गुरुवार, 30 जुलाई 2020

प्रधान सेवक जी बहुत हुआ चीन, राफेल व मंदिर के नाम पर चोचलें, अब बंद करीये इसे। रोटी और जीवन खतरे में इसे बचाईये।

कोरोना नाम के आगे पूरा विश्‍व लाचार, परेशान है। हर कोई इसके इलाज का तरीका तो ढूढ़ ही रहा है परन्‍तु उसके साथ वह नागरिकों के जीवन को बचाने, उनकी रोजी रोटी और अन्‍य समस्‍याओं को दूर करने में लगा है। परन्‍तु भारत देश के प्रधान सेवक जी दीपक जलवा कर, थाली बजवा कर, अपने मन की बात सुना कर और आरोग्‍य एप से कोरोना को दूर भगा कर एवं अपने एक गलत निर्णय से बुरी तरह हार कर अब जनता को न सिर्फ मौत के मुहँ में छोड़ चुके हैं बल्कि अब तो वह हर आदमी को पाई पाई के लिए मोहताज भी कर चुके हैं। अपनी इन असफलताओं से जनता का ध्‍यान भटकाने के लिए नित्‍य कभी चीन तो कभी राफेल तो कभी राम मंदिर की बात कर तरह तरह के चोचलें गढ़ रहे हैं।
गलत निर्णय -: पहले मैं आता हूँ उनके गलत निर्णय पर। मैं अल्‍प बुद्वि जब यह समझ सकता हूँ कि भारत में नियमों की धज्‍जीयॉं उड़ाना, और आपदा में अवसर तलाशना जब स्‍वभाव में हैं तो उनको यह पता नहीं था कि भारत की जनता, उनके अधिकारी व खुद उनके नेता कितने ईमानदार हैं जो कही फँसे हुए आदमी को महीनों तक दो वक्‍त की रोटी खिला का उनके स्‍वास्‍थ एवं मौलिक जीवन यापन की वस्‍तु उपलब्‍ध करा सकेेगें। क्‍या उनको पता नहीं था कि किराये के मकान मे रहने वाले व्‍यक्ति का किराया यदि मकान मालिक छोड़ देगा तो वह भोजन कहॉं से करेगें। आनन-फानन में लिये लाकडाउन के फैसले ने सबको घबड़ा दिया, कुछ दिन तक तो लोग इंतजार किये मगर जब भूखो मरने की नौबत आई तो पैदल चल दिये। दूसरे लाक डाउन के बाद सरकार ने उनको जिस तरह अपने अपने घर भेजने की व्‍यवस्‍था की हकीकत के धरातल पर किसी से छुपी नहीं।
महाराष्‍ट्र और तमिल में केस बढ़ते गये, लोग संक्रमित होते गये और अपने घर भागते गये। कितने लोग रास्‍ते में मर गये। मदद कर अपने आपको महान बनने वाली भारतीय रेलवे गरीबो का खून चूस कर पैसे लिए। आज यदि देखा जाये थोड़ा पीछे जाकर तो संक्रमण मुख्‍य रूप से बम्‍मई, दक्षिण व तमिल से आये लोगो से गॉंव गॉंव पहुँचा है। लाक डाउन करने से पूर्व यदि घोषण कर दी गई होती कि जिसको जहॉं जाना है रजिस्‍ट्रेशन करा कर चला जाये नही तो लाकडाउन में फँस जायेगा, स्थित काफी नियंत्रण में होती।
होली का त्‍यौहार रखने के कारण अंधिकाश लोग अपने घर आये हुए थे। आनन फानन में लाकडाउन से जो कही दो दिन के लिए गया था वही फँस कर रह गया। जिसकी पीड़ा मैने सुनी है। अब जब स्थित बिगड़ गई, सरकार के हाथ से सब कुछ निकल गया तो सरकार मंदिर, राफेल और चाइना के नाम पर लोगो का ध्‍यान इस समस्‍या से निकालने की कोशिश कर रही है।
चीनी विवाद -: पहले कोरोना काल में बढ़ती समस्‍याओं के प्रति ध्‍यान हटाने के लिए चीन विवाद और युद्व को हवा दी गई। चीन आगे आया, चीन पीछे गया, करते करते हमारे 20 जवान बलिदान कर दिये गये। चीन एक ही रात में दो किलोमीटर आगे आकर बंकर नहीं बना लिया। ना चीन रातो रात वहॉं शैतानी कर रहा था। सारी सूचना शासन को थी। मगर हमारी सरकार को तो सेना को बलिदान करने की आदत पड़ गई है। सेना का बलिदान और भाजपा का चोली दामन का साथ है। चाहे वह किसी प्रदेश या देश के चुनाव में विजय हेतु अपने प्रचार प्रसार को तेज करना हो या किसी समस्‍या से जनमानस का ध्‍यान भटकाना हो वह सेना को बलिदान करने से नहीं चूकती।  बलिदान की आड़ में कोरोना की दुव्‍यवस्‍था को छिपाने का असफल प्रयास कर रही थी।
देश और राफेल -: अब जब चीन पुराना होने लगा लोग इससे हट कर प्रधान सेवक से प्रश्‍न करने लगे तो फिर देश को देश की सुरक्षा के साथ जोड़ा गया।मैं पूछना चाहता हूँ कि आज के पहले विमानो की या सैन्‍य उपकरणो की खरीद नहीं हुई? तो इस बार इतना हंगामा क्‍यों? जिस समय जैसी टेक्‍नोलाजी रही उसके हिसाब से हर समय उपकरणो की खरीद हुई। राफेल तो खरीदा हुआ सामान आ रहा है। कोई भारत में निर्मित तो हुआ नहीं मोदी काल में जो इतना शोर। जब राफेल की खरीद पर इतना हल्‍ला तो यदि मोदी काल मे राफेल भारत में बनता तो क्‍या होता? खरीद को जब सरकार इस प्रकार प्रमोट कर रही है तो बनाने के बाद तो वह आसमान में बैनर लगा देती। राफेल की तमाम खूबियॉं उस समय थी आप के समय भी हैं, ठीक है आपने कॉंग्रेस काल में राफेल का विरोध कर के राफेल ले जाये। मगर इतना बता दें सर जी कि अभी वर्तमान में राफेल ही जरूरी है या हम और हमारा जीवन यापन, और खरीदे हुए सामान पर इतना सीना चौड़ा क्‍यों? वह भी वर्तमान हालत में जब हर तरफ मौत व बेबसी का ताड़व है।
राम मंदिर दूसरी बात जब पूरा देश महामारी से परेशान हैं। चालीस हजार लोगो के घर में मौत का मातम पसरा है मोदी जी आज आपके चहेते अम्‍बानी परिवार की सम्‍प‍ति भले बढ़ती जा रही है, वह विश्‍व के प्रथम धनिक बनने की राह में अग्रसर है लेकिन बाकी के व्‍यपार चौपट हो चुके हैं। लोगो के भोजन के लाले पड़े हैं। जीवन बचाने की प्रक्रिया में लगे हैं ऐसे में आप अपने चोचलों से कितना भटकाएंगें।
प्रधान सेवक जी छोडीये अखंड गहमरी को अब तो आपके अंध भक्‍त भी आपके चोचलेे समझने लगे हैं,  लेकिन वह बेचारे करें तो क्‍या करें? कोई आपके दल से जुड़ा है तो किसी की भावनाएं आपके साथ जुड़ी हैं। वह भी भूखमरी एवं व्‍यवसायों के समाप्‍त होने का दंश झेल रहे हैं। हम तो अपनी बात लिख कर आप का विरोध करके अपने अंदर की आग को कुछ समाप्‍त कर लें रहे हैं मगर वह बेचारे तो सब जानते हुए परेशान रहते हुए भी आपके समर्थन में बोलने को मजबूर हैं। अगर अखंड गहमरी की बात का भरोसा नही हो तो इस पोस्‍ट पर आकर देख लीजिएगा इसके विरोध में आये वक्‍तव्‍य और फिर उनके घर और दिल में झॉंक कर देखीयेगा आपको हकीकत समझ में आ जायेगी।
इस लिए बंद करीये चोचलें और सबको साथ लेकर पूरी ईमानदारी से इस महामारी के खिलाफ मोर्चा खोलीये, चीन, पाकिस्‍तान,मंदिर, राफेल बाद में देखीयेगा। जय हिंद जय भारत

