गुरुवार, 30 जुलाई 2020

प्रधान सेवक जी बहुत हुआ चीन, राफेल व मंदिर के नाम पर चोचलें, अब बंद करीये इसे। रोटी और जीवन खतरे में इसे बचाईये।

कोरोना नाम के आगे पूरा विश्‍व लाचार, परेशान है। हर कोई इसके इलाज का तरीका तो ढूढ़ ही रहा है परन्‍तु उसके साथ वह नागरिकों के जीवन को बचाने, उनकी रोजी रोटी और अन्‍य समस्‍याओं को दूर करने में लगा है। परन्‍तु भारत देश के प्रधान सेवक जी दीपक जलवा कर, थाली बजवा कर, अपने मन की बात सुना कर और आरोग्‍य एप से कोरोना को दूर भगा कर एवं अपने एक गलत निर्णय से बुरी तरह हार कर अब जनता को न सिर्फ मौत के मुहँ में छोड़ चुके हैं बल्कि अब तो वह हर आदमी को पाई पाई के लिए मोहताज भी कर चुके हैं। अपनी इन असफलताओं से जनता का ध्‍यान भटकाने के लिए नित्‍य कभी चीन तो कभी राफेल तो कभी राम मंदिर की बात कर तरह तरह के चोचलें गढ़ रहे हैं।
गलत निर्णय -: पहले मैं आता हूँ उनके गलत निर्णय पर। मैं अल्‍प बुद्वि जब यह समझ सकता हूँ कि भारत में नियमों की धज्‍जीयॉं उड़ाना, और आपदा में अवसर तलाशना जब स्‍वभाव में हैं तो उनको यह पता नहीं था कि भारत की जनता, उनके अधिकारी व खुद उनके नेता कितने ईमानदार हैं जो कही फँसे हुए आदमी को महीनों तक दो वक्‍त की रोटी खिला का उनके स्‍वास्‍थ एवं मौलिक जीवन यापन की वस्‍तु उपलब्‍ध करा सकेेगें। क्‍या उनको पता नहीं था कि किराये के मकान मे रहने वाले व्‍यक्ति का किराया यदि मकान मालिक छोड़ देगा तो वह भोजन कहॉं से करेगें। आनन-फानन में लिये लाकडाउन के फैसले ने सबको घबड़ा दिया, कुछ दिन तक तो लोग इंतजार किये मगर जब भूखो मरने की नौबत आई तो पैदल चल दिये। दूसरे लाक डाउन के बाद सरकार ने उनको जिस तरह अपने अपने घर भेजने की व्‍यवस्‍था की हकीकत के धरातल पर किसी से छुपी नहीं।
महाराष्‍ट्र और तमिल में केस बढ़ते गये, लोग संक्रमित होते गये और अपने घर भागते गये। कितने लोग रास्‍ते में मर गये। मदद कर अपने आपको महान बनने वाली भारतीय रेलवे गरीबो का खून चूस कर पैसे लिए। आज यदि देखा जाये थोड़ा पीछे जाकर तो संक्रमण मुख्‍य रूप से बम्‍मई, दक्षिण व तमिल से आये लोगो से गॉंव गॉंव पहुँचा है। लाक डाउन करने से पूर्व यदि घोषण कर दी गई होती कि जिसको जहॉं जाना है रजिस्‍ट्रेशन करा कर चला जाये नही तो लाकडाउन में फँस जायेगा, स्थित काफी नियंत्रण में होती।
होली का त्‍यौहार रखने के कारण अंधिकाश लोग अपने घर आये हुए थे। आनन फानन में लाकडाउन से जो कही दो दिन के लिए गया था वही फँस कर रह गया। जिसकी पीड़ा मैने सुनी है। अब जब स्थित बिगड़ गई, सरकार के हाथ से सब कुछ निकल गया तो सरकार मंदिर, राफेल और चाइना के नाम पर लोगो का ध्‍यान इस समस्‍या से निकालने की कोशिश कर रही है।
