुए किसी बाप के पास इतना कलेजा नहीं जो बेटीयों को शहर में अकेले छोड़ कर उच्च शिक्षा ग्रहण कराये और जो गाँव में स्नातक विद्यालय है उसकी दशा यही है वह प्रवंधन कमेटी के मनमानी से 1990 के दशक से चला 2010 के दशक में और पीछे ही हो गया। सब जानते हुए भी सरकार, यूजीसी और पूर्वाचंल विश्वविद्यालय का कोई नुमाइंदा पूछने वाला नहीं, जनता भी परीक्षा सुविधा में मस्त।
स्नातक से स्नातकोत्तर का सफर , स्नातक से कानवेंट की व्यवस्था पर आ गया..महाविद्यालय के वर्ष 2019-2020 के प्रवेश रजिस्टर में सैकड़ो छात्र-छात्राओ का नाम दर्ज हो चुका होगा, रकम खातो में जमा हो चुकी होगी, और हकीकत के धरातल पर पढ़ाई आप खुद देख लें आ कर।
इतने के बाबजूद मिल कर नारा लगाये
#बेटी बचाओ, #बेटी पढ़ाओ
अखंड गहमरी, गहमर गाजीपुर।।

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आदरणीया मीरा चौरसिया जी

 

आदरणीया श्रीमती मीरा चौरसिया जी ग्राम प्रधान ग्राम गहमर, जनपद गाजीपुर उत्तर प्रदेश पिन 232327 आपको अखंड गहमरी का प्रणाम। अरे! क्षमा करीयेगा मीरा देवी तो आप का नाम 2015 पंचायती चुनाव के पर्चा दाखिला में था। अब तो आपका नाम मीरा दुर्गा चौरसिया हो गया।
हाँ तो आदरणीया मीरा दुर्गा चौरसिया जी पूरे गाँव में चारो तरफ पानी ही पानी है और आपको चुल्लू भर पानी नहीं मिल रहा है डूब कर मरने के लिए?
वैसे भी आप जिंदा हैं ही कहाँ? आपकी तो मानवीय संवेदनाएं, नैतिकता , कर्मठता सब मर चुकी है। लाज-शर्म सब घोल कर पी चुकी हैं। आप तो बस हाँड-माँस का एक निर्जीव प्राणी जो साँस ले रहा है वह बची हैं।
मुझे तो लगता है आप पूरी तरह अंधी भी हो चुकी हैं। अपने स्वार्थ में, अपने धनोपार्जन अपने लालच में लेकिन यह मत भूलीयेगा कि यह अंधापन आपको ऐसी जगह ले जायेगा जहाँ से लौटना आपके लिए संभव नहीं होगा।
आप को लग रहा होगा न कि आप पिछड़ी जाति की हैं और मैं राजपूत इस लिए बोल रहा हूँ न? लगना भी चाहिए क्योंकि सत्य न सह पाने पर स्वातं संवेदना हेतु कुछ तो आधार चाहिए तो यही आधार सही। एक आधार मैं और देता हूँ आप यह भी कह सकती हैं कि मैं आपके पास चंदा माँगने गया और आपने नहीं दिया यह उसी की खीज है। कोई बात नहीं आप कहें और इसी से संतुष्ट रहें।
आदरणीया मीरा चौरसिया अरे स्वारी मीरा दुर्गा चौरसिया जी गहमर गाँव में आने- जाने, स्टेशन रोड, जिस पर गहमर इन्टर कालेज, बैंक, पोस्ट आफिस जैसे महत्वपूर्ण प्रतिष्ठान हैं, आर एस मेमोरियल से पकड़ीतर जाने वाला रास्ता , गंगा घाट मार्ग हो, सरस्वती शिशु मंदिर से लेकर गंगाघाट आने वाला मार्ग हो चाराे तरफ जल जमाव है। लोग परेशान हो रहे हैं और आप अपने असहयोगो की दुहाई दे रही हैं। वाह रे! आपकी प्रधानी, मुझे तो शर्म आती है आपको प्रधान कहते हूुए जो इतना नीचे गिर चुका है कि उसे अपने जनता की समस्या नहीं दिखाई दे रही है।