अखंड गहमरी

मंगलवार, 28 जुलाई 2020

वर मरे या कन्‍या मुझे चाहिए दक्षिणा , क्‍योंकि मैं गहमर इंटर कालेज का प्रबंधतंत्र हूँ जनाब ।

मैं एशिया महाद्वीप के सबसे बड़े गाँव में स्थित अखंड गहमरी का गहमर इन्टर कालेज हूँ। आज आपको बताता हूँ इस कोरोना काल में अपनी कुछ व्‍यथा। जो आपके इस अखंड गहमरी के गहमर इंटर कालेज के दिल में तीर की तरह चुभ रही है। आज मेरा यानि गहमर इंटर कालेज का प्रबंध तंत्र कहता है कि वर मरे या कन्‍या मुझे चाहिए दक्षिणा , क्‍योंकि मैं हूँ गहमर इंटर कालेज का प्रबंधतंत्र हूँ  जनाब। मैं इस काल में भी अपने भवन शुल्‍क जिसे आप बिल्डिग फीस के रूप में जानते हैं उसके के लालच को कम नहीं कर सकता  हूँ। अब आप ही बताईये मैं करूँ भी तो क्‍या?
भारतीय जनता पार्टी जिस तरह काँग्रेस की सरकार में पेट्रोल- डीजल और एलपीजी गैस को लेकर हंगामें करती और सत्ता में आने के बाद खुद गैस और पेट्रोल के दाम कारणों की विस्तृत व्याख्या कर के बढ़ाती है। उसी प्रकार  बिल्डिंग फीस, विकास और अनुशासन के नाम पर मेरी पूर्व  रघुराज सिंह ऊर्फ हेराम सिंह की प्रवंधन समिति को घेरने वाली मेरी वर्तमान कमेटी खुद उसी राह पर चल रही है।आज भी प्रतिछात्र 500 रूपये बिल्डिंग फीस जिसका नाम बदल दिया गया है लेती है। वो भी पूरे प्यार और नियम से। बकायदा नये समिति के अधिकारी- पदाधिकारी मौजूद रहते हैं ताकि एक भी बच्चा गलती से छूट न जाये।
अब आईये जानते है कि इस शुल्क के पीछे तर्क क्या है तो तर्क यह है कि शासन द्वारा गहमर इंटर कालेज में अध्यापकों की नियुक्तियां नहीं की जा रही हैं तो प्राइवेट अध्यापक रख कर पठन-पाठन का का काम कराते हैं, जिसके लिए हमें पैसे की जरूरत होती है, वह पैसा अनुदान के रूप में हम अभिवावकों से लेते हैं। ये बहुत अच्छी बात है सरकार की उपेक्षा के बाद भी प्रबंधनतंत्र अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है। बच्चों का भविष्य बचा रहा है।अब देखते हैं कितनी फीस ली जाती है और कितना व्यय होता है। तो इसके लिए पहले हम दो जानकारी मेरे यानि गहमर इंटर कालेज के प्रधानाचार्य से प्राप्त करते हैं।
पहली कुल छात्रो की संख्या वर्ष 2019-20 में, व दूसरी कुल ली हुई बिल्डिंग फीस 
तो गत वर्ष प्रधानाचार्य के हिसाब से लगभग 2100 बच्चे थे, जिनसे कुल शुल्क प्राप्त हुआ 2100x500=1050000
(दस लाख पचास हजार रूपये मात्र)
तो दस लाख पचास हजार की शुद्ध आमद हुई, अब आते हैं अध्यापकों की संख्या पर व उनको मिलने वाली राशि पर। तो मेरे यहॉं कुल प्राइवेट अध्यापकों की संख्या 8 है जिनको एक मजदूर की दैनिक मजदूरी 400 से 150 कम 250 रूपये प्रतिदिन मिलता है। कुल  60000 रूपये प्रतिमाह अध्यापकों की सेलरी पर खर्च होता है जो केवल 10 महीने दिया जाता है जो रकम साल में 6 लाख होती है। बाकि दो महीने ये अध्यापक  पूरे परिवार के साथ हिमालय की कंदराओं में चले जाते हैं जहाँ न उनको भूख लगती न प्यास न दैनिक आवश्यकता की चीजों की जरूरत पढ़ती है।
1050000 रूपये की धनराशि मेरे बच्‍चों के अभिवावकों से प्राप्‍त की गई जिसमें 6 लाख रूपये मेरे गैर शासकीय अध्‍यापकों को दिया गया। 1050000 में से 600000 घट गया तो बचा 450000। अब इस पैसे को लेकर मेरा प्रबंध तंत्र कहता है कि इस पैसे से मेरे भवनो को निर्माण, मेरे अन्‍दर होने वाले आयोजनो, शासन के आदेश पर जो व्‍यवस्‍था करनी होती है वह, सामानो की खरीद, लैबोट्ररी का खर्च इत्‍यादि हम इस पैसे से करते हैं। अब मेरे समझ में नहीं आता कि यह सारे खर्च तो पहले भी रहे होगें। खैर आगे की देखते हैं।
मैं एक बात पूछना चाहता हूँ कि प्रत्‍येक विद्यालय में प्रबंन्‍ध समिति इस लिए होता है कि वह विद्यालय के विकास हेतु कार्य करे। विकास हेतु शासन प्रशासन, राजनेताओं से मिल कर, स्‍थानीय स्‍तर पर प्रयास कर अपने विद्यालय के लिए धन की व्‍यवस्‍था करें। यदि सब कुछ विद्यालय को बच्‍चों के ऊपर शुल्‍क लगाकर ही व्‍यवस्‍था करनी हो तो क्‍या जरूर है प्रबंध समिति की उसके लिए तो विद्यालय का एक चपरासी ही प्रर्याप्‍त है, आप उसी को पैसा दे दे तो वही सारे काम करा देगा। प्रंबंध समिति के नाम पर विद्यालयों को उटापटक का अखाड़ा बनाने की क्‍या जरूरत है। मैं गहमर इंटर कालेज एक अर्ध शासकीय विद्यालय हूँ, जहॉं अध्‍यापको से लेकर कर्मचारीयों के वेतन तक की कोई जिम्‍मेदारी प्रंबंध तंत्र की नहीं हैं। कुछ तो पैसा शासन से जरूर आता होगा विद्यालय में खर्चो के नाम पर। मैं यहॉं आज विद्यालयों में बनने एम डी एम का जिक्र नहीं करूँगा। 
आज हमारे प्रवंन्‍धक महोदय जो समाज हित की बात करते हैं, ईमानदारी का प्रतिमान बने हुए हैं। जो विद्यालय के विकास में मिले पैसे को कमीशन मॉंगे जाने के कारण नहीं लाते हैं। उच्‍चन्‍यायालय के विद्यालय परिसर में व्‍यसायिक दुकाने नहीं रहेगी कि आदेश के पूर्व बनी 2 दो दर्जन दुकाने अपने सख्‍त नियमों के कारण बुक न करने वाले एवं तरह तरह के व्‍याख्‍यान देने एवं मानवीय संवेदनाओं का दंभ भरने ववाले प्रबंन्‍धक को इस वैश्‍विक महामारी कोरोना काल में बच्‍चों के अभिवावकों की दुश्‍वारियॉं दिखाई नहीं देती। वह इस बार भी उसी जोश के साथ गहमर इन्‍टर कालेज में उसी प्रकार विकास शुल्‍क यानि बिल्डिंग फीस ले रहे हैं जैसे आम दिन हो। उनको अपने मूल खर्च के हिसाब से इस शुल्‍क में कटौती करना दिखाई नहीं दे रहा है।
गहमर एक मध्‍यवर्गी किसानों एवं सैनिकों को गॉंव है। किसानों में ही किसी ने अपने दैनिक खर्चो की पूर्ति के लिए छोटी मोटी दुकानें खोल रखी हैं तो किसी ने अन्‍य संसाधन अपना रखें हैं जो इस कोरोना काल में पूरी तरह बंद हैं। जुलाई अगस्‍त का महीना किसानों के लिए खर्च का महीना होता है वह अपनी सारी जमाँ पूँजी किसानी में लगा देता है। ऐसी परिस्थित में मेरे  प्रधानाचार्य जी जो भवन शुल्‍क में अतिगरीबो को छूट का प्राविधान रखें हैं शासना आदेश पर वह कितना इस क्षेत्र को लाभ दे पायेगा इसके विषय में तो मैं खूब जानता हूँ यह ऊँट के मुहँ में जीरा से भी कम होगा। क्‍या नैतिकता की दुहाई देने वाले प्रबंन्‍धक महोदय को इस कोरोना काल में मानवीय संवेदनाओं के आधार पर तो कुछ कार्यवाही करनी ही चाहिए।

