मंगलवार, 3 अगस्त 2021

राजेश मिश्रा पत्रकार की हत्‍या पर विशेष

 मन की बात...
भारत एक ऐसा देश है जहाँ सब स्‍वतन्‍त्र है। संविधान की धारा 19 के ए बी सी से हर आदमी को बोलने की स्‍वतन्‍त्रता एवं विचारो की अभिव्‍यक्ति की आजादी है। जिसके तहत भारत में चलने वाले समाचार पत्र, न्‍यूज चैनल, पत्र पत्रिकाए प्रकाशित होती है। इनके लिए कोई अलग से प्रविधान नहीं है। समाज के चार स्‍तंभ में विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मिडिया। आख्रिर ये चौथा स्‍तंभ माने जाने वाले मिडिया का काम आखिर है क्‍या? क्‍यों मिडिया को चौथ्‍ाा स्‍तंभ कहा जाता है ? आखिर कौन सा उद्वेश्‍य था, मिडिया को चौथा स्‍तंभ का दर्जा देना का?
मैं समझता हूँ कि मि‍डिया को चौथा स्‍तंभ का दर्जा देने का स्‍पष्‍ट कारण था कि विधियिका, कार्य पालिका, न्‍याय- पालिका और जनता के बीच आपसी संबंध स्‍थापित करना, जनता की आवाज जो इन तक नहीं पहँच पा रही है उसे इन तक पहुॅचना, समाज की तस्‍वीरे दिखाना क्‍योंकि जनता के पास शासन तक अपनी बात पहुँचाने का आज की तरह पहले संसाधन नहीं थे मीडिया का काम होता था , अपने अध्‍ािकार के लिए लोगो को जाग्रत करना, उनमें हौसला पैदा करना, और अन्‍याय के खिलाफ लड़ना , इस लिए शायद मिडिया को चौथा स्‍तंभ का दर्जा प्राप्‍त हुआ,  मगर क्‍या मिडिया अपना काम कर रही है? शायद 95 प्रतिशत लोगो का जबाब आयेगा मिडिया आपना काम बिल्‍कुल नहीं कर रही है, वह समाज को सच नहीं दिखा रही है, वह आडम्‍बर कर रही है, वह लोगो को जगा नहीं रही है, वह रूपये पर अपना ईमान बेच रही है, बिकाऊ एवं दलाल हो गयी, दोगली एवं भाड़ हो गयी है आज की मीडिया, ग्‍लैमर की दिवानी हो गई है आज की मीडिया। शायद यह सही भी है।
मगर बातें कभी एक तरफा नहीं होती , हर सिक्‍के के दो पहलू होते है, मगर आज की मिडिया का बस एक पहलू है वह है काला दाग, मगर क्‍यों नहीं अपने दायित्‍व का निर्वाह कर पा रही है आज की मिडिया क्‍या कारण है? जनता के बीच अपनी प्रतिष्‍ठा खोते जा रही है मिडिया?
मगर मैं अपनी बात कहने से पहले एक बात का जबाब चाहूँगा कि अगर मीडिया का काम जनता को जगाना, और सरकार को समाज की हकीकत दिखा कर समस्‍या को दूर करना है तो आज भारत से सारी समस्‍यायें खत्‍म हो जानी चाहिए क्‍योकि आज जो काम भारत सवा तीन लाख छोटे बडे मीडिया संस्‍थान नहीं कर सकते वह भारत की करोड़ो जनता कर रही है । सोशलमीडिया के माध्यम से  समस्‍या को रोज दिखा रही है हिन्‍दुओं की बात दिखा रही है ।गो वध दिखा रही है । दंगो की हकीकत से रूवर करा रही है। हर वह समस्‍या और बात कर रही है जिसके लिए 3 तीन लाख मिडिया प्रतिष्‍ठान लगें है , तो समस्‍या दूर हो चाहे न हो क्‍या जाग गई भारत की जनता, क्‍या वह आ गई समस्‍या को दूर करने के लिए मुख्‍य धारा में । मुझे तो लगता है नहीं, आप को जो लगें। रही बात दलाली और इल्‍जाम की तो साफ बात है अपनी अपनी डफली अपना अपना राग। आज के समाज में हर कोई मिडिया को अपने हाथ की कठपुतली बना चाहता है, उसे अपनी चाभी से चलाना चाहता है, वो भूल  जाता है कि हर मिडिया कर्मी आप के बीच का ही है, व

आज का समाज सच पढ़ना तो चाहता है सच देखना तो चाहता है मगर सच बोलना नहीं चाहता सच लिखना नहीं चाहता, सड्क पर हत्‍या हो जाये, दुकानदार पैसा अधिक ले, कोई अन्‍य बात हो, रोड न बने, वह चाहता हैं कि बस मिडिया लिखें उसे कुछ न करना पडे् वह घरो में सोया रहें। वह अपने घरो से निकलना नहीं चाहता, वह अपनी समस्‍यओं के लिए दो कदम चलना नहीं चाहता, वह आगे आना नहीं चाहता।
बस क्‍या कर रही है मिडिया, मिडिया की दोगली नीत कह कर अपने कर्तव्‍य की इति श्री कर लेता है।

एक मिडिया कर्मी अपने समाचारो में लिखता है कि इस समस्‍या के दूर न होने से जनता परेशान है आन्‍दोलन पर बाध्‍य है मगर जब हकीकत की धरातल पर आकर सरकार के नामुन्‍दे देखते है तो पता चलता है कि अखबारों को छोड़ आन्‍दोलन की बात एक बच्‍चा भ्‍ाी नहीं कर रहा है जनसमूह की बात तो बहुत दूर है। ऐसे वह अखबार और वह पत्रकार अपनी अहमित खो देता है।

मैने देखा है कि अगर कोई व्‍यक्ति किसी समाचार के लिए किसी पत्रकार के पास जाता है तो वह इल्‍जाम तो लगाता है मगर अपना नाम देने को बहुत ही कम लोग तैयार होते हैं । जब सवाल जबाब होता है तो निकल पड़ते है, किसी कार्यक्रम में फोटो कराने के लिए आगे आ जाते है । सबकी चाहत होती है कि मुख्‍य में  मीडिया उसे बनाये मगर कार्य करने बात में सब नदारद। आज का मिडिया किसी के‍ विरोध में सच्‍ची बात लिखे तो साफ इल्‍जाम लगा दिया जाता है कि उसने विज्ञापन माँगा मैने नहीं दिखा इस लिए ऐसु खबर छप गई, वह खबर बेबुनियाद है, और वह अपने दो चार पॉंच लोगो के साथ उस समाचार का खंडन करवा देता है ,जनता उसके सर्मथन में आ जाती है,।
एक मिडिया कर्मी किसी नेता द्वारा किये गये गलत कार्यो को दर्शाता है उनके द्वारा क्षेत्र के विकास न किये जाने की बात कहता है अगले दिन उसी नेता का काफिला जब गॉंव/शहर में आता है तो उसका काफिला और बढ़ जाता है। अपनी समस्‍याअेा की बात जनता न कह कर उसके द्वारा किये गये कार्यो को बडाई करने लगते है उसके साथ तस्‍वीर खीचवाने को व्‍याकुल रहते है। इससे नेता को क्‍या प्रतिक होता होगा आप स्‍वंय आकलन करें। मैं कोई आकड़ो की बाजीगरी या प्रर्दशन नहीं कर रहा हूँ सिर्फ वह बात कह रहा हूँ जो आज की हकीकत के धरातल पर देखा है मैने।
आज आप मीडिया पर दलाली और दोगले पन के साथ साथ बिकाऊ होने का आरोप लगा तो मैं सहमत हूँ आपकी बात से मगर एक बात बतायेगें ठीक है मीडिया बिक गई पर क्‍यों बिकी? जिस दिन से मीडिया मास कम्युनिकेशन हो गयी उस दिन से मीडिया, मीडिया न रख कर व्‍यापार हो गई। जिसका कारण मुझे समझाने या बताने की जरूरत नहीं कि आज इन कोर्स को करके जाने वाला आदमी केवल ग्रामीण पत्रकार की तरह विज्ञापन के कमीशन या 300 रूपये महीने पर काम नहीं करेगा, और जो मीडिया संस्‍थान ऐसे मास कम्युनिकेशन कोर्स के लोगो को जगह नहीं दे रही है उनकी जगह पाठक या दर्शक में  नहीं है, वह आउट आफ मारर्केट हो जाती है।
ग्रामीण पत्रकार तो आज भी दिन भर मेहनत करता है और अगर उसके पास अलग से अपना व्‍यवसाय न हो तो वह शाम को भूखे पेट सोयेगा, अपने बढे़ दुश्‍मनो की संख्‍या के साथ, असुक्षित। आज तो मरने पर भ्‍ाी मीडिया मालिक अपने पत्रकार क साथ नाता तोड़ देते है, वह अपने पत्रकार को एक आम आदमी बना कर उसकी लिखते है, विगत 2011 में भदौरा के एक पत्रकार स्‍व दिलीप सिंह को अमर उजाला अखबार ने खबर छापा--वाहन सवार की सड़क दुर्घटना में मौत--जब कि क्षेत्र जानता था कि वह अमर उजाला के पत्रकार है।
आज राजेश मिश्रा के हत्या के बाद उनके संघ से जुड़े होने के कारण कुछ राजनेता और जनप्रतिनिधियों ने संवेदनाऐ जरूरत व्यक्त की, घटना स्थल पर गये, परिवार का हाल लिये, मगर अधिकाशं तो चुप ही रहे। जनता तो गूँगी बहरी बनी रही, कोई संस्था नहीं बोली, जबकि पत्रकार हमेशा इनका साथ निभाते है।
स्व० मिश्र भी यदि संघ के कार्याकर्ता न होते तो शायद सत्ताधारी कोई नेता भी नहीं जाता। पुलिस तो इतने पर भी अपने मन से चली और धटना स्थल से कुछ दूर रहने पर भी दो धंटे बाद मौके पर पहुँची।
आखिर पत्रकार पत्रकारिता करे तो कैसे, शासन, प्रशासन, न्यायपालिका, जनता साथ देती नहीं। मीडिया कम्पनी उसे अपना कर्मचारी नहीं मानती। कुछ भी तो नहीं है उसके साथ उसके पास।
आज समाज और मीडिया दोनो का व्‍यवसाईकरण हो चुका है , हमारे आज का हर पत्रकार आपके ही बच का है , आपके ही समाज का है वह भी आप के रंग में रगा हुआ है, वह भी इंसान है मगर हम उससे आशा देवताओं की तरह करते है।
मैं यह नहीं कहता कि जो कुछ मीडिया में हो रहा है पूर्ण रूप से सही है मगर उसके लिए केवल मिडियाकर्मी को जिम्‍मेदार नहीं ठहराया जा सकता, आज की पूरी कार्य प्रणाली इसके लिए जिम्‍मेदार है ।
अखंड गहमरी

डाला छठ की महिमा

 ,महापर्व डाला छठ पर दिन वार पूजा पद्वित के साथ विशेष प्रस्‍तुति।
गाजीपुर। बिहार प्रान्त एवं उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र से चल कर पूरे भारत में प्रसिद्ध होने वाले इस पर्व को महापर्व का क्यों  जाता है, इसका पता आपको इस व्रत की पूजा पद्वति से पता चल जायेगा। छठ पर्व छठ, षष्टी का अपभ्रंश है। कार्तिक मास की अमावस्या को दीवाली मनाने के तुरत बाद मनाए जाने वाले इस चार दिवसीय  व्रत की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी की होती है। इसी कारण इस व्रत का नामकरण छठ व्रत हो गया।