अगल लाज शर्म हो तो कभी सुबह और दोपहर में आकर गहमर थाने के पास और आर0एस0 मेमोरियल स्कूल के पास खडे़ हो जाईये, देखीये छोटे छोटे बच्चे कैसे आ जा रहे हैं, कैसी बूढे व्यक्ति, बूढी महिलाएं आ जा रही हैं। कैसे स्टेशन से उतर कर लोग जा रहे हैं। मेरी चिंता मत करीयेगा मेरे पास तो आपकी तरह वो बअअड़ी वाली गाड़ी नहीं लेकिन बाइक है मैं तो 10 बार भी आराम से आता जाता हूँ परन्तु अन्य लोगो को देखीयेगा कैसे झेलते हैं। आर एस मेमोरियल स्कूल के पास,जरही स्कूल के पास और जल जमाव से महीनो से बंद पड़े राजकीय कन्या विद्यालय के पास खड़े हो कर देखीये शर्म आती है क्या? मेरा दावा है कि आपको शर्म नहीं आयेगी, क्योंकि आपके अंदर मानवता-संवेदना ही नहीं है वो तो शपथग्रहण के साथ ही मर चुकी है। अगर जिंदा होती तो आपके पास फंड है, मशीन चला कर , आदमी रख कर सफाई कराई जा सकती थी। फंड नहीं होता तो वीडीयो से लेकर जिलाधिकारी तक आप रौंदतीं । पर यह तब होता जब मन में कुछ करने की शक्ति हो। मन में विकास की चाह हो, मन में कुछ कर गुजरने की क्षमता हो, मन में कुछ न कर पाने की पीड़ा हो। मन में यह पीड़ा हो कि हमारे गाँव की बच्चीयाँ महीनो से स्कूल नहीं जा पा रही हैं। मीरा देवी जी गहमर एक ऐतिहासिक महत्व का गाँव है, आप जैसे निष्कृय प्रधानो की वजह से आज यह जहाँ के हालात बुरे सी भी बुरे हैं । चारो तरफ समस्याओं का बोल बाला है, वह भी समस्याएं जो दैनिक जीवन में सीधे प्रभाव डालती है।
आप कहती है कि आपके पास सफाई कर्मी नहीं हैं, क्यों नहीं आप शासन पर दबाब बनाती है? कि यहाँ सफाईकर्मी आकर व्यवस्था को ठीक नहीं करेगें तो मैं पूरे गाँव को लेकर सड़क पर आ जाऊँगी। क्योंकि नहीं आप शासन पर दबाब बनाती है कि यदि गहमर के स्वास्थ केन्द्र में डाक्टर और वहॉं की व्यवस्था सही नहीं हुई तो मैं पूरे गॉंव को लेकर गहमर रेलवे स्टेशन जाम कर दूँगी?क्योंकि नही आप आप शासन पर दबाब बनाती है कि गहमर राजकीय कन्या विद्यालय की हालत में सुधार नहीं हुआ तो मैं गाँव वालो को लेकर धरने पर बैठ जाऊँगी? क्यों नही आप पूरे गॉंव की खुली बैठक बुला कर समस्याओ को रखती हैं ?
आप हर बात में विधायक को दोष देती हैं, आप विधायक की तरफ नज़र उठाती हैं, तो प्रधान जी मैंने भी पंचायती राज एक्ट पढ़ा है, मैने भी विधायक और प्रधान के कार्य पढ़ा है। दोनो के अधिकार और कर्त्तव्य मालूम है। आप को लगता है कि विधायक आपको काम करने नहीं दे रही हैं तो आप जनता के सामने खुल कर कहें। नहीं आप कह भी नहीं सकती क्योंकि आपको पता है हकीकत के धरातल पर आपके आरोप निराधार हैं और आप में इतने छेद हैं कि जरा सी शासन की जाँच आपको सलाखों के पीछे पहुँचा देगी।
आज आप को गहमर केवल एक दुघारू गाय नजर आ रहा हैं । जिसको केवल दूहना है। आप को यह काम दिखाई नहीं देगा। आप तो बस शौचालय में कमीशन, प्राइमरी और मीडिल स्कूलो के मध्यायन भोजन में एन पी आर सी यों पर दबाब बना कर 15 प्रतिशत कमीशन, मनरेगा में उच्चे लोगो को मजदूर बना कर उनके नाम पर बैंक में पैसा, अपने परिवार एंव अन्य ऐसे लोग जो किसी पेशे में नहीं हैं उनके नाम पर चेको का भुगतान में लगी है ना ना ना मीरा चौरसिया जी सोचीयेगा भी मत, मेरे ऊपर किसी प्रकार के कार्यवाही का या मेरी पत्नी को किसी प्रकार परेशान करने के लिए क्योंकि आपके पास अफरात पैसा राजनीतिक पहुँच होगी। मगर मैं जानता हूँ कि वक्त के पहिये को कहाँ और कैसे मोड़ा जाता है। मुझे डर केवल आम आदमी से लगता है सूप से लगता है आप जैसे अंगूरो या चलनीयों से नहीं।
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विश्‍व पुस्‍तक मेले में गहमर

 