अखंड गहमरी


सोमवार, 27 जुलाई 2020

हिंदी साहित्‍य की नई लेखन विधा-गज़लोगीत, इतिहास में हीरे के अक्षरों से दर्ज हुआ अखंड गहमरी का नाम।

मैं अपने जीवन के 70 बसंत तो पार कर ही चुका हूँ। सारी उम्र गीत, गज़ल, छंद, दोहा, मुक्‍तक लिखने में बीत गई। कहानी, लेख भी खूब लिखा। परन्‍तु अपने शहर में क्‍या मुहल्‍लें में भी कोई नहीं जान पाया कि मैं कोैन हूँ। मंच की राजनीति में सेध लगाकर कुछ रूतवा तो कमाया मगर वो बात नहीं बनी जिससे मेरा नाम भी हिंदी के पुरोधाओं में शामिल हो सके। लोग हमारे भी भक्‍त बन सकें। हमारा नाम संगमरमर की चार दिवारी पर सुनहरे अच्‍छरों में खोदा जा सके। हिंदी गद्य व पद्य की जितनी प्रमाणिक विधाएं है सब पर तो इतना काम हो चुका हैं कि हम कितना भी काम करें हमारा नाम ऊपर तो आ ही नहीं सकता।  रोज-रोज इतने नये साहित्‍यकार आ रहे है कि पूछो मत। नित्‍य नये तकनीकी, नये-नये प्रयोग कर रहे हैं। किसी तरह जुगाड़ नाथ की कृपा से मैनें एक पुस्‍तक तो छपवा लिया है मगर वो भी ससुरी आधी तो सप्रेम भेेंट में ही चली गई। बाकी घर की जगह घेरे हैं यह उलहना रोज अपनी धनिया से सुनता हूँ।
सबके मुहँ से फेशबुक, वाटस्‍एप,टिविटर का नाम सुन रहा था। एक दिन मैनें सोचा क्‍यों न सोशलमीडिया से मैं भी जुड़ जाऊँ। पकी दाड़ी, पके बाल और चेहरे की झुर्रीयों का फायदा उठाऊँ। पटपटनियॉंगंज जाकर शानदार, जानदार वजनदार एक फोन खरीद लाया। अखंड गहमरी को खिला पिला कर उसे चलाना सीख गया। अपने कुछ पुराने मंचों के फोटो, कुछ रचनाएं पोस्‍ट कर दिया। क्‍या कमाल की चीज हैं यार ये सोशलमीडिया।
धडा-धड़ लोग जुड़ने लगे। मैं तो जितनी प्रसिद्वि 69 सालो में नहीं पाया। उम्र के पहले साल में इस क्षेत्र में काम नहीं किया। केवल केहा केहा कर के रोता था। उसके बाद तो बेसुरी आवाज में गाना गुरू ही कर दिया था, लिखना भले बाद में सीखा।रातो रात मेरा भाव बाजार बढ़ गया। अब मैं भारत ही नहीं विश्‍व का ख्‍याति प्राप्‍त, अन्‍तराष्‍ट्रीय, महाकवि बन गया हूँ। गीत गज़ल मुक्‍तक कहानी व्‍यंग्‍य सिखाता हूँ। मेरे भी भक्‍त बन गये हैं। भक्‍तों ने मुझे आचार्य, गुरूवर, गुरूदेव जैसे न जाने कितने उपाधियों से नवाजा है। अब कुछ नया करने को मन करता है, बहुत हो चुका काम। परन्‍तु अभी तक वो नहीं हुआ जिससे मेरा नाम रेत के महल पर पर संगमरमर के पत्‍थर पर लिखा जाये। यह सोच कर अपनी आत्‍मा को समझाता हूँ कि अभी पैर कब्र की तरफ बढ़ रहे हैं, लटके नहीं हैं। भक्‍तों ने कुछ किताबें तो छपवा दिया है लेकिन कब तक बासी प्रसाद खाते रहेगें ये भक्‍त। कही उनका दिमाग एकाग्र हो गया तो वह तकनीकी का सहारा लेकर बहुत आगे निकल जायेगें हमें छोड़ कर।यह बातें मुझे रात दिन परेशान करती हैं।