लोक-परंपरा के अनुसार सूर्य देव और छठी मइयाका संबंध भाई-बहन का है। लोक मातृका षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी। एक मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद राम-राज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की थी। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था। एक अन्य मान्यता के अनुसार सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता था। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बना था। आज भी छठ में अर्घ्य की यही पद्धति प्रचलित है। कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रौपदी द्वारा सूर्य की पूजा करने का भी उल्लेख है। वे अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लंबी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं। जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा था। उसकी मनोकामनाएँ पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया था। एक अन्य कथा के अनुसार राजा प्रियंवद की कोई संतान नहीं थी। महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परंतु वह मृत पैदा हुआ। प्रियंवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि "सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूँ। राजन तुम मेरा पूजन करो तथा और लोगों को भी प्रेरित करो।"  राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी।

कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी प्रारम्भ होने वाले इस पर्व का प्रथम दिन लौकी-भात (बिहार के कुछ क्षेत्र में नहाय-खाय) होता है। इस पूजा दिन से यह व्रत पारम्भ हो जाता है और सप्तमी तिथि को उगते हुए सूर्च की आराधना के साथ खत्म होता है। उत्सव के केंद्र में छठ व्रत है जो एक कठिन तपस्या की तरह है। यह प्रायः महिलाओं द्वारा किया जाता है किंतु कुछ पुरुष भी यह व्रत रखते हैं। व्रत रखने वाली महिला को परवैतिन कहा जाता है। चार दिनों के इस व्रत में व्रती को लगातार उपवास करना होता है। भोजन के साथ ही सुखद शैय्या का भी त्याग किया जाता है। पर्व के लिए बनाए गए कमरे में व्रती फर्श पर एक कंबल या चादर के सहारे रात बिताता है। इस उत्सव में शामिल होने वाले लोग नए कपड़े पहनते हैं। पर व्रती ऐसे कपड़े पहनते हैं, जिनमें किसी प्रकार की सिलाई नहीं की होती है। महिलाएं साड़ी और पुरुष धोती पहनकर छठ करते हैं। ‘शुरू करने के बाद छठ पर्व को सालोंसाल तब तक करना होता है, जब तक कि अगली पीढ़ी की किसी विवाहित महिला को इसके लिए तैयार न कर लिया जाए। घर में किसी की मृत्यु हो जाने पर यह पर्व नहीं मनाया जाता है।’ऐसी मान्यता है कि छठ पर्व पर व्रत करने वाली महिलाओं को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। किंतु पुरुष भी यह व्रत पूरी निष्ठा से रखते हैं।छठ पर्व मूलतः सूर्य की आराधना का पर्व है, जिसे हिंदू धर्म में विशेष स्थान प्राप्त है। हिंदू धर्म के देवताओं में सूर्य ऐसे देवता हैं जिन्हें मूर्त रूप में देखा जा सकता है
पहला दिन

व्रत का पहला दिन लौका-भात या लौकी-भात का होता है। व्रती सुबह उठकर पूजन इत्यादि कर लौकी की सब्जी, चना की दाल एंव चावल खाते है।  जब तक व्रत करने वाला भोजन नहीं कर लेता इस दिन परिवार का कोई सदस्य भोजन नही करता। व्रती के भोजन के बाद गेहूँ एवं अन्य प्रसाद बनाये जाने वाले अन्न को धो कर धूप में सुखाया जाता है। आज का भोजन परम्परा के अनुसार आम की लकड़ी पर बनता है। अब कई घरो में आम की लकड़ी के आभाव में गैस चुल्हे की सफाई कर भोजन बनाने की प्रथा शुरू हो गई है।

दूसरा दिन

आज का दिन खरना के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन सुबह से व्रती निरजला व्रत रखते हैं और रात को केले के पत्ते पर, परिवार के सदस्यो की संख्या के हिसाब से पूड़ी, गुड की बनी खीर, ठेकुआ और फल रख कर छठ माँ की आराधना करते हैं। आराधना के उपरान्त चढ़ाई हुई पूरी और खीर खुद खाती हैं। व्रती के भोजन के दौरान कोई भी जाने-अंजाने व्रती का नाम लेकर पुकारता है और व्रती के कानो में अगर वह आवाज चली गयी तो व्रत उसी समय भोजन करना छोड देगी चाहे वह एक निवाला भी नही खाया हो । और इसके बाद परिवार के सभी सदस्य उस पूजन स्थल पर सिर नवा कर प्रसाद ग्रहण करते है। इस प्रकार पर्व का दूसरा दिन खराना पूरा हो जाता है।

तीसरा दिन

आज का दिन अद्भूत होता है। सुबह से ही प्रसाद खरीदने वालो की भीड़ बाजारों में दिखाई देने लगती है। बाजार में चारो तरफ फल-फूल, गन्ना, दउरा, कोशी इत्यादि दिखाई देते हैं। घरों के अन्दर महिलाओं द्वारा प्रसाद के रूप में ठेकुआ इत्यादि आम की लकड़ी जला कर चूल्हे पर बनाया जाता है। दोपहर होते ही सारा प्रसाद एक दउरे या बाँस की ढाल में रख कर कर उसे साफ कपड़े से बाँधने का कार्य शुरू हो जाता है। लगभग तीन बजे घर की महिलायें व्रती को साथ लेकर गंगा या किसी अन्य जलाशय की तरफ प्रस्थान कर जाती है। छठ के पराम्परिक गीत गाते हुए गंगा घाट पर जाती औरतें, घर से नंगे पावों सिर पर डाल और दऊरा उठाये गंगा घाट जाते युवक, सोलह शृंगार में सजी हुई नव-विवाहिताये होती हैं। हर तरफ मंत्र-मुग्ध कर देने वाला वातावरण होता है। सूर्य देव के क्षितिज की राह पकड़ते ही व्रती गंगा या जलाशय में खड़े होकर कठिन अराधना के साथ दूध का अर्घ्य देना शुरू कर देते हैं। जिसके घर में जितने पुरूष होते है सूपो की संख्या उतनी ही होती है। हर सूप को गंगा के पानी से सटा कर उस पर दूध से अर्घ्य दिया जाता है। इस पूजा के बाद गंगा घाट पर आज की पूजा सम्पन्न हो जाती है। सभी अपने अपने घर को चले जाते है । जिन परिवारो में पूरे साल कुछ भी शुभ हुआ रहता है वह परिवार आज शाम को कोसी भरते है।

कोषी भरने की रस्म

अगर परिवार में कोई शुभ काम, शादी-विवाह, वंश वृद्धि हुई है तो रात में कम से कम 5 औरतें मिल कर घर के आगँन में छठ मईया के गीत गाते हुये पाँचों खोइछा (एक कपड़े में हल्दी, दूभ, कुछ पैसे, कुछ फल रख कर बाँध दिया जाता है) बँधे हुए गन्ने आपस में जोड कर  कर खड़े कर दिये जाते है। खड़े गन्ने की बीच की जगह में  कोषी में दीप प्रज्जवलित कर फल-प्रसाद रख दिया जाता है। जिससे कोषी भरना कहा जाता है। इस कोषी केा सुबह फल फूल सहित गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है।

चौथा या अंतिम दिन

छठ पूजा का चौथा और अंतिम दिन काफी सुहावना होता है। सुबह तड़के परिवार के सदस्य स्नान-ध्यान करके डाल-दउरा उठा कर घाट की तरफ चल देते हैं। आज का दिन विशेष कर बच्चों के लिए खुशियो का दिन होता है। घर में बन रहे पकवानो, प्रसादो एवं रखे फल-फूल जिस पर उनकी नज़रे रहती थी, जिसे वह छू भी नहीं सकते थे,आज वह उसे खा सकेगें। व्रती एवं उसके परिवार की अन्य महिलाएं पारम्परिक गीत खाते हुए गंगा घाट पर पहुँचती हैै। सूर्य देव के उदय के समय व्रती गंगा के पानी में खडे़ हेाकर सूर्य की उपासना करते हैं।। सूर्य उदय के बाद दूध उनको अर्घ्य देते हैं। नदी के किनारे ही हवन पूजन कर के व्रत समाप्त करते है। सुबह के पूजन के उपरान्त बच्चे ही नहीं बड़े लोग भी घाट पर घूम कर सबसे प्रसाद माँग कर खाते हुए देखे जाते है। घर आकर व्रती कोषी भरने वाली औरतो केा प्रसाद देती है। और उसके बाद भेाजन कर व्रत खत्म करती है। उसके बाद यह महापर्व समाप्त हो जात है।

छठ पूजा की कुछ विशेष बातें

गेहूँ चावल या अन्य कोई सामाग्री धोने से पूर्व स्नान कर साफ कपड़े पहनना जरूरी होता है।
गेहूँ या अन्य कुछ भी सुखवाते समय ध्यान रखना चाहिए कि उसे कोई जूठा न करें यहाॅं तक की पशु-पक्षी भी नहीं।
खरना व्रत के दिन रात को व्रती के भोजन के समय किसी प्रकार की आवाज़ न हो इस का ध्यान रखना चाहिए।
पूजा के पहले अर्घ्य के दिन जो डाल में जो प्रसाद जलाशय पर जाता है, उसे सुबह के अर्घ्य पर नहीं ले जाना चाहिए । डाल और सूप के सारे प्रसाद बदल कर नये रख देने चाहिए।
सूप पर प्रयास यह करें कि अर्घ्य देते समय दीपक जलता रहे।
प्रसाद यथा शक्ति ही चढ़ायें, पूजा प्रसाद से नहीं भाव से होती है।
सूपो की संख्या परिवार के पुरूष सदस्यों के संख्या के बराबर होती है।
अगर उस साल परिवार में कोई मौत होती है तो छठ का व्रत नहीं किया जायेगा। परन्तु अगर व्रती चाहे तो वह अपने माइके, या किसी अन्य परिजन के घर जाकर छठ व्रत कर सकती है।

पराम्‍परिक कथा पर आधारित अखंड गहमरी

दशहरे के मेले की भीड़

 

दशहरे के मेले की भीड़ भाड़ से निकल कर मैं जल्‍दी से जल्‍दी घर पहुँच जाना चाहता था। बच्‍चों को धुमाते धुमाते काफी थक चुका था, यहॉं तक की बच्‍चों और पत्‍नी के जिद के कारण मैने मेले में काफी कुछ खा लिया था और नींद हावी हो रही थी।

जल्‍दी चलो मैने छोटी को डाँटते हुए कहा जो रूक रूक कर मेले के झूलो की तरफ देख रही थी।

तभी मैन्‍ो देखा कि एक बुढिया मेरे कार को अपने अपने ऑंचल से पोछ रही थी, मैं चिल्‍लाया '' ये बुढि़या ये क्‍या कर रही है, क्‍यो मेरी कार को गंन्‍दा कर रही है।

मेरी आवाज सुन कर वह घबड़ा भागने लगी मगर भाग न पाई और ऑंचल से सिर छुपा कर हाथ जोड़ बोली ''कुछ नहीं साहेब बस अपनो की खुश्‍बु महसूस हुई सो ऑंचल लगा दिया''

तभी वहॉं उसकी उम्र के कुछ लोग जो शायद उसके साथ के आकर उसे सहारा देकर उठाने लगे।

मैं अपनी कार में सवार हो कर उसकी हेड लाइट जलाया ही था कि मुझे उस औरत का चेहरा नज़र आ गया। मैं जड़वत हो गया, वो वही औरत थी जिसका असली सहारा तो मैं था, मगर वो आज गैरो के सहारे, एक अन्‍जान जगह पर है और मैं उसके बनाये आशियाने में शान से।