विश्व पुस्तक मेले में आखिर जासूसी उपन्यास और जासूस शब्द के जनक स्व0 गोपाल राम गहमरी ने अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी। 10 जनवरी 2018 मेरे लिए एक ऐतिहासिक दिन था।
अगर मैं ईमानदारी पूर्वक इस उपस्थित का श्रेय दूँ तो केवल दो नाम सामने आते हैं, श्री सुभाष चन्दर जी और श्री गीरिश पंकज जी। इन दोनो ने न सिर्फ मुझे मेले में आने एवं परिचर्चा कराने के लिए आदेशित किया, बल्कि अपने विशिष्ठ से विशिष्ठ कार्यक्रमों को छोड़ कर इस कार्यक्रम के मुख्यअतिथि, अध्यक्ष बन कर कार्यक्रम को ऊँचाई दिया। यही नहीं कार्यक्रम कैसे संचालित होगा क्या होगा इसकी पूरी व्यवस्था सुभाष चन्दर सर ने किया।
मैं आयोजक था 10:45 पर हाल में प्रवेश किया और ये अतिथि थे 10:30 आकर पर व्यवस्था बना रहे थे।
सरिता भाटिया जी जो एक स्वयं में हस्ती है मेरे साथ बैनर लगवा रही थी और जिन्दगी में पहली बार मंच के संचालन की बागडोर संभाली।
पुस्तक मेले में जहाँ तक मैनें देखा आज का यह कार्यक्रम चंद उन कार्यक्रमों में था, जहाँ किसी प्रकार का आडम्बर नहीं था। किसी किताब की समीक्षा नहीं थी, किसी बड़ी हस्सी के स्वागत में लोगो की भीड़ नहीं थी। यह कार्यक्रम एक ऐसा कार्यक्रम था जहाँ आज भारत का सबसे बड़ा आलोचक/व्यंगयकार सुभाष चन्दर, भारत का प्रसिद्ध उपन्यासकार गिरीश पंकज, भारत का प्रसिद्ध नवगीत का हस्ताक्षर राधेश्याम बंधु और दिल्ली की प्रसिद्ध महिला समाजसेवी सरिता भाटिया नतमस्क होकर उस महान आत्मा को अपने शब्दो से नमन करते हुए दिखाई दिये।
अगर हम बात वक्तव्यों की करें तो सुभाषचन्दर जी जैसा लेखक कहते सुना गया कि भारत के गद्य साहित्य की दिशा और दशा सुधारने वाले को हम वह सम्मान नहीं दे पाये जिसका वो हकदार है, और इसका दोषी पूरा साहित्य समाज है।
गीरिश पंकज जी जैसा उपन्यासकार कहता है कि हम गोपालराम गहमरी जैसा उपन्यास लिखना चाहते हैं पता नहीं प्रयास कहाँ तक सफल हो। वह यह अपील करता है कि आज के प्रकाशक समकालिन लेखको रचनाकारो के साथ-साथ गोपाल राम गहमरी जैसे पुरोधाओं को अपने प्रकाशन में स्थान दें।
मैं तो फिर भी मैं हूँ बिच्छु का मंत्र न जानते हुए भी साँप के बिल में हाथ डालता हूँ। आज विश्व पुस्तक मेले में इस आयोजन से मैने बहुत कुछ सीखा-समझा, जाना वह अनुभव लेकर मैं अपने गाँव लौट रहा हूँ, मगर इतना तय है कि अगर परमात्मा का दिया जीवन रहा तो एक नये जोश, नये उमंग और नये तैयारी के साथ फिर अगले साल विश्व पुस्तक मेले में ही नहीं बल्कि राज्यो और कसबो में गोपाल राम गहमरी पर कार्यक्रम लेकर हाजिर रहूँगा।
मैं उनमें से नहीं जो असफता-सफला को लेकर जीते हैं मैं तो उनमें से हूँ जो असफता और सफलता से परे पर चलना जानते हैं चलते रहना जानते हैं।
अन्त में मैं एकबार फिर आज के अपने मार्गदर्शक सुभाषचन्दर सर, गिरीश पंकज सर, राधेश्याम बंधु सर एवं सरिता भाटिया जी के चरणो में एक सफल एवं उद्देश्य पूर्ण कार्यक्रम सम्पनन कराने पर प्रणाम निवेदित करता हूँ। आशा करता हूँ कि भविष्य में भी आप यूँ ही मार्गदर्शन करते रहेगें।
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मन की बात गहमर कार्यक्रम 2016

 