चीनी विवाद -: पहले कोरोना काल में बढ़ती समस्‍याओं के प्रति ध्‍यान हटाने के लिए चीन विवाद और युद्व को हवा दी गई। चीन आगे आया, चीन पीछे गया, करते करते हमारे 20 जवान बलिदान कर दिये गये। चीन एक ही रात में दो किलोमीटर आगे आकर बंकर नहीं बना लिया। ना चीन रातो रात वहॉं शैतानी कर रहा था। सारी सूचना शासन को थी। मगर हमारी सरकार को तो सेना को बलिदान करने की आदत पड़ गई है। सेना का बलिदान और भाजपा का चोली दामन का साथ है। चाहे वह किसी प्रदेश या देश के चुनाव में विजय हेतु अपने प्रचार प्रसार को तेज करना हो या किसी समस्‍या से जनमानस का ध्‍यान भटकाना हो वह सेना को बलिदान करने से नहीं चूकती।  बलिदान की आड़ में कोरोना की दुव्‍यवस्‍था को छिपाने का असफल प्रयास कर रही थी।
देश और राफेल -: अब जब चीन पुराना होने लगा लोग इससे हट कर प्रधान सेवक से प्रश्‍न करने लगे तो फिर देश को देश की सुरक्षा के साथ जोड़ा गया।मैं पूछना चाहता हूँ कि आज के पहले विमानो की या सैन्‍य उपकरणो की खरीद नहीं हुई? तो इस बार इतना हंगामा क्‍यों? जिस समय जैसी टेक्‍नोलाजी रही उसके हिसाब से हर समय उपकरणो की खरीद हुई। राफेल तो खरीदा हुआ सामान आ रहा है। कोई भारत में निर्मित तो हुआ नहीं मोदी काल में जो इतना शोर। जब राफेल की खरीद पर इतना हल्‍ला तो यदि मोदी काल मे राफेल भारत में बनता तो क्‍या होता? खरीद को जब सरकार इस प्रकार प्रमोट कर रही है तो बनाने के बाद तो वह आसमान में बैनर लगा देती। राफेल की तमाम खूबियॉं उस समय थी आप के समय भी हैं, ठीक है आपने कॉंग्रेस काल में राफेल का विरोध कर के राफेल ले जाये। मगर इतना बता दें सर जी कि अभी वर्तमान में राफेल ही जरूरी है या हम और हमारा जीवन यापन, और खरीदे हुए सामान पर इतना सीना चौड़ा क्‍यों? वह भी वर्तमान हालत में जब हर तरफ मौत व बेबसी का ताड़व है।
राम मंदिर दूसरी बात जब पूरा देश महामारी से परेशान हैं। चालीस हजार लोगो के घर में मौत का मातम पसरा है मोदी जी आज आपके चहेते अम्‍बानी परिवार की सम्‍प‍ति भले बढ़ती जा रही है, वह विश्‍व के प्रथम धनिक बनने की राह में अग्रसर है लेकिन बाकी के व्‍यपार चौपट हो चुके हैं। लोगो के भोजन के लाले पड़े हैं। जीवन बचाने की प्रक्रिया में लगे हैं ऐसे में आप अपने चोचलों से कितना भटकाएंगें।
प्रधान सेवक जी छोडीये अखंड गहमरी को अब तो आपके अंध भक्‍त भी आपके चोचलेे समझने लगे हैं,  लेकिन वह बेचारे करें तो क्‍या करें? कोई आपके दल से जुड़ा है तो किसी की भावनाएं आपके साथ जुड़ी हैं। वह भी भूखमरी एवं व्‍यवसायों के समाप्‍त होने का दंश झेल रहे हैं। हम तो अपनी बात लिख कर आप का विरोध करके अपने अंदर की आग को कुछ समाप्‍त कर लें रहे हैं मगर वह बेचारे तो सब जानते हुए परेशान रहते हुए भी आपके समर्थन में बोलने को मजबूर हैं। अगर अखंड गहमरी की बात का भरोसा नही हो तो इस पोस्‍ट पर आकर देख लीजिएगा इसके विरोध में आये वक्‍तव्‍य और फिर उनके घर और दिल में झॉंक कर देखीयेगा आपको हकीकत समझ में आ जायेगी।