अखंड गहमरी, गहमर गाजीपुर उत्‍तर प्रदेश।।

 शायद हाथो ने अब उस खत को पकड़े रखने की ताकत खो दिया था, तभ्‍ाी तो मेरी जीवन की आधार हीन बना देने वाले उस खत जिसे मैं सुबह से कई बार पढ़ चुका था, हवा के हल्‍के झोके ने उड़ा कर उस दरिया में पहुँचा दिया। अच्‍छा ही हुआ, मेरे अश्‍को से अपने मूल रूप खोते शब्‍द जो शायद उसने तब लिखे थे, जब उसे यह महसूस होने लगा कि अब वह धीरे धीरे प्रेम बंधन के उस जाल में बधँती जा रही है, जिसे वह कभी स्‍वीकारना तो कभी अस्‍वीकार करना चाहती थी।
वर्षो की चाहत दिल में छुपा कर रखे मैं उसे बता नही पाया, मगर शायद मेरे दिल की आवाज, मेरे दिल का संगीत उस तक पहुँच गया।
कभ्‍ाी इकरार कभी इनकार के दोराहे पर खड़ी जिन्‍द़गी का अन्‍त उसके आज के पत्र में था, जिसमें बस एक डरावने स्‍वपन की दुहाई देकर इतना ही लिखा
भ्‍ाुला, मिटा देना, सनम तुम याद को मेरे।
जला तस्‍वीर भी देना, बनाये दिल में जो अपने।। ह
अखंड गहमरी।।

चले आयो तुझे

 चले आयो तुझे अपने, सभी मिलकर बुलाते है
गुजारे तुम जहॉं बचपन, वो टूटा घर दिखाते हैं

निकल कर गॉंव के घर से, गये ऐसे न फिर आये
न जाने दूर रह मुझसे, भला सुख कौन सा पाये।।
तुम्‍हारी राह तकती है, अभी भी गॉंव की गलियॉं
तुम्‍हारे याद में पागल ,न खिलती बाग में कलियॉं
महकता था कभी जो घर, वहाँ मकड़े बुने जाले ।।
न दीपक अब वहाँ जलता, लगे हर ओर हैं ताले।
तुम्हें बीते दिनो की याद, चाचा हम दिलाते है
चले आयो तुझे अपने, सभी मिलकर बुलाते है
गुजारे तुम जहॉं बचपन, वो टूटा घर दिखाते हैं।

बहन की जब उठी डोली, तुम्हें रो रो बुलाती थी।
तुम्ही हो तात सम भ्राता, सभी को वो बताती थी
जला पाती न अब चुल्‍हा, तुम्‍हारी माँ रहे भूखी
पड़ोसी की दया पर ही , मिले रोटी उसे सूखी
हजारो दर्द से तड़पे नहीं वो रात भर सोती
बदन पीला पडा उसका गिरे आँखो से बस मोती
पडे सुनसान घर के अब उसे कोने रूलाते है
चले आयो तुझे अपने सभी मिल कर बुलाते है
गुजारे तुम जहॉं बचपन, वो टूटा घर दिखाते है।।

अभी भी है खड़ा पीपल जहाँ तुम रोज थे खेले
मगर लाचार दिखता है, न लगते अब वहाँ मेले
किनारा भी नदी का तो, बहाता अश्क है अपने।
जिसे करते परेशा तुम, वो बाबा देखे ये सपने।।
चुरा कर आम अमरूद और लीची बाग से खाये।।
लगे क्यों गहमरी को ये, तुम्हें वो दिन न अब भाये।।
यही त्यौहार का मौसम, जुदाई में जलाते हैं।
चले आयो तुझे अपने सभी मिल कर बुलाते है
गुजारे तुम जहॉं बचपन, वो टूटा घर दिखाते है।।
अखंड गहमरी।।।

देखा है जब से तेरी

देखा है जब से तेरी तस्‍वीर को सनम

आँखो मे मेरे बस गइ खा के कहूँ कसम

कैसा है तुमसे रिश्‍ता हमको नही पता

पर बात अपने दिल की मैं तुमको दूँ बता

जैसे है तेरे साथ रिश्‍ता मेरा अहम

आँखो मे मेरे बस गइ खा के कहूँ कसम

देखा है जब से तेरी तस्‍वीर को सनम

देखा था मैनें सपना एक रात क्‍या कहूँ

आँखो से छलकते अश्‍कों के साथ मैं बहूँ

ये बात मेरी ऐसी नहीं हो तुझे हजम

आँखो मे मेरे बस गइ खा के कहूँ कसम

देखा है जब से तेरी तस्‍वीर को सनम

आ कर तुम बैठो मेरे पास मेरे यार

रहूँ देखता मैं तुझको करता रहूँ प्‍यार

करते है तुमसे प्‍यार या है मेरा वहम

आँखो मे मेरे बस गइ खा के कहूँ कसम

देखा है जब से तेरी तस्‍वीर को सनम

मौलिक एवं अप्रकाशित अखंड गहमरी

विदिशा: जुर्माना

 दीपेश शाह/विदिशा: जुर्माना चाहे एक रुपए का हो या एक कौड़ी का वह जुर्माना ही रहता है. इन दिनों वकील प्रशांत भूषण के ऊपर सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक रुपए जुर्माने की चर्चा देशभर में हो रही है. न्यायालय की अवमानना का दोषी मानते हुए प्रशांत भूषण पर एक रुपए का जुर्माना लगाया गया है. ऐसा ही एक चर्चित मामला विदिशा में भी हुआ है. जहां 150 साल पहले तत्कालीन सिंधिया सरकार ने विदिशा के जमींदार गौरीशंकर श्रीवास्तव पर एक कौड़ी का जुर्माना लगाया था. इसे जमींदार ने स्वीकार नहीं किया और इसके एवज में कुछ और काम करवाने का निवेदन किया है.
आखिर क्या था मामला
तत्कालीन जमींदार के पोते पेशे से अधिवक्ता 83 वर्षीय रमेशचंद्र श्रीवास्तव बताते हैं कि 150 साल पहले दादा गौरीशंकर श्रीवास्तव यहां के जमींदार थे. सिंधिया रियासत में उन्हें कानूनगो की पदवी भी दी गई थी. एक बार एक इत्र बेंचने वाला आया और इत्र खरीदने की बात को लेकर कहासुनी करने लगा. इस पर जमींदार को गुस्सा आ गया और उन्होंने पूरा इत्र चार सौ चांदी के सिक्को में खरीद लिया. इत्र को हवेली की दीवारों पर पुतवा दिया. जिसकी खबर महाराज माधौ राव सिंधिया को लगी तो उन्होंने जमींदार को बुलाने सैनिक भेजे, लेकिन वो नहीं गए.
बुलाने के लिए महाराज ने भेजी बग्घी
जब सिंधिया के बुलाने पर जमींदार नहीं गए तो उन्हें समझ आया कि कुछ गलत है. इसके बाद कानूनगो पदवी की तहत लागू प्रोटोकोल के हिसाब से बग्घी भेजी गई. तब कहीं जाकर गौरीशंकर श्रीवास्तव महाराज सिंधिया के सामने पहुंचे.
फिर महाराज ने सुनाया अपना फैसला 
तत्कालीन महाराज ने इत्र वाली घटना को लेकर गौरीशंकर श्रीवास्तव को दोषी ठहराया. जिसे जमींदार ने अस्वीकार किया, लेकिन फिर भी महाराज ने जमींदार गौरीशंकर श्रीवास्तव पर एक कौड़ी जुर्माने की सजा सुना दी. इस फैसले पर जमींदार ने कहा, वह जुर्माना नही भरेंगे चाहे तो महाराज उनसे कुछ और काम करवा सकते हैं.
महाराज ने दिया पुल निर्माण का काम
महाराज सिंधिया ने विदिशा के बेतवा नदी पर जमींदार गौरीशंकर श्रीवास्तव को पुल बनवाने का आदेश दिया था. जिसे जमींदार ने स्वीकार कर लिया और जुर्माने के बदले पुल का निर्माण करवा दिया. गौरीशंकर श्रीवास्तव के बनाए 150 साल पुराने इस पुल पर आज भी यातायात चल रहा है और यह पुल विदिशा को भोपाल से जोड़ता है. इसे रंगई पुल के नाम से जाना जाता है.

लेडिज ब्यूटी पार्लर का बिजनेस कैसे शुरू करें

 लेडिज ब्यूटी पार्लर का बिजनेस कैसे शुरू करें – लेडिज के लिए वैसे तो कई सारे बिजनेस है लेकिन ब्यूटी पार्लर एक ऐसा बिजनेस है जो लेडिज सबसे ज्यादा करना पसंद करती है और कर रही है। आज के वक्त में अपनी पर्सनालिटी बनाने के लिए कौन सुंदर नहीं दिखना चाहता। इसके लिए लोग हजारो रुपये खर्च कर देते हैं।

इसके अलावा लेडिज को सबसे ज्यादा सुंदर दिखने का शौक होता है इसीलिए लेडिज ब्यूटी पार्लर सबसे ज्यादा चलने वाला व्यवसाय है। ब्यूटी पार्लर में विवाह के लिए दुल्हन को तैयार करने से लेकर मेकअप का सभी कार्य किया जाता है जिसे करके एक लेडिज अच्छा खासा पैसा कमा सकती है।

ब्यूटी पार्लर का व्यापार खोलने के लिए निम्नलिखित चीज़ों का होना अनिवार्य है जिसके आधार पर आप एक सफल ब्यूटी पार्लर को लम्बे समय तक टिका सकते हैं | आइये जानते हैं की ब्यूटी पार्लर कैसे खोला जा सकता है
शैक्षिक योग्यता:

प्राचीन काल में लोग चंदन, दूध, मुल्तानी मिट्टी का सहारा लेकर अपनी सुंदरता को निखारते थे परन्तु आधुनिकता के चलते आज अधिकतर लोग पढ़े लिखे हैं साथ ही अपने शरीर के प्रति काफी सहेज भी हैं जिस के लिए वह ऐसे ब्यूटी पार्लर पर जाना उचित समझते हैं जिनके पास अनुभव के साथ साथ ब्यूटी पार्लर में कोई शिक्षा भी प्राप्त हो|

इसके लिए भारत में अनेक ऐसे संस्थान है जो ब्यूटी पार्लर से संबंधित कोर्स इत्यादि करवाते हैं| जिस के अंतर्गत वे विद्यार्थियों को वह सब तथ्यों से अवगत करवाते हैं जो भविष्य में ब्यूटी पार्लर के व्यापार में जरूरी होते हैं | यह एक ऐसा काम है जिसे काफी बारीकी के साथ किया जाता है| जिस के लिए संस्थान में किताबी शिक्षा के साथ साथ व्यावहारिक रूप से भी ज्ञान प्रदान किया जाता है व एक अच्छे गुणवत्ता वाले संस्थान अपने विद्यार्थियों को प्रमाण पत्र भी दे…
शैक्षिक योग्यता:

प्राचीन काल में लोग चंदन, दूध, मुल्तानी मिट्टी का सहारा लेकर अपनी सुंदरता को निखारते थे परन्तु आधुनिकता के चलते आज अधिकतर लोग पढ़े लिखे हैं साथ ही अपने शरीर के प्रति काफी सहेज भी हैं जिस के लिए वह ऐसे ब्यूटी पार्लर पर जाना उचित समझते हैं जिनके पास अनुभव के साथ साथ ब्यूटी पार्लर में कोई शिक्षा भी प्राप्त हो|

इसके लिए भारत में अनेक ऐसे संस्थान है जो ब्यूटी पार्लर से संबंधित कोर्स इत्यादि करवाते हैं| जिस के अंतर्गत वे विद्यार्थियों को वह सब तथ्यों से अवगत करवाते हैं जो भविष्य में ब्यूटी पार्लर के व्यापार में जरूरी होते हैं | यह एक ऐसा काम है जिसे काफी बारीकी के साथ किया जाता है| जिस के लिए संस्थान में किताबी शिक्षा के साथ साथ व्यावहारिक रूप से भी ज्ञान प्रदान किया जाता है व एक अच्छे गुणवत्ता वाले संस्थान अपने विद्यार्थियों को प्रमाण पत्र भी दे…
पार्लर में दी जाने वाली सेवायें है खास:

एक पार्लर में वह सभी सेवायें दी जानी चाहिए जिस से ग्राहक एक ही स्थान पर सभी सेवाओं का लाभ उठा सके व उसे पार्लर से जुड़े अन्य काम के लिए किसी दूसरे पार्लर पर ना जाना पड़े| पार्लर में दी जाने वाली सेवायें निम्नलिखित हैं:-

आई ब्रो, शरीर के जरूरी हिस्सों में ब्लीचिंग, फेशियल, बालों की कटिंग, वैक्सिंग, बालों को रंगना व स्ट्रैट करना, हाथ एवं पैरों का रख रखाव, मसाज, बालों की पुफ्फिंग, मेकअप व जो सबसे जरूरी है वह एक दुल्हन का मेकअप उसको सिर के बालों से लेकर के पैर के नाख़ून तक तैयार करना आदि सेवायें एक बेहतरीन पार्लर की पहचान होती है|

विज्ञापन:

पार्लर के खुलने के उपरान्त ग्राहकों को अपने पार्लर की ओर ध्यान केंद्रित करने का काम विज्ञापनों की मदद से किया जाता है| विज्ञापन करने के लिए आप विभिन्न माध्यमों का प्रयोग कर सकते हैं जैसे गली मोहल्ले पर पोस्टर आदि लगवा कर, इन पोस्टरों को उन स्थानों पर लगवाना उचित रहता है जहां लोगों का अधिक आना जाना लगा रहता है जैसे हस्पताल, बस अड्डे आदि| दुसरा आप स्थानीय अखबार में भी अपने पार्लर से संबंधित इश्तेहार छपवा सकते हैं|

आप जिस भी माध्यम का सहारा ले रहे हैं उस में अपने पार्लर से जुड़ी सभी जानकारियों को अंकित करें जैसे पार्लर में दी जाने वाली सुविधायें व उनका मूल्य, समय सारणी व पार्लर में मौजूद फ़ोन नंबर तथा सही पता भी जरूरी है| विज्ञापन के लिए आप अपने पार्लर के बाहर बॉर्ड भी जरूर लगवायें| जिस से लोग पार्लर प्रति जागरूक हो सके|

प्रारंभ में आप विज्ञापनों में ऑफर्स का भी उल्लेख कर सकते हैं जिस से स्थानीय लोगों के साथ साथ थोड़ी दूरी पर रह रहे लोग भी आप के पार्लर तक पहुंच सकें|

ब्यूटी पार्लर से कमाई:

अपनी सुंदरता को चार चाँद लगवाने के लिए लोग आज ब्यूटी पार्लर पर जाना ही उचित समझते हैं| लोग अपने शरीर की सुंदरता को लेकर काफी संवेदशील होते हैं जिसके लिए वह अच्छी सुविधा और संतुष्टि के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहते और वह अच्छे दाम भी देने के लिए आसानी से तैयार हो जाते हैं|
यही कारण है कि इस व्यापार में काफी मुनाफा है चार पांच की लागत के बाद व्यक्ति इससे हर महीने 40 से 50 हजार तक की कमाई कर सकता है पर यह कमाई कई चीजों पर निर्भर करती है जैसे स्थान, ग्राहकों की संख्या व शादियों का सीज़न आदि|

पार्लर के लिए कुछ जरूरी टिप्स:

डिजाइनिंग :- आपको अपने ब्यूटी पार्लर को काफी आकर्षक तरीके से डिजाइन करना चाहिए, जैसे आरामदायक कुर्सियां, दीवारों पर सुंदर सुंदर पोस्टर और शीशे लगाकर, ग्राहकों के बैठने के लिए स्थान और मनोरंजन के लिए सॉफ्ट म्यूजिक का भी सहारा लिया सकता है साथ ही रंग बिरंगी रौशनी भी ब्यूटी पार्लर की ब्यूटी बनाने में सहायक होती हैं|

हेल्पर :- ब्यूटी पार्लर का काम वैसे तो एक व्यक्ति द्वारा भी किया जा सकता है पर जरूरत पड़ने पर दूसरे व्यक्ति की भी मदद ली जा सकती है| पार्लर के शुरुआत में आप हेल्पर डेली बेस पर हायर भी कर सकते हैं परन्तु बाद में काम बढ़ने के साथ साथ पक्के तौर पर एक हेल्पर अपने पार्लर में जरूर रखे पर ध्यान रहे जिस भी हेल्पर को आप ने अपने साथ रखा है वह पार्लर के कामों में कुशल हो अन्यथा इसका नुक्सान आपको झेलना पड़ सकता है|

शुरूआती दाम रखे कम :- काम के शुरुआत में आपको ग्राहकों को अपने पार्लर की ओर आकर्षित करना है जिसके लिए आप कम दामों के साथ लोगों को सुविधा दे सकते है|

घरेलू सेवा :- इस व्यापार को एक उच्च स्तर तक ले जाने के लिए आप लोगों को उनके घर जाकर भी सेवा प्रदान कर सकते हैं| इससे आपकी अच्छी छवि का निर्माण होगा साथ ही अन्य लोग भी आपके पार्लर के बारे में जानेंगे|

नए फैशन की जानकारी :- आज के समय में व्यक्ति को उसके बालों के स्टाइल से परखा जाता है जिस के लिए आपको समाज में चल रहे नए नए हेयर स्टाइल की जानकारी होनी चाहिए जिसे आप अपने ग्राहकों पर इस्तेमाल कर के उन्हें संतुष्ट कर सके|

ब्यूटी पार्लर के बिजनेस में ग्राहक कैसे बनाएं – How to Increase Customers

ब्यूटी पार्लर के लिए ग्राहक बनाने का सबसे खास तरीका यही है कि आपका काम अच्छा हो। क्योंकि जब आपका काम अच्छा होगा तभी इस बिजनेस में आपके ग्राहक बनेंगे। इसके साथ ही आप शादी दुल्हन को तैयार करने का ओर्डर ले सकती हैं। जिससे आपके ग्राहक बढ़ते जाएंगे। इतना ही नहीं आप अपने ब्यूटी पार्लर का प्रचार करने के लिए अपनी सहेलियों से बात करें उन्हें अपने ब्यूटी पार्लर के बारे में बताएं। आप टेम्पलेट छपवाकर भी अपने ब्यूटी पार्लर का प्रचार कर सकती हैं।

अगर आपकी कोई मित्र मेहंदी सीखाने आदि का काम करती है तो आप उन्हें बताएं वो आपके पास कई ग्राहक भेज देगी। इतना ही नहीं आप ब्यूटी पार्लर के काम के साथ ब्यूटी पार्लर का काम सीखाने का का कार्य भी कर सकती हैं। जैसे आप किसी लड़की को ब्यूटी पार्लर का कोर्स सीखाएगी तो उससे उसका सीखना भी हो जाएगा और आपके सहायता भी हो जाएगी

शहर के मोती

 शहर के आप हैं मोती, हवा ने भी बताया है।
मगर स्‍वागत करें कैसे, नहीं मुझको सिखाया है।।

बगीया से चुना मैनें, सुबह ही फूल कुछ प्‍यारे।
तुम्‍हें अर्पण है ये माला, जिसे उनसे बनाया है।।

समय ये आज है ऐसा, हुए अपने पराये पर ।
यहॉं पर आप सब आकर, के मुझसे दिल मिलाया है।

बड़ा अनमोल है ये पल, न फिर लौटेगा जीवन में।
नमन है आप सबको जो, मुझे यह पल दिखाया है।

कदम तेरे पडे़ ऐसे, हुई है धन्‍य ये धरती।
यही राजीव की पूँजी, जो जीवन भर कमाया है।


बोल गज़ल के चेक कर लें, तब आगे कुछ करें

गुरुवार, 5 नवंबर 2020

आखिर कौन है असली खिलाड़ी ताड़ीघाट बारा मार्ग पर चल रहे इस ओवरलोड ट्रक के खेल का ? -अखंड गहमरी

ओवरलोड वाहन के भार से जब दबी सड़क को देखता हूँ तो ऑंखो में फिर से वही गुजरे सात साल खड़े हो जाते हैं। न जाने कितनी घरों का चुल्‍हा बंद हो गया था, न जाने कितने लोगो की सॉंसे बंद हो गई थी, न जाने कितनों का सपना टूट गया था। ओवरलोड वाहनों के दबाब से जब सड़क कहरती है तो अखंड गहमरी को फिर से उसी नर्कीय जीवन की कहानी दुहराने का डर लगता है वह सोचने लगता है कि आखिर कौन है असली खिलाड़ी ताड़ीघाट बारा मार्ग पर चल रहे इस ओवरलोड ट्रकाें के खेल का ? आखिर कब तक चलेगा हमारी लाइफ लाइन से यह बेहूदा खिलवाड़ और गहमरी को ही क्‍यों आपको भी जरूर लगता होगा।

 बिहार से ओवरलोड बालू व अन्य सामान लेकर ताड़ीघाट-बारा मार्ग से सैकड़ो ट्रक गहमर कोतवाली समेत अन्य पुलिस स्टेशनों के सहयोग से फिर गुजरने लगे हैं। चंद पैसो के लिए गहमर कोतवाली बड़े आराम से इन ओवरलोड वाहनों को गुजरने दे रही है। उसे खराब होती सड़क की दशा और घंटो-घंटो तक पूरे मार्ग पर लग रहे जाम दिखाई नहीं दे रहे हैं। मजेदार बात तो यह कि शासन भी चुप, प्रशासन भी चुप, विधायक जी भी चुप, पत्रकार खामोश। जनता बेचारी तो बेबस और लाचार। गहमर कोतवाल ने और शासन-प्रशासन में आये लोगों की आँखों ने निश्चित तौर पर गंगापार के सुहवल, रेवतीपुर, नवली, भदौरा, गहमर, बारा, कुतुबपुर, मगरखाई, शायर, लहना, बरेजी, खुदरा, करहियाँ, माँ कामाख्या धाम की जनता की सात सालो की बेबसी नहीं देखी। कैसे इन क्षेत्र के निवासियों का पूरा जीवन ही बर्बाद हो गया। व्यवसाय उजड़ गये। अस्पताल न पहुँच पाने के कारण कितनी जाने चली गई, कितने बच्चों ने पढ़ाई छोड़ दिया , कितने वकीलों की वकालत चली गई, कितने व्यवासीयों की रोजी-रोटी चली गई, मोटर व्यवसाय कैसे चौपट हो गया। ताड़ीघाट-बारा मार्ग और गंगा नदी पर गाजीपुर में बने पुल की खराब हालत ने कैसे गंगापार के लोगों को तिल-तिल मरने पर मजबूर कर दिया, यह तो पुलिस प्रशासन सपने में भी देख नहीं पायेगा।

वर्ष 2012 से लेकर वर्ष 2018 तक ताड़ीघाट बारा मार्ग पर वाहन तो दूर पैदल चलना भी असंभव था, मगर जनता एक बेबस और लाचार प्राणी है। मौत को हथेली पर लेकर चलना उसकी नियति बन चुकी है। इस लिए वह चलती रही मरती रही। वर्ष 2018 में सड़क तैयार हुई तो गाजीपुर में बना पुल ओवरलोड वाहनो की भेट चढ़ गया। कभी एक महीने दो कभी तीन महीने तो कभी 6 महीनें बंद रहा। किसी तरह महीनों बंद रहने के बाद के बाद विगत 5 अक्टूबर से पुल चालू हुआ, मगर ओवरलोड वाहनो की स़ख्या देखते हुए यह कहना मुश्किल है कि गंगापार के लोग कब तक जिला मुख्यालय से जुड़े रहेगें। नव-निर्मित ताड़ीघाट -बारा मार्ग भी रेवतीपुर, उतरौली, भदौरा व गहमर के पास महज एक साल में दरकनी शुरू हो गई है। हर गाँव हर बस्ती के आगे, गंगा सेतु पर भय़कर जाम लगना शुरू हो गया है। लोग घंटो घंटो जाम में फँस रहे हैं। मर रहे हैं।  पर इन सब से गहमर कोतवाली के साथ-साथ इस मार्ग के अन्य थानो और चौकीयों से क्या लेना देना। वर्दी में 5 जेब है साहब भरेगी कैसे? इस ओवरलोड वाहनों पर अंकुश कैसे लगेगा यह समझ से परे है।