गहमर का कार्यक्रम-- अपने मन की बात आपके लिए।।
साहित्यकार नहीं मेरा परिवार आता है जो कार्यक्रम नहीं एक उत्सव मनाता है।
आप सभी लोगो के आशीर्वाद से गहमर का कार्यक्रम समाप्त हुआ। तमाम परेशानीयों के बावजूद भोपाल से कान्ति मॉं का आना इस कार्यक्रम को सफल बना गया, वह और अरूर्ण अर्णव खरे जो जितनी परेशानीयों का समाना करके गहमर पहुँचे उनका एक प्रतिशत भी मैं उनका स्वागत सत्कार नहीं कर पाया।
कान्ति मॉं का आना न सिर्फ मेरे लिए बल्कि मेरे पूरे परिवार के लिए एक सुखद एहसास रहा, कसक रही तो बस इतनी की हम दोनो एक पल भी साथ बैठ न पाये, यहॉं तक कार्यक्रम में आने के 12 घंटे बाद मेरी उनसे मुलाकता हो पाई। क्या सेवा हुई नहीं हुई मैंं खुद भी नहीं जान पाया लेकिन उन्होनें भावुक इतना कर दिया कि ऑंखे संभाले नहीं सभल पाती थी।
गत वर्ष की तमाम परेशानीयों को नजर अंदाज कर, सुभाष चंदर सर, जो इस बार ट्रेन के देरी और भारी बारिस के कारण कैसे गहमर पहुँचे इसका एहसास खुद उनको नहीं है, मैं उनको और उनके स्नेह को प्रणाम करता हूँ। परेशानीयों को नजर अंदाज और अपना स्नेह लिए प्यास अंजुम सर, रमा दीदी, सुनील कुमार नवोदित, अशोक व्यग्र, गोया दानिश जी, समीर परिमल जी, नीलम श्रीवास्तव जी, डा0 संदीप अवस्थी जी भी न सिर्फ दुबारा आये, बल्कि खुद ही इस कार्यक्रम के आयोजक की भूमिका निभाई।
इस बार कार्यक्रम में आदरणीय लक्ष्मण प्रसाद लडीवाल जी, एवं चन्द्रावती नागेश्वर जी की पुस्तक का लोकापर्ण भी हुआ।
कार्यक्रम में गहमर की माटी से जुड़े कुमार संजय का आना सुखद रहा, उनके साथ आये विनोद सवॉंरिया जी, और मनोज शुक्ला, जी को भी मैं,, ह़दय से नमन करता हूँ।
गहमर के कार्यक्रम में परिचर्चा के बाद हुए काव्य पाठ इस बार भी पूरे भारत को संदेश देने में कामयाब रहा कि यदि योग्यता हो तो कोई कवि बिना लतीफे, चुटकुले के सहारे जनता को बाध सकता कर बात सुना और समझा सकता है।
कार्यक्रम के दौरान
गत वर्ष की तरह इस वर्ष भी महिला अतिथियों के रहने की व्यवस्था अपने आवास पर किया, जिससे मेरे घर में एक उत्सव का माहौल बन गया, रमा दीदी, आशा ओझा दीदी, आराधना जी, नीलम आन्टी, चन्द्रावती आन्टी, उर्मिला जी, सरिता भाटिया, वीणा श्रीवास्तव जी, उर्मिला शुक्ला जी, रेखा दूबे जी ने बच्चो के साथ मिल कर ऐसा अपनत्व दिखाया कि भूलाये नहीं भूलता है, न कहना बेमानी होगी, कि आशा पान्डें ओझा दीदी की नकल आज भी मेरी बेटी उतारती है, उनका हर बात में गाना गाना वह भी सीखने की कोशिश करती है। गहमर के मंच संचालक ने तो उनको महिला लीडर का नाम तक दे दिया। रमा दीदी के जो इतनी दूर रहते हुए भी पूरे साल बच्चों के दिमाग से उतरी ही नहीं, कार्यक्रम के शुरू होने से पहले से ही उनके नाम को लेकर आने न आने की शर्ते लगना शुरू हो गई थी। मैं आप सब का आभार जता कर आपके स्नेह को कम नही करना चाहता लेकिन इतना जरूर कहूॅगा कि अगर जिन्दगी चार दिन की ही है तो यह दो दिन आप सब के स्नेह से पूर्ण रूप से सफल हुआ।
अगर कार्यक्रम में मानसिक मनोबल की बात हो और आदरणीय विकल जी, संजीव निगम जी, विजय कुमार मिश्र दानिश जी अपनी सुविधा पर मेरे दौड़ने पर और बैठने के लिए ही परेशान रहते, वह कार्यक्रम के हर चरण पर अपनी निगाह रखें रहें। संजीव निगम जी सर और विकल गुरू जी ने तो लौटने समय मुझे अपने सीने से लगा लिया और मैं पागल कुछ बोल भी न पाया बस, देखता ही रह गयाा ।कार्यक्रम में अगर मैने भोजन किया ताे उसका श्रेय सुनील कुमार नवोदित जी को ही जाता है, अपनी थाली रख कर जबर्दस्ती सब काम रोक कर मुझे खाना खिलाये बिना हटते ही नहीं थे।
मैं दोषी भी हूँ कार्यक्रम में आये रमेश कुमार सिंह जी का, अंकुल शुक्ला जी का, हमेन्त कुमार कीर्ण जी का,डा कैलास नाथ मिश्र जी, बसंत कुमार शर्मा जी का जिनकी उपस्थिती का लाभ पूर्ण रूप से हम सब नहीं उठा सके। बसंत जी के साथ तो मैं एक पल बैठ भी नहीं पाया और न तो उनकी कोई व्यवस्था ही देख पाया मैं। साथ ही मैं सुरेश कुमार जसाला जी, देव नारायण शर्मा जी का , हरि जोशी जी का, विशेष आभारी हूँ जो स्वास्थ ठीक न होते हुए भी कार्यक्रम में आकर मेरा मान बढायें। हरि जोशी सर तो अपनी बिमार जीवनसंगनी के साथ गहमर आये। उनका भी हार्दिक आभार।