भगवान के घर में देर हैं अँधेर नही, एक दिन मैं अपनी वर्तमान पत्‍नी के साथ दातो का सेट नया लगवाने गया था। लौटते समय गलटनिया का होटल दिख गया। यादें ताजा हो गईं। सोचा तीनों की भॉंति इस नई दुल्‍‍हनियॉं को भी क्‍योंं न कैन्‍डल लाइट डिनर करा  दूँ, खुश हो जायेगी, मेरी भी यादें ताजा हो जायेगीं। सबसे कोने की एक खाली टेबुल देख कर बैठ गया, उस पर पड़ा मीनू ऐसे उठाया जैसे मोदी जी चाइना को भगाने के लिए बम उठाते हैं।
मीनू देख कर अपनी पसंद की खाना आर्डर ही करने वाला था कि एक मिक्स भेज दिखाई दिया। मैं सोचा कोई नई सब्जी आइ है। उसका भी आर्डर दे दिया और उसके आने का ऐसे इंतजार करने लगा जैसे मंडप में बैठा दुल्हन का  इंतजार कर रहा होता है। इंतजार की घड़ी समाप्त हुई, मेरा मिक्स वेज मेरे सामने था।
मैने मिक्स वेज देख कर वेटर को बुलाया और पूछा ये क्या है? मिक्स वेज कहाँ है? उसने कहा यही तो है मिक्स वेज, सभी सब्जीयों को मिक्स कर दिया हो गया नया डिस मिक्स वेज। अनायास ही मुहँ से निकला वाह! रे मिक्स भेज।
तभी मेरे दिमाग की बत्ती जली. मैं मुस्कुराया और जी भर खाया और खाते खाते सोचता रहा जब सब्जी मिक्स वेज हो सकती है तो काव्य मिक्‍स क्यों नही हो सकता।
अब मैं बनूगाँ नये विधा का जन्मदाता, और हर विधा को तोड़ मोड़ कर एक नई विदेशी विधा बनाऊँगा। अपने शिष्यों को सिखाऊँगा। हमारे मूल काव्यो से नई पीढ़ी का भटकाव होता है तो होता रहे। साहित्य का ब़टाधार होता है तो होता रहे। तभी मेरी बेगम जो तीन बेगमों के किचन में भुन जाने के बाद चौथी आई थी, शायद मेरे बार बार किचन और मिक्‍स वेज का नाम ले ले कर मुस्‍कुराने से डर पड़ी कि कही पुरानी घटनायें दुर्भाग्‍य बन कर उसके साथ ही तो नहीं आ रहा है, खैर वह चेहरे पर मुस्‍कान लिए बोली ।अरे जनाब हाथ तो धोईये..क्यों मुस्कुरा रहे हैं। मगर मैं तो अपनी धुन में था। मेरे सपनो में दो यह चल रहा था कि कैसे नये नये पद्वितीयों की परिभाषा बनाई जाये।
मेरे अनुभवों के आधार पर कई रूप आये कभी मैं शब्‍दों को घंटी के आकार में लिखने की विधा घंटोबजे पद्वति, तो धनुष के आकार का लिख कर धनुषोआकार पद्वति का गठन किया। कुछ बनी बनाई पद्वतियॉं भी मेरे काम आई। जैसे गीतोग़जल विधा,गीतोदोहा विधा, दोहा दोहा विधा, गज़ल के शब्‍द बदल कर हिंदी गज़ल, अंग्रेजी गज़ल, ऊदूँ गजल, गीतिकागज़ल, तो कभी ताजमहल विधा तो कभी दिव्‍याभारती विधा। धीरे धीरे अपने ख्‍यालो में खोया मैं चलता रहा मेरी बीबी के चेहरे पर हवाईयॉं उड़ती रही।
मैं घर आया चादर तान के सो गया। सुबह नेट गायब मैं टहलता रहा। शाम बीत गई, रात आ गई। तभी नेट आया।
मैं दौड़ कर आनलाइन आया। हजारो  भक्‍तों को मेरे गायब होने की चिंता थी। मैं ने भी गर्म तवे पर रोटी सेंका, भक्‍तों को बताया कि मैं नई विधाएं खोज रहा था सालो से रिर्सज कर रहा था। पूरा हुआ। भक्‍तों को खूब समझाया, वाह वाह हुई सभी ने इस नई विधा को पंसद किया। समझाते समझाते मुझे नींद आ गई मैं सो गया।
सुबह दिमाग काफी हल्‍का था,मैं गाडफादर की राह पर चल पड़ा था। नास्‍ता इत्‍यादि खाकर जब कम्‍प्‍यूटर खोला तो मन प्रसन्‍न हो गया मेरे भक्‍तों ने मेरी विधाओं पर अलग अलग समूह बना कर उसका प्रचार प्रसार शुरू कर दिया।
किसी ने मुझे आचार्य तो किसी शास्‍त्री ताे किसी साक्षत शिव की संज्ञा दे रखी थी। जो काम जीवन भर नहीं कर सका मैं वह सोशलमीडिया जी ने चंद महीनो में करके दिखा दिया। अब मेरा भी नाम बुर्गखलीफा के सबसे ऊपर हीरे के पत्‍थर पर लिखा जायेगा।
जय हिंद जय भारत
अखंड गहमरी












शनिवार, 25 जुलाई 2020

आईये मनाते हैं इस बार मिल कर ईकोफ्रैन्‍डली ईद-उल-जुहा यानी बकराईद ताकि हम रहें स्‍वस्‍थ देश रहे मस्‍त