मैं अब उनसे ही एक बार फिर आगे आने का निवेदन करूँगा जो इस मार्ग को बनबाने के लिए अपना सब कुछ छोड़ कर सड़क पर आये। मैं गंगापार के हर उस निवासी से निवेदन करूँगा जो इस सड़क के कारण अपनो को खोया है अपने रोजगार को खोया है। मैं गंगापार के हर आम खद्दरधारी से निवेदन करूँगा कि वह अपने दल की राजनीति छोड़ कर इस सड़क को और गंगापुल को बचाने के लिए आगे आये, क्योंकि उसने भी देखा है कि आप के दल-दल के दलदल में कैसी फँस कर यह सड़क आपको भी रोने पर मजबूर कर दी।
एक बात आप पूरी तरह से याद रखें कि यह ओवरलोड वाहन का खेल सांसद, विधायक और अन्य नेताओं को दिखाई नहीं देगा। अगर दिखाई देता तो कम से कम गहमर कोतवाली से ओवरलोड ट्रक तो पास किसी कीमत पर नहीं होते क्योंकि गहमर मुख्यमार्ग से महज 200 मीटर जमानियाँ विधायक का घर है, गहमर होकर तो ओवरलोड वाहन नहीं ही गुजरते। उनके कारण हमेशा जाम नहीं लगता। सत्ता में बैठे लोगो को आम जनता से अधिक ओवरलोड वाहनो के स्वामीयों की चिंता है, वह इनके आम जनता से अधिक करीबी हैं और हों भी क्यों नही? शासन-सत्ता में बैठे लोगों के चुनाव और अन्य खर्चे तो इन्हीं जैसे धनपशुओं से आता है, आप तो केवल वोट देते हैं, आप का क्या मुल्य?  गाजीपुर के पुलिस अधिक्षक द्वारा एक ही दिन एक ही समय में ओवरलोड के खेल में 6 पुलिसकर्मियों को लाइनहाजिर करने के बाद भी एक मिनट ओवरलोड वाहनो का न रूकना इस बात को प्रमाणित कर रहा है कि ओवरलोड वाहनों के स्वामी कितने पहुँचे हुए हैं।

यदि आप समय रहते चुप रहे, यदि आपने शासन प्रशासन, नेता-प्रेता को अपने मुल्य का एहसास नहीं कराया तो वह दिन दूर नहीं  जब पुलिस और प्रशासन अपनी जेंबे भरने के लिए आपकी इस सड़क को खा जायेगें और फिर आप बेबस और लाचार हो कर अपनी जिंदगी के गाड़ी के चक्के को फँसा बैठेगें और पुलिस भर्ती रहेगी और अपने आका की जेब को। मगर जब आप सड़क पर आ जायेगें तो शासन-प्रशासन, स़ांसद-विधायक, दबंग ओवरलोड वाहन स्वामी, पुलिस-पत्रकार सबकी बैंड बजा देगें और सड़क को दिला देगे़ ओवरलोड वाहनों व जाम से मुक्ति, बचा लेगेगें अपनी Life Line ताड़ीघाट बारा मार्ग को।अपनी जिंदगी को। फिर न कहना कि अखंड गहमरी ने आपको अगाह नहीं किया।
फैसला आप का .....।

 

अखंड गहमरी 



 

बुधवार, 21 अक्टूबर 2020

कहॉं से आता है इतना पैसा ग्राम प्रधान पद के प्रत्‍याशीयों के पास जो आये दिन कराते हैं निर्माण कार्य और देते हैं हजारों के उपहार-अखंड गहमरी

आज या कभी कोई किसी को एक कप चाय बिना स्वार्थ के नहीं पिलाता, एक पान नहीं खिलाता, एक रूपया भीख किसी को नहीं देता, ऐसे हाल में क्यों और कुछ लोग बिना किसी पद के बिना किसी सरकारी आर्थिक श्रोत के कैसे ग्राम सभाओं में भारी भरकम काम कैसे कराया जा रहा है? इसका धन कहाँ से आ रहा है? मेरी समझ में नहीं आता।

मैं अपनी बात लिखने से पहले कुछ बाते आपको बताना चाहूँगा। मैं गहमर परिक्षेत्र छोटे स्तर पर बाल व महिला  विकास के लिए तरह तरह का आयोजन ''गहमर वेलफेयर सोसाइटी'' के तहत करता था। लालच था कि जब इस क्षेत्र में सरकार NGO  की कार्यप्रणाली देखेगी तो उसका फायदा हमें होगा। हमें आर्थिक लाभ भी मिलेगा, हमारे दिये प्रमाण-पत्र महत्व रखेगें, हमारे क्षेत्र के बच्चे भी आगे जायेगें। वर्ष 2015 में जब मेरी पत्रिका साहित्य सरोज आई तो गोपालराम  गहमरी कार्यक्रम शुरू हुआ। यहाँ भी लालच कि पत्रिका आगे जायेगी तो अर्थ मिलेगा, गोपालराम गहमरी का नाम जो सरकार से दूर है वह सरकार के निगाह में आयेगा। नये व गुमनाम साहित्यकार आगे आयेगें। साथ ही बाहर के साहित्यकार आयेगें तो हमारे बच्चे कुछ सीखेगें।  हमारे गाँव के बच्चे आगे जाकर फर्क के साथ कह सकेगें कि ''हम गाँव में रह कर भी शहर के बराबर है''। इस काम में हम आपका सहयोग लेते हैं।  
आज या कभी कोई किसी को एक कप चाय बिना स्वार्थ के नहीं पिलाता, एक पान नहीं खिलाता, एक रूपया भीख किसी को नहीं देता, ऐसे हाल में क्यों और कुछ लोग बिना किसी पद के बिना किसी सरकारी आर्थिक श्रोत के कैसे ग्राम सभाओं में भारी भरकम काम कैसे कराया जा रहा है? इसका धन कहाँ से आ रहा है? मेरी समझ में नहीं आता।
भारत के सबसे अमीर व्यक्ति भी पानी में पैसे नहीं फेंकता, वह भी तब तक किसी काम में पैसे नहीं लगाता जब तक वहाँ से कोई फायदा नहीं होता। मैं गाँव में अन्तर्राष्ट्रीय कार्यक्रम के लिए चंदा माँगता हूँ , नहीं मिलता है, क्योंकि उससे किसी को कोई रिर्टनिंग नहीं।ऐसे में आम आदमी जब अपनी गाढ़ी कमाई के हजारो रूपये जनसेवा के नाम पर बहा कर केवल सोशलमीडिया पर फोटो डाले या डलवायें तो संदेह होना लाजिमी है।
क्या इन जनसेवक को इतनी आमदनी है जो परिवार सेवा के बाद भी इतने पैसे बच जाते हैं जो जनसेवा के नाम पर हजारो रूपये खर्च कर सकें? क्या इनकी इस काल में भी इतनी कमाई है जो यह इनकम टैक्स बचाने के लिये जनसेवा में पैसे बहा रहे हैं? या इन जनसेवको को राजनैतिक पार्टीयाँ, भारत की A, B,C.  या ,D कम्पनीयाँ चुनावी प्रत्याशी के नाम पर फाईनेंस कर रही है और चुनाव  जीतने के बाद 50:50 के अनुपात में हमारे आपके विकास हेतु आये पैसे का बंदरबाट करेगी? आज ऐसे लोगो की कमी नहीं है जो गाँवो में विभिन्न तरीकों से यह काम करा रहे हैं। वह पैसा खर्च करके निर्माण कार्य करा रहे हैं मगर वह इस प्रकार के विकास कार्यो के लिए नियुक्त प्रधानों का काम न कराने का मुखर विरोध नहीं कर रहे हैं। वह काम न होनें पर जनसमूह को विश्वास में लेकर प्रधानों अधिकारियों पर न दबाब डाल रहे हैं और न उनके खिलाफ धरना-प्रदर्शन। इसका कारण भी साफ है। उनके ऐसा करने से उनको भी अपनी पोल खुलने का खतरा है। उन्हें डर रहता है कि वह विरोध करेगें तो उनका भी कच्चा चिट्ठा खुलेगा। ऐसे में अपने तथाकथित पैसे विकास करा कर जनता के सामने हीरो व समाज सेवी बनना एवं अपनी विकासपुरूष के रूप में छवि दिखाते हैं। जिससे साँप भी मर जाता है और लाठी भी नहीं टूटती और यदि चुनाव जीत गये तो आपके विकास के पैसों से राजनैतिक और A,B,C,D कम्पनी की कर्ज वापसी और अपनी तिजोरी।
यहाँ एक और गणित समझाना आपको और जरूर है, आप अपने घर के पास एक छोटी सी नाली साफ कराते हैं तो दो मजदूर दिन भर लग जाते हैं हजार रूपये का खर्च आता है।अपने घर की सफाई कराये, छोटे छोटे निर्माण कराये तो दसो हजार रूपये खर्च हो जाते हैं, एक टैक्टर मिट्टी गिराये तो 2000 खर्च हो जाते हैं। सिमेंट के काम का तो पूछीये ही मत। हम अपने घर के कामों को कराने के लिए महीनों सोचते हैं, ऐसे में यह समाजसेवी तुरंत और महीने में कई काम ऐसे कराते हैं, धन कहाँ से आता है? लाखों के सामान बाँट दिये जाते हैं बिना सरकारी सहायता के, धन कहाँ से आता है? आपको सोचना होगा।
चुनाव आते ही वोटो के सौदागरों को प्रतिदिन मुर्गा बोलत प्रतिदिन परोसा जा रहा है, यदि हम गणित के हिसाब से देखे तो महज 1 किलो मटन 400 से 500 रूपये किलो है, और एक सामान्य जाम की बोतल 600/- रूपये, तेल ,मसाला जलावन, आटा, चावल , पत्तल, गिलास इत्यादि का खर्च हम 500/- रूपया भी रखें तो कुल खर्च लगभग 1600 रूपये चार व्यक्ति का आता है यानि 400 रूपया प्रतिव्यक्ति। अब वह 400 रूपये खर्च करने वाले हम अकेले तो नहीं? फिर यह 400 रूपये का रिर्टन कैसे?क्या आप केवल पुरूष वर्ग की सेवा कर महिला वर्ग का मत ऐसे समय में लेगें जब महिला भी समाज में निकल कर अपनी पहचान बना रही हैं।
आप को एक हकीकत सुनाता हूँ।
गत जिला पंचायत चुनाव में मैनें एक दिन अपनी पत्नी ममता सिंह से कहा कि भाजपा से मनीष सिंह बीटू उम्मीदवार है युवा हैं, कर्मठ है उनको वोट दिया जाये , रोज मिलेगें, काम आयेगें। मेरी पत्नी ने तत्काल कहा मेरे स्कूल  में लक्की मास्टर के भाई झुन्नु सिंह भी जिला पंचायत के उम्मीदवार हैं वह भी युवा हैं, कर्मठ है, रोज मिलेगें। चलीये उनको सपोर्ट किया जाये। मैं चुप हो गया। जब मैं अपनी पत्नी का वोट नहीं फिक्स कर पाया तो मैं कैसे कहूँ कि मैं दूसरे का मत किसी को दिला दूगाँ।
आये दिन सोशलमीडिया पर लम्बे लम्बे निर्माण कार्य के फोटो, लम्बी चौड़ी पार्टीयाँ यह एक उसी प्रकार का व्यापार है जिस प्रकार 1 रूपये का चिप्स आप के पास दस रूपये का पहुँचता है। 10 रूपये के चिप्स के पैकेट में 1 रूपये के मुल्य के बराबर चिप्स  आपको मिलता है  शेष आपके जेब का 9 रूपये प्रजेंटेशन के रूप में विज्ञापन, पैंकिंग और डिस्ट्रीब्यूटर से लेकर दुकानदार  के फायदे के रूप में जाता है। पैसा आपका नाम कम्पनी का। उसी तरह आपके टैक्स का विकास के रूप में आया पैसा आपको एक रूपया मिलता है शेष तथाकथित समाजसेवी और अधिकारियों को , आप का नाम भी नहीं होता कोई आपसै सीधे मुँह बात भी नहीं करता।
अब भी वक्त है, संभल जाये, अपना पैसा अपने विकास में पूरी तरह लगवायें। ए.बी.सी.डी.कम्पनीयों, तथाकथित चुनावी समाजसेवीयों और एक टाइम भोजन कराने वालो को किनारा करें।
एक स्वच्छ और स्वस्थ ग्राम पंचायत की स्थापना करें।