पाडृव तो एक होकर काम किये क्योकि वह भाई थे मगर मेरे कार्यक्रम में भी संजय कुमार गिरी, प्रदीप भटट, सागर सूद, देव कान्त शुक्ला, और राजकिशोर प्रताप गढी के रूप में मौजूद थे, मैं भले कुछ न कह पाया उस समय मगर व्यवस्थाओं को संभालते, उत्सावर्धन करते मैने अपनी आखो से देखा।
हद तो तब हो गई जब पंजाब से आये सागर सूद ने पूरे जीवन बैगन की सब्जी नहीं खाई थी और गहमर आकर 4 टाइम बैगन की सब्जी प्रेम से खाई, और कभी कभी बैगन पर व्यंग्य कर माहौल और थकावट को दूर करते, वह समय आनन्द को छोड कर और कुछ नहीं देता।
इस वर्ष गहमर के कार्यक्रम में उस व्यक्ति का आना भी सुखद रहा जिसके घर में गहमर के कार्यक्रम की नीवं पडी चर्चा चली वह कोई और नहीं सिवनी से आये हुए मेरे बड़े भाई, प्रद्युम्न चतुर्वेदी प्रसित जी, स्वयं कार्यक्रम में मौजूद हुए।
कार्यक्रम में आये शांति कुमार स्याल जी से तो मिल कर लगा कि मेरी कुछ बाते केवल उनके मार्गदर्शन का इंतजार कर रही है, कार्यक्रम के अगले दिन काफी विस्तार से चर्चा कर कई बातो को समझाना, बताना ऐसा लगा ही नही कि वह किसी अन्य जगह आये हो और अन्य से बाते कर रहे हो, उनको भी मैं ह़दय से प्रणाम करता हूँ।
अगर मेरी एक लापरवाही किसी पर भारी पड़ी तो वह थे विजय शंकर मिश्र दानिश जी, जिनको ट्रेन के गलत समय की जानकारी देने के कारण उनकी ट्रेन छूट गई और उनको दिल्ली होकर जयपुर की लम्बी यात्रा करनी पड़ी जिसका मुझे आजीवन कष्ट रहेगा, मगर उन्होनें ने एक शब्द नहीं कहा यह उनकी महानता थी।
कार्यक्रम में दौरान आये गंगटोक से अमर बानियॉं लोहोरो जी, अर्जुन राई जी ने तो उत्तर को पूर्वोतर से पूरी तरह से जोड दिया, काफी संभ्यताआंे की जानकारी, भाषा की जानकारी बहुत कुछ सीखने को मिला।
इसके साथ ही मैं नागेश्वर शाडिल्य जी, शैलेन्द्र जी, अंचला पान्डेय जी और जिनका संबोधित नही कर पाया हूँ उनका योगदान भी कार्यक्रम मेंं मुझसे अधिक रहा, यह कार्यक्रम आप सब का था, आपने इस को अपनाया।
कार्यक्रम के ठीक पहले बुरी तरह बिमार पडे गुरूवर जिनकी आवाज सुन कर मैने स्वयं आने से मना किया प्रोफेसर विश्वम्भर शुक्ला जी, और भाई ओम प्रकाश जी और लता आन्टी एवं डा0 देवेन्द्र नाथ साह का का पूरी तैयारी के बाद अंतिम समय पर नही पहुँच पाना बहुत ही कष्टदायक रहा। साथ ही मेरे अग्रज और मार्गदर्शक मेरे गुरू डा0 कमलेश द्विवेदी जी का भारत में नहीं रहने के कारण कार्यक्रम में मौजूद न हो पाना एक बहुत बडी कमी रहा। वही गाजीपुर के हरीश नारायण हरीश जी का स्वास्थ कारण से न पहुँच पाना कार्यक्रम के संचालन में व्यवधान उत्तपन किया।
अन्त में मैं यही कहना चाहूँगा कि यह कार्यक्रम सफल या असफल रहा इसका मुल्याकंन तो आने वाले लेकिन इस वर्ष मैं अपनी व्यस्था से 50 प्रतिशत संतुष्ठ रहा, वही गत वर्ष के कार्यक्रम के पूर्व तनाव से भी इस बार आप सब एवं विशेष रूप से कान्ति मॉं के कारण तनाव मुक्त रहा। इस वर्ष भी कार्यक्रम के दौरान भारी बारिस ने बहुत परेशान किया। मगर आप सब का सहयोग और प्यार ने बारिस की बूँदो को भी मुझे हराने नहीं दिया। साथ ही इस कार्यक्रम के विषय में कई लोगो द्वारा की जा रही गंदी राजनीति से भी मुझे लडने का बल दिया, राजनीति करने वाले लोग आप सब की मेहनत से जमीन पर आये।
यह बाते मेैं मंच से कहना चाहता था, मगर न जाने क्या हो जाता हैं अपने अंतिम व्यतव्य के समय ऑंखो से लाचार हो जाता हूँ, छुपाने से भ्ी नहीं छुपते न रोके से रूकते है। क्योकि मैं कार्यक्रम नहीं एक उत्सव करता हूँ, और साहित्यकार नहीं अपना परिवार बुलाता हूँ। अपने मार्गदर्शक बुलाता हूँ, अपने अग्रज बुलाता हूँ।। जो हमेशा स्नेह के बोल ही बोलते है,और दुख में भी आशीर्वाद ही देते है।
एक बात और कहना चाहूँगा उनके लिए जो तैयारी के बाद भी यहॉं नहीं आ पाये कि गहमर कामाक्षी क्षेत्र है, और गहमर के कार्यक्रम में सबसे महत्वपूर्ण कामाख्या दर्शन होता है, इस लिए यहॉं के कार्यक्रम में जब तक मॉं का बुलावा नहीं हो आप लाख यतन करके भी नहीं पहुँच सकते, इस लिए न पाने का दोषी खुद को न समझे। जब मॉं का बुलावा आयेगा तो आप सारी परेशानीयों को पार करके गहमर आ जायेगें।
आप सब को हुई असुविधा के लिए आप सब क्षमा मॉंगते हुए अपनी बात समाप्त करता हूँ। आपके स्नेह ककी आशा में अखंड गहमरी गहमर