इस लिए बंद करीये चोचलें और सबको साथ लेकर पूरी ईमानदारी से इस महामारी के खिलाफ मोर्चा खोलीये, चीन, पाकिस्‍तान,मंदिर, राफेल बाद में देखीयेगा। जय हिंद जय भारत

अखंड गहमरी

मंगलवार, 28 जुलाई 2020

वर मरे या कन्‍या मुझे चाहिए दक्षिणा , क्‍योंकि मैं गहमर इंटर कालेज का प्रबंधतंत्र हूँ जनाब ।

मैं एशिया महाद्वीप के सबसे बड़े गाँव में स्थित अखंड गहमरी का गहमर इन्टर कालेज हूँ। आज आपको बताता हूँ इस कोरोना काल में अपनी कुछ व्‍यथा। जो आपके इस अखंड गहमरी के गहमर इंटर कालेज के दिल में तीर की तरह चुभ रही है। आज मेरा यानि गहमर इंटर कालेज का प्रबंध तंत्र कहता है कि वर मरे या कन्‍या मुझे चाहिए दक्षिणा , क्‍योंकि मैं हूँ गहमर इंटर कालेज का प्रबंधतंत्र हूँ  जनाब। मैं इस काल में भी अपने भवन शुल्‍क जिसे आप बिल्डिग फीस के रूप में जानते हैं उसके के लालच को कम नहीं कर सकता  हूँ। अब आप ही बताईये मैं करूँ भी तो क्‍या?
भारतीय जनता पार्टी जिस तरह काँग्रेस की सरकार में पेट्रोल- डीजल और एलपीजी गैस को लेकर हंगामें करती और सत्ता में आने के बाद खुद गैस और पेट्रोल के दाम कारणों की विस्तृत व्याख्या कर के बढ़ाती है। उसी प्रकार  बिल्डिंग फीस, विकास और अनुशासन के नाम पर मेरी पूर्व  रघुराज सिंह ऊर्फ हेराम सिंह की प्रवंधन समिति को घेरने वाली मेरी वर्तमान कमेटी खुद उसी राह पर चल रही है।आज भी प्रतिछात्र 500 रूपये बिल्डिंग फीस जिसका नाम बदल दिया गया है लेती है। वो भी पूरे प्यार और नियम से। बकायदा नये समिति के अधिकारी- पदाधिकारी मौजूद रहते हैं ताकि एक भी बच्चा गलती से छूट न जाये।
अब आईये जानते है कि इस शुल्क के पीछे तर्क क्या है तो तर्क यह है कि शासन द्वारा गहमर इंटर कालेज में अध्यापकों की नियुक्तियां नहीं की जा रही हैं तो प्राइवेट अध्यापक रख कर पठन-पाठन का का काम कराते हैं, जिसके लिए हमें पैसे की जरूरत होती है, वह पैसा अनुदान के रूप में हम अभिवावकों से लेते हैं। ये बहुत अच्छी बात है सरकार की उपेक्षा के बाद भी प्रबंधनतंत्र अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है। बच्चों का भविष्य बचा रहा है।अब देखते हैं कितनी फीस ली जाती है और कितना व्यय होता है। तो इसके लिए पहले हम दो जानकारी मेरे यानि गहमर इंटर कालेज के प्रधानाचार्य से प्राप्त करते हैं।
पहली कुल छात्रो की संख्या वर्ष 2019-20 में, व दूसरी कुल ली हुई बिल्डिंग फीस 