अखंड गहमरी।



 

 

 

बुधवार, 7 अक्टूबर 2020

अखंड गहमरी र्स्‍माट नहीं गहमर के कोतवाल साहेब,उसके कंधे पर नहीं है सितारें- अखंड गहमरी

 स्मार्ट तो वही होता है जिसके पास पद, पैसा एवं प्रतिष्ठा होती है। अपने मौलिक अधिकारों से वंचित उसे पाने के लिए भीड़ में पीछे खड़ा व्यक्ति का स्मार्ट कैसे बन सकता है   ?   मौलिक अधिकारों विद्युत व्‍यवस्‍था चरमा जाने पर जीवन की जो गति होती है इससे आप भली-भाँति परिचित होगें  । अपनी व्‍यवस्‍था को सुधारने में हो रही कार्यवाही को भीड़ में खड़ा होकर वीडियों में कैद करने वाला एक आदमी व्‍यक्ति स्‍मार्ट कैसे होगा   ? कैसे बन सकता है  ? मगर भीड़ में खड़ा हर व्‍यक्ति शांत नहीं रह पाता, वह केवल वक्‍त की नज़ाकत को देखते हुए किये गये सवालो का जबाब नहीं दे पाता है।अखंड गहमरी नहीं, ''स्‍मार्ट होगें गहमर के कोतवाल साहब'' क्‍योंकि उनके कंँधे पर लगे तीन सितारे और साथ में है दर्जनो सहयोगी।

गहमर कोतवाली में आने के पूर्व गहमर के नये कोतवाल को रेवतीपुर थाना, करंडा, जमानियॉं, दिलदारनगर व गाजीपुर सदर जैसी बड़ी कोतवालीयों के संचालन का अनुभव है।  गहमर कोतवाली के यदि हम सिर्फ राजपूत थानाध्‍यक्षों की बात करे तो गहमर कोतवाली में जो राजपूतों का प्रमुख गाँव है कोतवाल के रूप में आने वाले राजीव सिंह के बाद दिलीप सिंह दूसरे राजपूत कोतवाल हैं। राजपूत थानाध्यक्षों की सूची लंबी नहीं है लेकिन उनके कार्यकाल में विवाद लम्बें रहे हैं।

बचनप की स्‍मृतियों में यदि जाये तो वर्ष 1992 में गहमर थानाध्‍यक्ष हो कर आये रक्षपाल सिंह जो उस समय पूरे गहमर थाने के भवनो का न सिर्फ पूरी तरह मरम्‍मत कराये, मंदिर का पुन:निर्माण कराये, पूरे थाने के ध्‍वस्‍त वायरिंग को बदले, बल्कि पूरे परिसर की प्रतिदिन साफ सफाई पर जोर देते हुए प्रत्‍येक सिपाही के मनोबल को बढ़ाने उनकी समस्‍याओं को अपना समझने का काम करते हुए गहमर थाने को एक अलग पहचान दिया था।

वर्ष 2005 में पंचायती चुनाव के समय गहमर में 01 अगस्त 2005 को हुए मनोज हत्याकांड के बाद हुए विवाद में थानाध्यक्ष पी.पी.सिंह की नेतृत्व क्षमता में कमी और भीड़ की मनोदशा न समझ पाने के कारण गहमर थाने पर बवाल हुआ। पुलिस पब्लिक के साथ गुरिल्ला युद्ध हुआ। कई आम जन घायल हुए, गोलीयॉं चली, पत्‍थरबाजी हुई। कई निदोर्ष घायल हुए, कई फँसे कई फँसाये गये। पूरी तरह थानाध्‍यक्ष के गलती का ठिकरा आम जनता पर फूटा।

 गहमर में आये राजपूत थानाध्यक्ष कौड़ीराम निवासी अभय सिंह  मगरखाई के पास हुए गैंगमैन की अयोग्यता से ट्रेन और ट्रैक्टर की टक्कर में कमली नामक महिला समेत दो कि मौत के बाद आक्रोशित भीड़ जो ट्रेन रोकने और बवाल करने पर अतारू थी, जिले से मदद आने तक न सिर्फ अपने एक हमराही राधेश्‍याम राय और जीप के ड्राइवर को लेकर भीड़ को अपनी बातों में उलक्षा कर रखे रहे, बल्कि राजगीर से दिल्‍ली जा रही श्रमजीवी एक्‍सप्रेक्‍स जो बाराकंला हाल्‍ट पर खड़ी थी उसके साथ अनहोनी होने से बचाये।  और यही नहीं खुद उस भीड़ का मुखिया बन कर रेलवे से त्‍वरित मदद पीडि़त परिवार को दिलाये। जो उनकी कार्यक्षमता का एक बेहतरीन उदाहरण साबित हुआ।

गहमर आने वाले दूसरे अभय सिंह कद भले छोटा था मगर दिमाग और नेतृत्‍व क्षमता कद से बहुत अधिक तेज, गहमर में विवादित नौका की भूमि पर कब्‍जे को लेकर जब गहमर में माले का आन्‍दोलन गहमर थाने पर हुआ और माले वाले दिन गहमर थाने पर भाषणबाजी करते हुए राजपूतो को उल्‍टा सीधा बोलते हुए खेत जबदस्‍ती खेत काटने पहुँच गये, खेतो पर जो राजपूतो ने उनके साथ किये माले वालो की जान पर बन आई। अभय सिंह अपने सूझ-बूझ से राजपूतो को समझा कर गंम्‍भीर मामले को पूरी तरह निपटा दिया, उनकी ही देन रही कि फिर आज तक माले की हिम्‍मत नहीं पड़ी गहमर थाने पर बवाल करने की। उनकी यह उपलब्‍धी आज भी याद की जाती है।

गहमर आने वाले तीसरे वीपिन सिंह का कार्यकला लम्‍बा नहीं रहा। तेज तर्राक विपीन सिंह अपने अल्‍प कार्यकाल में गहमर क्षेत्र के अपराधीयों में एक दशहत बन गये। 2012 विधानसभा चुनाव में गाजीपुर नामांकन कार्यालय में डियूटी लगी और वहॉं भीड़ के अंदर चले जाने के कारण उन्‍हें निलंबित कर दिया गया। निलंबन के बाद जब वह मॉं कामाख्‍या के दरवार में आये तो उनके साथ आम आदमी तो गया मगर गहमर थाने का एक सिपाही नहीं गया, दर्शन के पूर्व उनके उतारे बेल्‍ट को पकड़ने वाला कोई सिपाही नहीं था। यह घटना मैं भूल नहीं पाया, क्‍योंकि पद की पूजा देखा।

 गहमर आये एक अन्‍य राजपूत थानाध्‍यक्ष के0पी0सिंह के बारे में मुझे बहुत पता नहीं, क्‍योंकि उस वक्‍त के मैं सक्रिय समाज से दूर था न कोई मुलाकता याद है न उनका चेहरा। और हिमेंद्र सिंह चूकी मेरी पहली पुस्तक के विज्ञापन दाता थे इस लिए मैं उनके विषय में इतना ही कहूँगा कि सही गलत की बारीक पहचान  और त्वरित निर्णय ही खूबी रही।

गहमर थानाध्‍यक्ष होकर आये और गहमर के कोतवाली हो जाने के कारण प्रथम कोतवाल होने का गौरव प्राप्‍त किये  राजीव सिंह  रक्षपाल सिंह के बाद ऐसे कोतवाल रहे जो अपराध के साथ-साथ गहमर थाने की व्‍यवस्‍था और अपने मातहदो के मनोबल पर बढ़ाने पर ध्‍यान दिया। गहमर कोतवाली के आफिस के सामने लगा नया खड़जा एवं ताडीघाट-बारा मार्ग की तरफ लगा हुआ गेट राजीव सिंह की देन है। उनके कार्यकाल में मुझे एक दो बार गहमर थाने जो कोतवाली में बदल चुकी थी जाने का सौभाग्‍य प्राप्‍त हुआ।  राजीव सिंह ने न सिर्फ कोतवाली में निर्माण कराया बल्कि अपने मातहदो के बीच होली जैसे त्‍यौहार मनाकर कोतवाल और सिपाही के बीच की दूरी खत्‍म किया और उनका हौसला अफजाई किया।  2020 फरवरी में राजीव सिंह के कार्यकाल में एक यादव की मौत को राजनैतिक तूल देकर बाहरी लोगो द्वारा गहमर के माहौल को खराब करने की जो कोशिश की गई जिसे राजीव सिंह के द्वारा न सिर्फ कड़ाई से रोका गया बल्कि कई राजो से पर्दा भी उठाया गया।  गहमर के सायर में हुए सैनिक हत्‍याकांड में आरोपीयों को 24 घंटे के अन्‍दर जेल भेजा।  राजनैतिक कारणो से उन्‍हें हटाया गया। मगर वह भी अपनी एक छवि छोड़ने में कामयाब रहे। 

उनके जगह नये कोतवाल विमल मिश्रा ने गहमर की कमान संभाली । उनकी लाकडाउन में की गई जनसेवा अनुकर्णिय रही । व्‍यवस्‍थाएं सभी ठीक थी मगर वह गहमर भाजपा जनों के आन्‍तरिक युद्व और स्‍वाभिमान की लड़ाई का शिकार बने। वर्तमान कोतवाल गहमर कोतवाली के सबसे अपराधिक मौसम में गहमर की कमान संभाले हैं, अब देखना है कि किस कदर यहॉं के अपराधो पर अंकुश लगा पाते हैं   ?