अ से तुम आम

 

एक महिला अध्यापिका को शायरी का भूत लगा और बच्चो को शायराना अंदाज में पढ़ाती है।

देखे- संसोधन अपेक्षित

अ होता आम लिखकर फिर, श से शिमला लिखो बच्चो।

उठाओ अब कलम कागज जरा इमला लिखो बच्चो ।।

क से हम हैं कलम लिखते,भ से भारत, ह से हिन्दू

ख से खरगोश बनता है, ग से गमला लिखो बच्चो।।

पहन कर हाथ में जिसको, समय तुम को बताते है ।

घ से बनती घड़ी है वो, व से विमला लिखो बच्चो।।

छुपाये जो छुपाने दो,मगर तुम बात सच कहना ।

चली गोली मरे सैनिक, ह से हमला लिखो बच्चो।।

पढ़ाने दूर से आई, किये श्रृंगार मैं सोलह।

अगर सुन्दर लगूँ तुमको, तो इक जुमला लिखो बच्चो।।

अखंड गहमरी

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बना कर आज भारत की

 

एक रचना-:
बना कर आज इ‍‍क तस्वीर, भारत की दिखाता हूँ।
कहॉं किसका करें दर्शन, सभी को मैं बताता हूँ।
करें बरफानी का दर्शन सभी कश्मीर में जा कर
बसी कटरा में मॉं वैष्णो, करो दर्शन मिलेगा वर ।।
जिसे सब भगवती जाने वो विन्ध्याचल में रहती हैं
लुटाती प्यार वो अपना , सभी के मन में बसती हैं
अधोध्या राम की है भूमि, तुम्हें महिमा सुनाता हूँ
बना कर आज इ‍‍क तस्वीर, भारत की दिखाता हूँ।
न कामाख्या कहो उनको, सभी जन मॉं उन्हें माने
असम के साथ गहमर में, बिराजे ये सभी जाने
जहॉं पिताम्बरी देवी, रहे दतिया उसे कहते
बसी मॉं शारदा मैहर, जहॉं आल्हा भी हैं रहते।
किशन पैदा हुए मथुरा,चलो उनसे मिलाता हूँ।।
बना कर आज इ‍‍क तस्वीर, भारत की दिखाता हूँ।
जरा तुम कालिका मिल लो जाकर कोलकाता अब
उड़ीसा में बसी विमला कहो भक्तो चलोगें कब
उमा सीता रहे मिथिला, शिवानी रामगिरि रहती
चलो अजमेर पुष्कर तुम यही मॉं गायत्री कहती
नमन सब देव को मेरा, चरण में सिर झुकाता हूँ
बना कर आज इ‍‍क तस्वीर, भारत की दिखाता हूँ।
बसी हरिद्वार मेंं मंशा, पहाडी चढ़ के जाना है।
लगाने भोग बाला को तुम्हें तिरुपति भी आना हैं।
न कोई धर्म हिन्दू सा, न कोई देश भारत सा।
जहाँ हर कोने में भगवन, कही दर्शन के तू सुख पा।
चलो मिल करे दर्शन, टिकट मैं भी कटाता हूँ।
बना कर आज इक तस्वीर, भारत की दिखाता हूँ।।
अखंड गहमरी गहमर गाजीपुर।।