कुछ ही दिनों के बाद हमारे देश में आपसी भाईचारे का एक प्रमुख त्‍यौहार ईद-उल-जुहा यानी बकराईद आ रहा है जिसे हम बकरीद के नाम से भी ही अधिकाशं जानते हैं। बकरीद हजरत इब्राहिम की कुर्बानी की याद में  मनाया जाता है. हजरत इब्राहिम अल्लाह के हुकुम पर अपनी वफादारी दिखाने के लिए बेटे इस्माइल की कुर्बानी देने को तैयार हुए थे। उन्‍हीें के राह पर चलते हुए अब किसी जानवर की कुर्बानी प्रतिकात्‍मक पुत्र बना कर अल्‍लाह को दी जाती है।
यदि देखा जाये तो बकरीद के जहॉं कई फायदे हैं जिसमें प्रमुख रूप से आपसी मेल मिलाप होता है, हिंदु मुस्‍लामन का भेद-भाव खत्म कर आपस में मेल जोल कर एक साथ सबको बुलाया जाता है और बैठ कर खाया जाता है। गरीबों के घर भी कुर्बानी के नाम पर आदान प्रदान हुए मॉंस से कुछ अच्‍छा भोजन बन जाता है, वही इस कुर्बानी से पर्यावरण को कुछ नुकसान भी पहुँचता है।  जैसे 
क़ुर्बानी के बाद लाखों लीटर पानी सफ़ाई में बर्बाद हो जाता है। मीट के अलावा जानवर का बाक़ी शरीर का हिस्‍सा जो नहीं खाया जाता है गंदगी के रूप में चारो ओर फैलता है, जिससे बिमारी का खतरा बढ़ जाता है। खाने के बाद हड्डीयॉं इधर उधर फेंकने से जानवर उन्‍हें उठा ले जाते हैं और किसी के घर किसी के दरवाजे पर छोड़ देते हैं। जिससे गंदगी भी बढ़ती है और बिमारी का खतरा। सफाई के नाम पर जो लाखो लीटर पानी बहता है वह आपके आस-पास ही जमा होता, जो सड़गल  कर डेगु,मलेरिया जैसे घातक मच्‍छरों को जन्‍म देकर जीवन पर खतरा बढा देता है। ऐसे में जिस प्रकार वायु प्रदूषण के कारण दिपावली पर पटाखों का, जल प्रदूषण और पानी की बर्बादी रोकने हेतु होली में पानी व केमिकल के रंगों का कम प्रयोग होना शुरू हुआ, दुर्गापूजा में बनी प्रतिमाओं का गंगा में विर्सजन रोक कर ईको फ्रेन्‍डली मूर्तियों का निर्माण हुआ जो कि प्रदूषण का कारण बन जाता था। सावन में दूध की बर्बादी बचाने के लिए रूद्वाभिषेक का चलन कम हुआ उसी तरह हम पर्यावरण और स्‍वास्‍थ को बचाने के लिए आईये इस बार मनाते हैं ईकोफ्रैन्‍डली ईद-उल-जुहा यानी बकराईद। इस लिये सभी लोग आगे बड़े आकार के मिट्टी के बकरे की क़ुर्बानी दें। जिससे बाद में मिट्टी, मिट्टी में मिल जाये, परम्‍परा भी पूरी हो जाये और हमारे पर्यावरण का भी नुकसान न हो।
तो आईये हम सब एक होकर भारत के पर्यावरण की रक्षा और बिमारीयों से बचाव के लिए ईकोफ्रैन्‍डली ईद-उल-जुहा यानी बकराईद मनाये और  मिट्टी का बकरा क़ुर्बान करें। हम आपस में हिंदु मुस्‍लिम मिल कर गंगा यमुनवी तहजीव को बरकार रखें और ईकोफ्रैन्‍डली  त्‍यौहारों की मान्‍यता पर बल देकर उसे अपनी परम्‍पराओं में सामिल करें। जिससे हम भी स्‍वस्‍थ रहें हमारे आने वाली पीढ़ी भी स्‍वस्‍थ रहें, देश भी स्‍वस्‍थ रहे।   



शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

देखें कैसे अपनी के आगे शेर बन पत्रकार को पत्रकारिता सिखाते हैं गहमर कोतवाली के ड्राइवर अंजनी