यदि अपराधो की बात करें तो धान की फसल तैयार होने के साथ गहमर के खेतो पर बिहार के अपराधीयों द्वारा खलि‍हानों  को लूटने की, तैयार फसलों को जलाने की, खलि‍हानो में साये किसानो पर हमला करने की घटना आम होती है। जिससे किसान पूरी तरह परेशान रहते हैं। करहियॉं, भतौरा, गहमर में कई किसानो की हत्‍या तक हो चुकी है। दर्जनो किसान लूटे जा चुके है। हत्‍या में यदि बात करें तो सुनील हत्‍याकाड़ गहमर, पिता-पुत्र हत्‍याकाड़ भतौरा, बागीचे में सोये वृद्व की हत्‍या करहियॉं से कुछ उदाहरण है। ऐसे में नये कोतवाल को इस समय इन घटनाें को रोकने में काफी मेहनत करनी होगी। वह अपनी मेहनत में किस तहर स्‍मार्टपन लाकर घटनओं को रोक एक स्‍वच्‍छ अपराधमुक्‍त वातावरण दे पाते हैं यह तो वक्‍त बतायेगा।

बिहार में भी चुनाव और त्‍यौहारों के कारण बड़ी मात्रा में शराब की पहले की अपेक्षा बहुत तेजी से होगी। गहमर कोतवाली और उनसे चौकीयों के सिपाहीयों की मदद से मोटरसाइकिलो पर लाद कर ,बारा गॉंव होत हुए पैदल कर्मनाशा नदी पार करके ,मगरखाई सायर देवल के रास्‍ते के रास्‍ते कर्मनाशा पार करके अन्‍य कई रास्‍तों से भारी मात्रा में बिहार शराब की तस्‍कारी होती हैं। बिहार जाने वाले अवैध शराब तस्‍कारी का प्रमुख गढ़ बन चुका है गहमर । गहमर कोतवाली क्षेत्र से प्रतिदिन लाखो रूपये की शराब पुलिस विभाग के सहयोग से, स्‍थानीय लोगो के सहयोग से पैदल व मोटसाइकिलो के द्वारा बिहार में जाती है। ऐसे में बिहार जाने वाली शराब को नये कोतवाल कहॉं   त   ? कैसे रोक कर अपने आपको एक र्स्‍माट कोतवाल साबित करते हैं यह आने वाले वक्‍त में देखना है। 

गंगा नदी से बालू निकालना यह पूरी तरह अपराध है। ऐसे में जगह जगह ट्रैक्‍टरों पर दिखने वाले सफेद बालू साफ ईशारा करते है कि क्षेत्र में अवैध खनन हावी है। आप आये दिन खास तौर से तरकारी कामों में सफेद बालू का प्रयाेग देख सकते हैं जबकि सफेद बालू का प्रयोग निर्माण में सही नहीं माना जाता है। ऐसे में नये कोतवाल इन अवैध खनन को रोक कर कैसे अपने आपको एक र्स्‍माट राजपूत कोतवाल साबित करते हैं यह भविष्‍य के गर्त में है। 

गहमर कोतवाली क्षेत्र की देवल चौकी एक तीर्थ स्‍थल के रूप में पुलिस एवं अपराध के पितामहों के बीच विख्‍यात है। हर कोई देवल पुलिस चौकी पर माथा टेक कर लक्ष्‍मी देवी को प्राप्‍त करना चाहता है। देवल से होने वाले प्रमुख अपराधों में ओवरलोड वाहन, शराबो की तस्‍करी, कृर्षि अपराध इत्‍यादि प्रमुख हैं, ऐसे में गहमर कोतवाल अपने अन्‍तगर्त आने वाले इस चौकी पर कितना ध्‍यान दे पाते हैं और यहॉं के माध्‍यम से होने वाले अपराधो में कितनी कमी कर पाते हैं यह तो उनके स्‍मार्ट छवि पर ही आधिरत होगा, हम जनता तो केवल इन्‍तजार ही करेगें। 

गाजीपुर में गंगा पर बने पुल के शुरू होने के बाद बिहार, बंगाल सहित देश के पूर्वोतर से आने वाले ट्रको का गाजीपुर बारा मार्ग प्रमुख केन्‍द्र फिर बनने जा रहा है। बक्‍सर में गंगा नदी पर बना पुल खराब होने एवं नौबतपुर बार्डर से ओवरलोड वाहन पर रोक के कारण नियमों के विपरीत भार लेकर ट्रक इसी गहमर मार्ग को उत्‍तर प्रदेश की सीमा में प्रवेश करने के लिए चुनते हैं, वह चाहे देवल सीमा से प्रवेश करें या बारा सीमा से दोनो तरह से ओवरलोड वाहन नियमों के विपरीत ही गुजरते हैं। ऐेसे में गहमर कोतवाल पहले से चल रही पुर्जी प्रथा को खत्‍म कर ओवरलोड वाहनो पर कितना प्रतिबंध लगाते हैं ? यह तो उनके स्‍मार्टनेस कार्य पद्वित से ही पता चलेगा। वैसे अखंड गहमरी को उम्‍मीद है कि उनकी कार्यप्रणाली से अब ताड़ीघाट बारा मार्ग से ओवर लोड वाहन नहीं गुजरेगें। जिससे गाजीपुर में गंगा पर बना पुल कुछ सुरक्षित होगा।

अक्‍टूबर महीने के साथ त्‍यौहारों का मौसम आ रहा है। त्‍यौहारों के मौसम के साथ-साथ जाड़े का मौसम शुरू हो रहा है। यदि पूर्व की चोरी की घटनाओं पर नज़र डाले तो देखा जा सकता है कि इस क्षेत्र में अक्‍टूबर नवम्‍बर और दिसम्‍बर के मध्‍य तक ही अधिकाशं चौरी की घटनाएं होती है। अभी हाल में गहमर में एक घर में हुई चोरी में बंदुक सहित कई सामान गया है जिसका पर्दापाश नहीं हुआ।  अब कोतवाल महोदय इन चोरीयों का पर्दापाश कैसे करते हैं? आने वाले समय में चोरीयॉं कैसे रोकते है? यह तो आने वाला वक्‍त ही बतायेगा, हम और आप क्‍या बतायें, क्‍योंकि हम और आप स्‍मार्ट तो हैं नहीं।

उत्‍तर प्रदेश में पंचायत चुनाव आ रहे हैं। गहमर का इतिहास गवाह है कि यहॉं चुनाव में मतदान के दिन तो कुछ नहीं होता परन्‍तु चुनाव के पूर्व राजनीति हावी रहती हैं। ग्राम प्रधान चुनाव में यहॉं के छुटभैये नेता भी शेर हो जाते है और छोटी से छोटी घटना को बड़ा बना कर जो प्रस्‍तुतिकरण करते हैं उसका खामियाजा आम जनता भुगतती है। वर्ष 2005 में मनोज हत्‍याकाड़, 2010 में विवाद एवं 2017 के विधानसभा चुनाव के पूर्व हुए हिंसा इनका एक उदाहरण है ऐसे में जब पंचायती चुनाव नजदीक हैं, हर कोई बरसाती मेढ़क की तरह निकल कर ग्राम सभा का कर्मठ, ईमानदार, समाजसेवी बनकर दलितो व पिछडी का नेता बन अपनी राजनैतिक रोटी सेकने के लिए आग जला रहा है। नये कोतवाल कैसे इस समस्‍या से निपटेगें   ? यह उनकी कार्यशौली पर ही निर्भर करेगा।

 गहमर आये नये कोतवाल इस मौसम में अपराधो पर, शराब तस्‍करी पर, बालू खनन पर, ओवरलोड वाहन पर कैसे अंकुश लगाते हैं ? आपने आपको एक तेज-तरार्क स्‍मार्ट कोतवाल कैसे साबित करते है? आम जनमानस यह कह सके कि एक स्‍मार्ट कोतवाल गहमर कोतवाली को प्राप्‍त हुआ जो गहमर थाने के 114 सालों के इतिहास में पहली बार हुआ है जो एक स्‍मार्ट कोतवाल आया है। अब जब उनके जनपद में 141 दिन शेष हैं। अखंड गहमरी यही प्रार्थना करेगा कि उनके जाने के बाद उनके कारनामें गहमर कोतवाली के इतिहास में लिखना इतिहासकारों व अखंड गहमरी की मजबूरी हो जाये।

*अखंड गहमरी* गहमर गाजीपुर* ।




सोमवार, 28 सितंबर 2020

क्‍या गाजीपुर जिले में भाजपा पर भारी है सपा ? क्या नहीं है अधिकारीयों और ग्राम प्रधानो पर भाजपा का खौफ ? अखंड गहमरी



 क्‍या जिले में भाजपा पर भारी है सपा  ? क्या नहीं है अधिकारीयों पर भाजपा का खौफ ? या खुद नहीं चाहती भाजपा की हो प्रधानो पर भ्रष्‍टाचारों के आरोप की निष्‍पक्ष जाँच और उनको मिले सजा ?  आखिर क्‍यों नहीं होती सपा समर्थित  गहमर ग्राम प्रधान की सही और  निष्‍पक्ष जॉंच? यह एक बड़ा सवाल उभर कर जनता के सामने आ रहा है।
        आम जनता को दिखाई देने वाला ग्राम प्रधान का भ्रष्टाचार अधिकारीयों को कैसे नहीं दिखाई देता ? पूरी तरह से भ्रष्‍टाचार में लिप्‍त ग्राम प्रधान कैसे जेल की सलाखो और मोदी-योगी के भ्रष्टाचार निरोधक दस्‍ते से बहुत दूर है ? यह समझ से परे है। इस आधार पर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जिले में  वर्तमान सपा बसपा सर्मथन से चुने गए सांसद न सिर्फ जमानियॉं विधान सभा में भाजपा पर पूरी तरह हावी हैं बल्कि अधिकारीयों तक उनकी पहुँच काफी मजबूत है। जिले में कई भाजपा विधायक और जिला पंचायत सदस्‍यों के होने के बाद भी अधिकारीयों में इनकी कोई हनक दिखाई नहीं देती है। यदि देखा जाए तो इस समय भाजपा में जमीन से जुड़े दबंग नेताओं का आकाल है। जनता से लेकर अधिकारों तक उनकी  गाड़ी मोदी-योगी के नाम के सहारे ही चल रही है। कहानी केवल गहमर की नहीं जमानियॉं तहसील समेत गाजीपुर के कई गॉंवों की हैं जो ग्राम प्रधानों के भ्रष्‍ट्राचार में दबे हैं और जॉंच की मॉंग करते करते मर रहे हैं, परन्तु उनकी सुनने वाला कोई नहीं है। ऐसे में उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का यह कथन कि '' प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने पर आधी सपा जेल में" महज एक जुमला ही जान पड़ता है।

आज देश में भाजपा- सपा, बसपा और कॉंग्रेस जैसी प्रमुख पार्टीयों पर बहुत भारी पड़ रही है। सपा, कॉंग्रेस,बसपा के दिग्‍गज से दिग्‍गज नेता जॉंच के घेरे में आ चुके र्हैं, कुछ जेल में हैं कुछ जेल जाने की तैयारी में हैं। परन्‍तु उत्‍तर प्रदेश के गाजीपुर जनपद और गाजीपुर जनपद के खास तौर में जमानियॉं विधान सभा में प्रधानो की लूट-खसोट को देखते हुए कहना गलत नहीं होगा कि  सपा  बसपा के बड़े नेताओं को तो छोड़िए सपा का ग्राम प्रधान भी भाजपा पर बहुत भारी है। सभी जानते हैं कि गहमर प्रधान मीरा चौरसिया सपा समर्थित होते हुए सपा के बड़े नेताओं के करीबी मानी जाती हैं।  यही कारण है कि भ्रष्टाचार की दर्जनों शिकायत के बाद भी वह जेल की सलाख तो छोड़िए छोटी सी कार्यवाही से भी  बाहर हैं। जो साफ इशारा कर रहा है  कि जमानियॉं में सपा बसपा सांसद आज भी भापजा पर बहुत भारी पड़ रहे हैं।
 
गहमर प्रधान के खिलाफ वर्ष 2017 से कई बार शौचालय के निर्माण में धॉंधली की जॉंच आयी। उस समय गहमर के रघुवीर सिंह ने शौचालय और राज्‍य वित्त आयोग के पैसे की धॉंधली को लेकर जॉंच की मॉंग की थी। बयान पर बयान हुए मगर कोई कार्यवाही नहीं हुई। मेरे जॉंच की मॉंग पर जो जॉंच कराई गई उसको सुन कर हँसी आयेगी।राज्‍य वित्त आयोग के पैसे की जॉंच की मॉंग पर जॉंच आई और पता चला कि मनरेगा के तहत कोई काम ही नहीं हुआ था।

 राज्‍य वित्त आयोग के पैसे से भ्रष्‍टाचार, अपने पुत्र को मेठ बनाने का भ्रष्टाचार, अपने परिवार के नाम से चेक काटने जैसे नियमो से हट कर कार्य, घटिया एवं रद्दी कार्य, बिना कार्य के पेैसे को निकासी, निमार्ण कार्य में घटिया सामाग्री का प्रयोग,  इत्‍यादि जैसे हकीकत के धरातल पर दिखने वाला भ्रष्टाचार जॉंच अधिकारीयों को कैसे नहीं दिखा?  इस प्रश्‍न का जबाब आज तक किसी के पास नहीं है। इसका मतलब साफ है कि सपा समर्थित ग्राम प्रधान गहमर राजनीति में भी हसुआ अपनी तरफ ही खीचंता है। मुहावरे को चरितार्थ कर रहे हैं।