हामिद जी

 भारत के पूर्व उपराष्‍ट्रपति के बयान पर अखंड गहमरी काफी खुश है, बहुत खुश । जानते हैं आप अखंड गहमरी को? नहीं न ? जान लीजिए श्रीमान ,वो महान साहित्‍यकार, महान पंडित , महान चम्मच अखंड गहमरी मैं ही हूँ। आप नमस्‍कार नहीं करेगें? मत करिये। क्‍योकि आप आज बयान पर हल्‍ला मचा रहे है।  मचाईये हल्‍ला, आपकी कौन सुनेगा। हा हा हा हा, आपके अपने लोग भी आपकी बात नहीं सुनेगें। देख नहीं रहा हूँ मैं , कुछ विरोध तो कुछ समर्थन, कुछ के भाषा पर एतराज। पर  सब तो मेरी सुनेगा। मैं तो उनके हौसले की दाद देता हूँ।  एक तरफ देश का राष्‍ट्रपति बैठा हैै, प्रधानमंत्री बैठा है और न जाने कौन कौन बैठा है, जो भारत के संविधान को तो छोड़ीये भारत का इतिहास और भूगोल दोनो बदल दें और उसने सामने यह बात। एक बार फिर उनके  कलेजे की दाद  दे रहा हूँं। आपको नाराज होना है हो जाईये। जितना होना है हो जाईये।
मैं उसकी जितनी तारीफ करूँ कम है। वह जानता है कि अब तो मेरे लिए इस देश में केवल एक पद ही बचा है। वो है महामहीम, मगर वर्तमान हालत को देख कर तो यही लगता है कि 72 हूरो को पाना आसान है मगर वो क्‍या नाम है राष्‍ट्रपति भवन का? हॉं रायसीना हिल तक पहुँचना आसान नहीं, असंभव जैसा है। अब तो अपनो का सहारा है, तो चाहे 86 प्रतिशत नाराज हो जाये तो हो जाये, मगर मेरे 14 प्रतिशत नाराज न हो। आखिर हसुऑं अपनी ओर ही तो खीचेगा। आप 86 प्र‍तिशत पर तो आपके लोग ही विश्‍वास नहीं करते। हमेशा उसके ही 14 प्रतिशत के पीछे पड़े रहते है, चाहे माया बुआ जी हो, मुलायम दादा हो, सोनिया माई हो, लालू ससुर जी हो, या फिर ममता बानरजी हो। नीतिशो ससुर जी भी वही थे, अब गंगा में नहा लिये तो पाप कट गये। वैसे मोदी बाबा भी कम नहीं है इन 14 प्रतिशत वालो के पीछे भागने में हा ये बात अलग है कि उनका प्रतिशत कम है। सब 100 हैं तो वो 59 ही हैं।
दूसरी बात कि  आप हिन्‍दु हैं , हैं न ? तो  हिन्‍दू शां‍त प्रिय, सद्भभाव प्रिय होता है। भाई भाई से प्रेम रखता है। कोई आकर आपके भाई को मारे,उसके घर को उजाड़े, उसके देवी-देवता दर्शन को रोके, आपके पूज्‍य स्‍थलो को अपना बना लें।  उसके घर में घुस कर गाली दें, उसकी की मॉं को डायन कहें, पत्‍थर चला चला कर सैनिको को मारे, उनके सर काटने वालो से हाथ मिलावे,आप हिन्‍दू  कुछ नहीं बोलेगें। आप इतना ही कहेंगें घी कहॉं गिरा, दाल में ही न? जाने दो भाई है।
 यही नहीं आप में से कुछ उनका सर्मथन करोगें, उनके समर्थन में स्‍कूलो में, कालेजो में नारे बाजी करोगें, उनके जैसा घर घर से निकालेगें उनको बचाने के लिए रात में कोर्ट खोलवाओं, मारे जाने पर उनके जनाजे में जाओंगें।
वही देख लो हामिद चचा एडं उनकी मुल्ला कम्पनी को कभी अपनो का विरोध नहीं करती, आतंकवादी उनके रिश्तेदार, पत्थरबाज अबोध, अखलाख महापुरुष, भारत माता डायन, वन्देमातरम और सूर्य नमस्कार बकबास, मानते हैं।
 तो अब बताईये  जब आप 86 प्रतिशत उनकी चमचागिरी में लिप्‍त हो तो हमारे हमीद साहब ने क्‍या गलत किया जो उनके 14 प्रतिशत लोगो के दिमाग में रहता है, जो वह कहना चाहते है, और कहते भी हैं समय समय पर वह उन्‍होनें देश के सर्वोच्‍च स्‍थान से सर्वोच्‍यों के बीच में कहा दिया, और अपनो के अपने हो गये, और आप तो मक्‍खन लगा कर दोनो तरफ चिकना बना चाहे, मगर जब हाथ से निकल गया तो चिल्‍लाने लगे।
आप कैसे सह सकते हैं कि जिसको मतलब जिन मुसलमानों को अपना बनाने के लिए आप दिन रात मरे जा रहे है, जिनके कदमो में सर रखने को तैयार हैं उनको आपसे काेई और छीन लें जाये।
आप इस लिए हमीद जी से नाराज हैं और मेैं खुश कि उसने आप सेकुल्‍ारो को दिखा दिया कि सॉंप को कितना भी दूध पिलाओं वह मौका पाकर डसेगा ही। हामिद साहब को गाली देंकर दिल को तस्‍ल्‍ली दो भाया, मगर उतना ही जितने में न वोट बिगड़े न मंच, कही महापुरूष अखलाक कांड की तर्ज पर सम्‍मान लौटाने लगें तो लौटाते रह जाओगें और लौटे सम्‍मानो से समुद्र पर लंका तक पुल बन जायेगा जाकर आराम से अशोक वाटिका में मीठे फल खाना ।  विराेध उरोध छोडो और मेरी तरह हामिद का सर्मथन कर मुल्‍लो से जुड़ो।
अंत में यह कहते हुए कि अगर 50 प्रतिशत भी तुम हिन्‍दू 14 प्रतिशत का विरोध करते तो राम मंदिर कब का बन गया होता, शरणार्थी काश्‍मीरी अपने काश्‍मीर के आवास में जा चके होते,  पत्‍थर बाज पाकिस्‍तान चले गये होते। 370 विदा हो चुकी होती, जवाहर विश्‍व विद्यालय के आधे जेल में होते ।
और बटँवारे के बाद यहॉं भौकने वाले जाकर अपने घर में भौकतें।
अब कितनी बडाई अपनी  लिखे हम, हामिद साहब को जय राम जी की। अफसोस है मुझे बेचारे अल्‍पसंख्‍यक होते हुए भी कहाँ से कहाँ पहुँच गये, मगर आज भी उनको अपनी चारो तरफ से मक्खन से घीरी कौम खतरे में और लाचार आती नज़र आती। मेरे प्यारे उप राष्‍ट्रपति जी
तो लगाओ नारा तुम विरोध का मैं तो चला कौमी एकता के नाम पर अपनी रोटी सेकनें....
बोलो अखंड गहमरी की जय....नही बोलोगे मत बोलो
मैं ही अपनी जय जय बोलता हूँ.....जय अखंड गह