साहब कितने भी बड़े साहब क्‍यों न हों पंच तत्‍व से बने इस शरीर में जो उनकी आत्‍मा है वह 5 मानवों से बहुत घबड़ाती है। सब पर रोब जमाने वाले बड़े साहब इस बात से हमेशा चिंता में रहते हैं कि ये 5 मानव उनकी कश्‍ती को न जाने कब सागर में डूबा दें पता ही नहीं चलेगा। ये 5 मानव उनके कर्म की आत्‍मा निकाल कर उनके कर्तव्‍यपरायण को खतरे में डाल सकते हैं, यही नहीं वह साहब की आत्‍मा को कब परमात्‍मा से मुलाकात करा दें बड़े से बड़े साहब भी नहीं जानते हैं। बड़े साहब की साहबगिरी इन 5 पर नहीं चलती और यदा कदा चल भी जाये तो वैसे ही चलती है जैसे कक्षा में अध्‍यापक के कहने पर एक सहेली दूसरे सहेली के गाल पर चपत लगाती है। प्‍यार से कि सॉंप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे। बड़े साहब की इस डर का पूरा फायदा ये उठाते हैं। जहॉं बड़े साहब नहीं पहुँचते वहॉं ये पहुँच कर बड़े साहब का प्रतिनिधित्‍व करते हुए उनके धन बल का पूरा कराते है। अब आप तभी से यह सोच रहे होगें कि मैं आपको इतना क्‍यों पका रहा हूँ तो खुदा कि कसम अब नही पकाऊँगा और बताता हूँ कि बड़े साहब के सर पर सवार कौन हैं ये पॉंच। वैसे एक बात तो पक्‍का है कि पॉंच में तो एक से आप भी डरते होगें बड़े साहब और मेरी तरह आपकी भी हालत खराब रहती होगी, बिल्‍कुल सही वह पहला प्राणी हैं पत्‍नी देवी। मेरे ख्‍याल से पत्‍नी नाम ही काफी विस्‍तार में जाने की जरूर नहीं। बाकी 4 हैं बड़े साहब के मुशीं, रसोईया, वकील और बड़े साहब का वाहन चालक। जिसके हाथों में अगल अलग तरीके से बडे़ साहब की गर्दन रहती है। कोई हाथो में कलम लिए तो कोई काला कोट पहने तो कोई चुल्‍हे की आग लिये तो कोई स्‍टेरिंग लिए। 
तो ऐसे ही एक बड़े साहब के बड़े साहब हैं गहमर थाने में तैनात कोतवाल साहब के वाहन चालक श्री अंजनी राय जी, जो एक स्‍थानीय पत्रकार को अब यह सिखा रहे हैं कि उन्‍हें कलम कैसे चलानी है और उनको किसके साथ रहना हैं।
जी हॉं गहमर थाने में तैनात सिपाही  अंजनी राय वाहन चालक के रूप में कार्यरत हैं। उनको एक पत्रकार के खबर पर इस कदर परेशानी थी कि उन्‍होनें उनके साथ रहने वाले राष्‍ट्रीय सहारा के पत्रकार सत्‍या उपाध्‍याय को सलाह दी कि वह अपने साथी पत्रकार का साथ छोड़ दें उनके साथ न रहें। कारण यह कि सत्‍या उपाध्‍याय के साथी पत्रकार ने महज एक खबर यह प्रकाशित कर दी जिसमें लिखा था कि अंजनी चला रहे हैं थाना।
अब अंजनी महाराज ने फोन करके सत्‍या उपाध्‍याय को पहले तो समझाया कि वह साथी पत्रकार का साथ छोड़ दे और बात करते करते उन्‍होेंने अपनी पत्‍नी को कान्‍फ्रेंस पर लेकर सत्‍या उपाध्‍याय को भड़काने के लिए गेयर लगाना शुरू किया, वह गेयर बदलते रहे, कभी बात को संभालने के लिए ब्रेक भी लगाते तो कभी टाप गेयर में फुल एक्‍सलेटर के साथ आते। परन्‍तु शायद राय साहब यह भूल गये कि उनका पाला एक ब्राहम्‍ण से पड़ गया है। जो उनके तेज स्‍पीड वाहन चालन से फँसेगा नहीं। राय साहब की पत्‍नी को भी न्‍यायालय में अपने जुबान को खोलने का कोई मौका पंडित जी महाराज ने नहीं दिया।