वर्ष 2015 के ग्राम पंचायत चुनाव में गहमर के प्रधान पद पर चुनी गई मीरा चौरसिया के भ्रष्टाचार की बेहतरीन कहानी  खुद सरकार की मोबाइल ऐप कह रही है। इस एप में दिये हुए कार्यो और धन-निकासी को देखने के बाद बच्‍चा भी कह सकता है कि मीरा चौरसिया गहमर की सबसे भ्रष्‍ट प्रधान साबित हो रही हैं। मीरा देवी के कार्यकल में गहमर में भ्रष्‍टाचार के अलावा दूसरा काम  उस ऐप के माध्‍यम से मुझे दिखाई नहीं देता। अगर आपको दिखाई देता है तो आप मुझे बता सकते हैं। अगर यह मान लिया जाये कि वह ऐप पूरी तरह गलत है तो फिर बात ही खत्म है , तब तो मीरा देवी चौरसिया गहमर की सर्वाधिक अच्छी प्रधान है।

मीरा देवी के कार्यकाल में गहमर में लगभग साढ़े 12 करोड़ रूपये सरकार के द्वारा गॉंव के विकास में आये। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि यदि इस राशि का 75 प्रतिशत भाग भी इमानदारी से खर्च हुआ होता तो आज गहमर विकास के मामले में सबसे अग्रणी होता।

मेरा दावा कोई हवा हवाई नहीं है। हकीकत की धरातल पर उतर कर आप भी देख सकते हैं। ये अलग बात है कि यह सब कुछ सरकार के जॉंचकर्ता को दिखाई नहीं देता। गहमर मे मीरा देवी पर दर्जनों बार जॉंच आ चुकी है, मगर हर बार जॉंच बंद बक्‍से में चली जाती है। जॉंचकर्ता उसी पंचायत भवन में बैठ कर प्रधान की मिठाई खाकर चले जाते हैं जिस पंचायत भवन में खुद प्रधान का भ्रष्‍ट्रचार चीख चीख कर बोलता है।
 


वर्ष 2017 तक  में समाजवादी पार्टी की सरकार होने के कारण गहमर प्रधान पर जॉंच की कल्‍पना करना ही बेकार था।परन्‍तु जब चुनाव के पूर्व केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि उनकी सरकार आने पर भ्रष्टाचारियों पर कार्यवाही होगी, तो कुछ आशा जगी। 2017 में न सिर्फ उनकी सरकार आई, बल्कि जमानियॉं विधान सभा से गहमर का प्रत्‍याशी ही भाजपा विधायक बन कर आया परन्‍तु भाजपा की विधायक अपने वर्तमान प्रधान मीरा चौरसिया पर उन्नीस साबित हो रही है और प्रधान उन पर 29।  जिसे भाजपा शासन में सलाखों के पीछे होना चाहिए था वह खुले आम घूमता दिखाई दे रहा है। अब आते हैं आकड़ो पर वर्तमान प्रधान द्वारा गहमर के पंचायत भवन में मुख्‍य गेट से पानी टंकी तक सीसी इन्‍टर लाकिंग एवं अन्‍य कार्य दिखाये गये हैं। जिसमें कुल खर्च 5 लाख 8 हजार 600 रूपये हैं। अब आपको बताते है वहॉं लगे कुल ईंटो की संख्‍या-

मेन गेट से पानी टंकी तक कुल दस ईटों की चौड़ाई में 197 लाइन ईंट लगे हुए हैं।यानि कुल ईंटो की संख्‍या 1970। मैं अपनी ऑंख का भ्रम मानता हूँ तो 2000 ईंट मान सकते हैं। इसके बाद मुख्‍य गेट से दक्षिण 4 ईंटो की चौड़ाई में कुल 88 लाइने,मुख्‍य गेट से उत्‍तर 4 ईटों की चौड़ाई में 87 लाइने एवं मुख्‍य गेट से बाहर 24 लाइने ईटो की चौड़ाई में 14 लाइने लगी हुई हैं। कुल रंगीन सीमेंट की ईंटे हुए 1083 तथा लगभग 300 सीमेंट की ईंटे प्‍लेन। अब इन्‍हीं ईंटो को कायदे से बिछा देने और उस पर बालू डाल देने को इन्‍टर लाकिंग कहते हैं।

अब आप खुद अनुमान लगा सकते हैं कि लगभग 3500 पीस सिमेंन्‍ट की ईंटे तो मौके पर मौजूद है, 1500 ईंटे टूट फूट मान लेत हैं तो भी आप सहज अनुमान लगा लीजिए कि क्‍या यह काम 5 लाख का है और जो अन्‍य कार्य लिखा हुआ है वह आप खुद देख सकते हैं कि अन्‍य कार्य क्‍या हुआ है।मैं तो रोज आते जाते देखता हूँ।

अन्‍य कार्यो पर एक सवाल आता है रंगरोगन चहारदीवारी की, तो चहारदीवारी की रंगाई पुताई पहले हो चुकी थी। अगर इस बज़ट में दिखाया गया है तो क्‍यों नही उसका जिक्र किया गया, क्‍योंकि पुताई का रंग घर में तो बनता नहीं वह बाजार से ही खरीद कर आता है।  अभी एक सामुदायिक शौचालय जरूर पंचायत भवन में बन रहा है लेकिन जब केवल टाइल्स लगाने का बज़ट और छोटे छोटे रैंप बनवाने में 65 हजार रूपये खर्च, गोपाल राम गहमरी सेवा संस्‍थान में तीन कमरो के फर्श बनवाने में 65 हजार खर्च, तो इतना बड़ा सामुदायिक शौचालय यदि पॉंच लाख में है तो उसका जिक्र क्‍यों नहीं। कहना गलत न होगा कि जितना खर्च मीरा देवी ने ग्राम पंचायत भवन पर किया है उतने में तो पूरा भवन चॉंदी का हो जाता है। वैसे वहॉं खर्च करें भी क्‍यों नहीं दिखाये भी क्‍यों नहीं वह उनके परिवार का गाड़ी गैरेज जो है। ग्राम प्रधान ने अपने काल में पंचायत भवन पानी टंकी का जो हाल किया है उसकी दुदर्शा देख कर ही आपको इनके भ्रष्‍टाचार का अंदाजा लग जायेगा।
 
अब देखिये एक और उदाहरण दिखाता हूँ पंचायत भवन का- नीचे चित्र में जो आप पंचायत भवन देख रहे है यह वर्ष 1962 में स्‍व0 श्री सुबेदार विश्‍वनाथ सिंह जी के द्वारा बनवाया गया एक शानदार भवन था, समय के साथ साथ रखखाव के आभाव मे सूर्खी चूने को बना वह भवन अब जर्जर हो रहा था। उस भवन के निर्माण को देखने के बाद लगात था कि वह आगामी 60 साल के भविष्‍य को देख कर बनवाया गया था। डेढ से दो फिट चौड़ी दिवारे थी उस भवन की । उस भवन में काफी ईटें और पुरानी लकड़ी के बिम लगे हुए थे, यदि आज के लागत के अनुसार देखा जाये तो वह बिल्डिग लाखों की थी जिसका कोई अता पता नहीं है। कहॉं गया उसका सब ईट और लकड़ी ? ग्राम प्रधान के पास इसका कोई जबाब है ? ग्राम सभा गहमर में कुएं को निर्माण के नाम, हैंड पम्‍पो के मरम्‍मत के नाम पर एक एक साल में पॉंच पॉंच लाख रूपये दिखाये गये है।  मुख्‍यमार्ग से जूनियर हाई स्‍कूल कन्‍या तक के सी सी सड़क निर्माण के काम को 5 लाख रूपये के लगभग दिखाया गया है जबकि यह यह मार्ग सीसी हुआ ही नहीं। एक आर्श्‍चय की बात और मुझे उस ऐप के माध्‍यम से दिखाई देता है जहॉं कही भी सीसी इन्‍टर लाकिंग  का बजट दिखता है वह पॉंच लाख, आठ हजार ही लगभग दिखता है।  ये कैसा आकड़ा है समझ से परे है। बात यही खत्म नहीं होती है आपने देखा होगा कि पंचायत भवन की, पंचायत भवन में बनी बाउन्ड्रीवाल को बनाने के लिए 4 लाख 99 हजार से ऊपर की धनराशि है। कुल मिला कर केवल गहमर पंचायत भवन में 16 लाख के लगभग रूपये विकास के नाम पर खर्च किये जा चुके हैं। 



एक नहीं दर्जनों उदाहरण है गहमर ग्राम प्रधान के भ्रष्‍टाचार के, मगर इन सबके बाद भी ग्राम प्रधान पर कार्यवाही न होना यह साबित करता है कि कही-न -कही भाजपा पर सपा बहुत भारी है अन्यथा जिस दल की  केन्‍द्र और राज्‍य में पूर्ण बहुत की सरकार हो उस दल के विधायक और जिला पंचायत सदस्‍य के पैत्रिक गॉंव में ग्राम प्रधान स्‍तर से भ्रष्‍टाचार की इतनी प्रमाणित शिकायत हो और ग्राम प्रधान बच जाय यह संभव ही नहीं है। मेरा दावा है कि आज यदि जरा भी ईमानदारी से जॉंच हुई तो मीरा देवी का नया ठिकाना जेल की सलाखें ही होगी।

आईये दिखाते हैं एप के माध्‍यम से कुछ विशेष कार्य और उन पर खर्च

हैंड पम्‍प उच्‍चीकरण 17 लाख 50 हजार,पंचायत चुनाव में रैंप  3 लाख 75 हजार, सोलर लाइट मरम्‍मत कार्य 6 लाख रूपये , हैंडपम्‍प रिबोर 25 लाख रूपये , हैंडपम्‍प मरम्‍मत 15 लाख , सोलर लाइट  पर वयय 17 लाख 50 हजार , गंगा के विभिन्‍न घाटो पर मिटट़ी साफ कराई 2 लाख 55 हजार , पंचायत भवन की चारदिवारी 4 लाख 99 हजार , गहमर गंगा घाट पर अंतियोष्‍टी स्‍थल 85 हजार।

इन आकड़ो को देखने के बाद तो यही लगता है कि गहमर मे लूट खसोट नहीं डकैती हुई हैं और डकैती मीरा देवी करें क्‍याें नहीं, उनके पास कहने को यह है कि मैं पिछड़ी जाति की हूँ राजपूतो का गॉंव है इस लिए आरोप है। तो ठीक है मीरा देवी जी यह आरोप ही सही इसे गलत साबित कर दें। और आप को इस लेख पर मानहानी के दावे के लिए मुझे कारण बताओं नोटिस भेजने की भी जरूरत नहीं। यह लेख पर अगर आप सीधे मानहानी का मुकदमा कर सकती हैं।

वैसे भारतीय संविधान में पद से हटने के वर्षो बाद भी लोग जेल जाते हैं। घोटालो में चाहे वह लालू हो, सुखराम हो, कालमाड़ी हो, आशा राम बापू हो, राम रहीम हो,मधु कोड़ा हो, पी0चितम्‍बरम हो, या कोई और नेता, फिल्म स्टार  रिया चक्रवर्ती हों।उस वक्त ना पैसा काम आता, ना शोहरत और ना ही पहुँच। कानून ने आरोपी की गर्दन नापी ही है।आज नही तो कल मीरा देवी भी रिया चक्रवर्ती और लालू यादव की तरह अपने असली जगह पर पहुँचेगीं ही।


अखंड गहमरी।



 

पुराना पंचायत भवन फोटो अखंड गहमरी