विधान सभा में विस्‍पोटक पदार्थ

 मेरे घर मतलब जहॉं मैं रहता हूँ, वहॉं टी0वी0 भी नहीं है, और न तो मैं कोई समाचार पत्र ही खरीदता हूँ। मानता हूँ कि टी0वी न रहना तो कमी नहीं हैं मगर समाचार पत्र न खरीदा कमी है। ये बातें बताने का कारण मैं नीचे बताऊगॉं।

हॉं तो जहॉं तक मैं देख पा रहा हूँ उत्‍तर प्रदेश विधान सभा में विगत 12 जुलाई को विस्‍फोटक पदार्थ पाया गया। उस कांन्‍ड के बाद जितना हल्‍ला मचा है वह जायज है। भारत के लोकतन्‍त्र पर माननीय अटल बिहारी बाजपेई जी के शासन में केन्‍द्र पर हमले के बाद, अब केन्‍द्र में मोदी और प्रदेश में योगी के शासन काल में एक नाजायज करतूत हुई है। पूरा प्रशासनिक तन्‍त्र, सरकार और नेता परेशान हैं कि ये कैसे आया और ये कैसे हुए, अगर किसी की जान चली जाती तो क्‍या होता ? लोकतन्‍त्र पर हमला हो गया होता तो क्‍या होता ? किसी नेता की जान चली गई होती तो क्‍या होता ? न जाने कितनी जॉंच कमेटीयों का गठन और न जाने कितने निर्णय लिये गये। आखिर लिये भी क्‍यों न जाये ? जनता के चुने प्रतिनिधियों की सुरक्षा का सवाल है। हॉंड-मॉंस के बने जीव का सवाल है। दुबारा न मिलने वाले जीवन का सवाल है।

यह सब देख कर मेरे मन में एक सवाल आया कि क्‍या इस घटना से महज कुछ दिन पहले अमरनाथ यात्रीयों के ऊपर हुए हमले के बाद इन राजनेताओं ने ऐसी हाय-तौबा मचाई, जो अपने ऊपर हमले की कल्‍पना मात्र से मचा रहे हैं ? क्‍या इस प्रकार उनकी सुरक्षा के लिए तबा-तोड़ निर्णय लिये गये? क्‍या इस प्रकार पूरे नेताओं ने बयान-बाजी किया? शायद ऊपर कहे बातो का यही जबाब है कि टी0वी0 और समाचार पत्रो का मेरे पास नहीं रहने के बाद भी, यह महसूस किया कि अमरनाथ यात्रीयों पर हमले के बाद न राजनैतिक बिरादरी में कोई हल्‍ला नहीं मचा और न तो मशीनरीयॉं उस तेजी से हरकत में आई। इसका कारण भी साफ है कि मरने वाले न ऊँचे धराने के थे, न नेता थे, और ना ही मुसलमान, आम आदमीयों की जाने कौड़ीयों से भी सस्‍ती होती है,उनके जाने से उनकी बीबी विधवा नहीं होती, उनके बच्‍च्‍ो अनाथ नहीं होते और न तो किसी मॉं कि गोद ही उखड़ती है। ये सब चीजे तो केवल राजनेताओं के जाने से होती है। मैं यह नहीं कहता कि विधान सभा और ससंद पर हमला होने चाहिए अथवा नेताओं को मारा जाना चाहिए, मगर इतना तो जरूर कहूँगा कि जिस प्रकार विधान सभा लोकतंन्‍त्र का मंदिर था उस पर हमला होना लोकतन्‍त्र पर हमला होना है और उस पर हाय-तौबा होनी चाहिए उसी प्रकार अमरनाथ यात्रा या अन्‍य यात्रा हिन्‍दू  धर्म का मंदिर है, उस पर हमला हिन्‍दू धर्म पर हमला है। उसमें मरने वाले भी मानव थे, उनके परिवार पर भी उसका वही असर होता है जो इन नेताओं के परिवार पर होता है, मगर ऐसा भारत में नहीं होता, अगर एक नेता को खरोंच भी आ जाये तो पूरी मशीनरी हरकत में आ जाती है, जनता चिल्‍लाने लगती है मगर यदि आम आदमी की जान भी चली जाये तो न मशीनरी हरकत में आती है और न ये नेता चिल्‍लाते है, ये अगल बात है कि यदि मरने वाला मुसलमान होता है तो वह सारा कुछ हो जाता है जो एक नेता के खरोंच आने की कल्‍पना मात्र से होता है, जिसका जीता जागता प्रमाण उत्‍तर प्रदेश में ही मिल चुका है एक अखलाक नामक महापुरूष के मारे जाने के बाद इस प्रदेश में ही नहीं इस देश में कैसा बंवडर मचा था, कितनी और क्‍या क्‍या बाते हुई? किसी से छुपा नहीं है।

जय हिन्‍दूराष्‍ट्र भारत। अखंड गहमरी, गहमर गाजीपुर