गहमर थाने में मौजूद यह वाहन चालन के पूरा प्रयास किया कि पंडित जी महाराज परशुराम के रूप में आ जाये मगर पंडित जी महाराज भी आज मुशीं के रूप में आ चुके थे। अपनी भड़क को दबाते रहे, मगर वाहन चालक महोदय कभी अपनी दो सालो में कप्‍तान साहब द्वारा दिये गये प्रशस्ति पत्र का जिक्र करते, तो कभी अपनी ईमानदारी का जिक्र करते, तो कभी पत्रकार महोदय को सही और पुष्‍ट खबर लिखना सिखाते, और घूम फिर कर फिर वहीं आ जाते साथ छोड़ दो। एक बार तो उन्‍होनें यहॉं तक कह दिया कि साथ छोड़ दो अच्‍छा होगा। और पत्रकार महोदय केवल यह पूछते रहे कि जब खबर दूसरे ने लिखी है तो सिपाही जी आपने मुझे फोन क्‍यों किया? यही खबर पर एतराज है या खबर गलत है तो न्‍यायालय जाईये, मानहानी का मुकदमा करीये। परन्‍तु सिपाही जी की वही डफली वही राग कि साथ छोड़ दो, सही पत्रकारिता करों।
अब मेरी तरह आपको भी समझ में नहीं आ रहा होगा कि अपने ऊपर के अधिकारीयों को छोड़ कर अपनी पत्‍नी को कान्‍फ्रेस पर लेन का क्‍या कारण था। वह अपनी गृहमंत्री के सामने कही यह साबित तो नहीं करना चाह रहे थे कि देखो जिसे तुम चुहा समझती हो वह कितना बलवान है।
अंजनी राय ने जिस प्रकार सत्‍या उपाध्‍याय को अपनी पत्‍नी को कान्‍फ्रेंस पर लेकर फोन किया और जिस प्रकार उन्‍होंने कभी प्‍यार तो कभी धमकी का प्रयोग किया और बार बार काल रिकाडिंग करने का जिक्र किया उससे साफ होता है कि या तो अंजनी राय के सर पर कोई भारी भरक हाथ हैं जिसके इशारे पर उन्‍होनें यह काम किया है, और वह ह‍ाथ भी ऐसा वैसा नहीं पूरी तरह से जानकार हाथ और बहुत कुछ सोच कर चलने वाला और या तो अंजनी राय बिल्‍कुल निरंकुश हो गये हैं। जिन्‍हें न अपने उच्‍चधिकारीयों का डर है, न अपने पद की हकीकत का पता न अपने कर्तव्‍यों का पता।
यदि उनको किसी भी खब़र पर एतराज था तो वह इसकी सूचना अपने अधिकारीयों को देते, जिस पत्रकार ने खबर लिखी है उससे बात करते, और यदि सत्‍या से ही बात करनी थी तो वह उनसे कहते कि साथी पत्रकार से बात करीये, जो समस्‍या है उसे दूर किया जाये, परन्‍तु उन्‍होंने ने सीधे अपनी पत्‍नी को हाट लाइन पर लेकर केवल साथ छोड़ने और प‍त्रकारिता सीखने की बात की।
अब देखना होगा कि विभागीय अधिकारी दो बार के प्रशस्ति पत्र प्राप्‍त अपने इस मुलाजिम पर कौन सी कार्यवाही करते हैं, या उसे इस प्रकार की घटना आगे भी करने के लिए खुला छोड़ देते हैं। हो भी सकता है सवाल ड्राइवर का है जिसके हाथो में न सिर्फ साहब की जिन्‍दगी है बल्कि उनके कई राज भी दफ़न होगें इस ड्राइवर के सीने में।
वैसे एक बात तो तय है कि गहमर में लोकतंत्र के चारो खंभे एक दूसरे से बंँधे हुए नहीं हैं। वह अपनी अपनी डफली अपनी अपने राग गा रहे हैं, जिससे आम जनता के सपनो की इमारत खतरे में हैं।
जो भी हो इस प्रकार कि घटना 1906 में बने गहमर थाने एवं 2019 में कोतवाली हुए गहमर कोतवाली के इतिहास में पहली घटना है, जिसकी जॉंच होनी चाहिए, और जो दोषी हो उस पर न्‍याेचित कार्यवाही हो।
साथ ही पुलिस विभाग अपने इस ड्राइवर को ही नहीं अपने विभाग के हर सिपाही को यह आदेश दें कि वह अपनी बात उच्‍चधिकारीयों को बताये, खुद पत्‍नी यानि अपनी गृहमंत्री को कान्‍फ्रेस पर लेकर इस प्रकार की हरकत न करें।उसकी पत्‍नी उसकी गृहमंत्री हैं संसार की नहीं। उस विभागीय मामले में कुछ नहीं कर सकती।


अखंड गहमरी





बुधवार, 22 जुलाई 2020

मोती कम पत्‍थर ही अधिक है यूटियूब ज्ञान सागर मे

घर बैठें लाखों कमाए, ये जानीयें, वो जानीयें, घरती पर खतरा, यूटियूब चैनल कैसे करें monetization जैसे तमाम लुभावने देकर अपनी तरफ आकर्षित करने वाले यूटियूब पर ज्ञान के देवता आये दिन हजारों की संख्‍या में ज्ञान बाँटते दिखाई देते हैं। वीडियों की शुरूआत हुई नहीं कि आधा समय तो वह अपनी महिमा गाते और चैनल को सस्‍क्राइव करने की बात कहते हुए वीडियो को पूरा देखने की बात कहते नज़र आते है। यहॉं तक तो सब ठीक है। परन्‍तु जब यह ज्ञान के देवता अपनी जानकारीयों की घुट्टी हमें पिला कर चले जाते हैं और हम उसका हकीकत के धरालत पर प्रयोग करते हैं तो खोदा पहाड़ निकली चुहिया की बात प्रमाणित हो जाती है। 
वर्तमान समय में यूटियूब चैनल का रूप पूरा बदल चुका है। विगत 10-12 सालो में यूटियूब पर दर्शकों की संख्‍या भले नहीं उतनी बढ़ी है मगर यूटियूबर की संख्‍या में बेतहासा इजाफा हुआ है। पैसे और प्रतिष्‍ठा के सपने संजोये यूटियूब की तरफ आते हैं और अपने चैनल को बना कर उस पर वीडियों डालना शुरू करते हैं। हमें ज्ञान का खुद पता नहीं लेकिन हम ज्ञान देने लगते है। अपने अनुभवों को इस कदर शेयर करने लगते हैं जैसे भगवान राम ने लंका युद्व के अनुभव को शेयर किया हो। आपकी मदद का वीडियों जब आप देखना शुरू करते हैं तो आपको लगेगा कि भवसागर आप पार कर लेगें, परन्‍तु वीडियों की समाप्‍ती तक वही सब टायटाय फिस हो जाता है।
मैं आपको अपने दो अनुभव शेयर करता हूँ।
मैं यूटियूब का प्रयोग वीडियों इत्‍यादि डालने के लिए लगभग 2009 से कर रहा था। गहमर गॉंव पर आधारित कुछ वीडियो बनाता और डालता। आपको पता ही है कि गॉंव तक पहुँचते पहुँचते विकास बूढ़ा हो जाता है। सस्‍क्राइबर, monetization जैसे शब्‍द तो मुझे पता ही नहींं। इस की जानकारी तो तब हुई जब वर्ष 2015 में एक गोपाल राम गहमरी साहित्‍यकार सम्‍मेलन के चक्‍कर में दिल्‍ली गया और अपने मौसी के लड़के देवेन्‍द्र ऊर्फ बमबम के पास ठहरा था। रात में हम और उसके कुछ दोस्‍त साथ बैठे थे। हँसी मज़ाक का दौर चल रहा था। इसी बीच उसने मेरे मोबाइल में उसने यूटियूब खोल दिया मेरे एक वीडियो पर उसने काफी संख्‍या में व्‍ययू देखा तो उसके नकहा कि आपको इससे पैसे नहीं मिलते हैं। मैने कहा नहीं। तो उसने न जाने क्‍या क्‍या सेटिंग की और कहा कि आप चैनल तो monetizationहै। आपको तो पैसे मिलने चाहिए। 
उसने जो किया नहीं किया मैं नहीं जानता। वर्ष 2019 अगस्‍त में कुछ सीखते समय वह monetization एकाउन्‍ट डीलिट हो गया। मैं एक महीने तक यूटियूब पर उसे वापस लाने का वीडियो देखता रहा था, मगर नतीजा कुछ नहीं निकला आज भी वह वापस नहीं आया।
दूसरी बात वर्ष 2020 में जब लाकडाउन हुआ तो मेरा कम्‍प्‍यूटर खराब हो गया। मोबाइल पर काम होता रहा मैं यूटियूब चैनल में तरह तरह के वीडियों देखने लगा। खास तौर से मैने घर बैठे आनलाइन पैसे कमाने का वीडियों, कार्टून बनाने के वीडियों, यूटियूब चैनल को ग्रो करने के वीडियों जैसे कई श्रेणी के वीडियो देखें। हर वीडियों शुरू में तो हमारे उद्वेश्‍यों की पूर्ति करते दिखाई दिये। वीडियों सब कुछ आसान और मुफ्त बताया जाता है, लेकिन जब मैं उस वीडियों के आधार पर हकीकत के धरातल पर आता तो सब जगह या तो पैसे मॉंगे जाते या तो वह किसी के काम के नहीं निकलते। ऐसा नहीं कि मैंने घासपात वीडियों देखें मैने ऐसे ऐसे यूटिूयबर के वीडियों देखें जितने सस्‍क्राइवर लाखो में हैं। कोई फायदा नहीं आया। मैं ये नहीं कहता हूँ कि सब गलत है, मगर इतना जरूर है कि यूटियूब पर जो ज्ञान के भंडार का सागर है उसमें मोती बहुत कम पत्‍थर ही आपको अधिक मिलेगें, इस लिए आप अपने ज्ञान के विस्‍तार में आपसी सहयोग और अपने विवेक से जानकारों को खोज कर हकीकत के धरातल पर ज्ञान प्राप्‍त करें, यूटियूब के चक्‍कर में न आये, यह सिर्फ आपको  समय के साथ साथ पैसे की बर्बादी छोड़ कर कुछ नहीं देगा।





















मत खोदो पहाड़ निकलेगी चुहिया।

जी हॉं यदि न यकीन हो तो यूटियूब पर '' घर बैठे कैसे कमाये पैसें'', यूटियूब चैनल कैसे करें monetization