तो गत वर्ष प्रधानाचार्य के हिसाब से लगभग 2100 बच्चे थे, जिनसे कुल शुल्क प्राप्त हुआ 2100x500=1050000
(दस लाख पचास हजार रूपये मात्र)
तो दस लाख पचास हजार की शुद्ध आमद हुई, अब आते हैं अध्यापकों की संख्या पर व उनको मिलने वाली राशि पर। तो मेरे यहॉं कुल प्राइवेट अध्यापकों की संख्या 8 है जिनको एक मजदूर की दैनिक मजदूरी 400 से 150 कम 250 रूपये प्रतिदिन मिलता है। कुल  60000 रूपये प्रतिमाह अध्यापकों की सेलरी पर खर्च होता है जो केवल 10 महीने दिया जाता है जो रकम साल में 6 लाख होती है। बाकि दो महीने ये अध्यापक  पूरे परिवार के साथ हिमालय की कंदराओं में चले जाते हैं जहाँ न उनको भूख लगती न प्यास न दैनिक आवश्यकता की चीजों की जरूरत पढ़ती है।
1050000 रूपये की धनराशि मेरे बच्‍चों के अभिवावकों से प्राप्‍त की गई जिसमें 6 लाख रूपये मेरे गैर शासकीय अध्‍यापकों को दिया गया। 1050000 में से 600000 घट गया तो बचा 450000। अब इस पैसे को लेकर मेरा प्रबंध तंत्र कहता है कि इस पैसे से मेरे भवनो को निर्माण, मेरे अन्‍दर होने वाले आयोजनो, शासन के आदेश पर जो व्‍यवस्‍था करनी होती है वह, सामानो की खरीद, लैबोट्ररी का खर्च इत्‍यादि हम इस पैसे से करते हैं। अब मेरे समझ में नहीं आता कि यह सारे खर्च तो पहले भी रहे होगें। खैर आगे की देखते हैं।
मैं एक बात पूछना चाहता हूँ कि प्रत्‍येक विद्यालय में प्रबंन्‍ध समिति इस लिए होता है कि वह विद्यालय के विकास हेतु कार्य करे। विकास हेतु शासन प्रशासन, राजनेताओं से मिल कर, स्‍थानीय स्‍तर पर प्रयास कर अपने विद्यालय के लिए धन की व्‍यवस्‍था करें। यदि सब कुछ विद्यालय को बच्‍चों के ऊपर शुल्‍क लगाकर ही व्‍यवस्‍था करनी हो तो क्‍या जरूर है प्रबंध समिति की उसके लिए तो विद्यालय का एक चपरासी ही प्रर्याप्‍त है, आप उसी को पैसा दे दे तो वही सारे काम करा देगा। प्रंबंध समिति के नाम पर विद्यालयों को उटापटक का अखाड़ा बनाने की क्‍या जरूरत है। मैं गहमर इंटर कालेज एक अर्ध शासकीय विद्यालय हूँ, जहॉं अध्‍यापको से लेकर कर्मचारीयों के वेतन तक की कोई जिम्‍मेदारी प्रंबंध तंत्र की नहीं हैं। कुछ तो पैसा शासन से जरूर आता होगा विद्यालय में खर्चो के नाम पर। मैं यहॉं आज विद्यालयों में बनने एम डी एम का जिक्र नहीं करूँगा। 
आज हमारे प्रवंन्‍धक महोदय जो समाज हित की बात करते हैं, ईमानदारी का प्रतिमान बने हुए हैं। जो विद्यालय के विकास में मिले पैसे को कमीशन मॉंगे जाने के कारण नहीं लाते हैं। उच्‍चन्‍यायालय के विद्यालय परिसर में व्‍यसायिक दुकाने नहीं रहेगी कि आदेश के पूर्व बनी 2 दो दर्जन दुकाने अपने सख्‍त नियमों के कारण बुक न करने वाले एवं तरह तरह के व्‍याख्‍यान देने एवं मानवीय संवेदनाओं का दंभ भरने ववाले प्रबंन्‍धक को इस वैश्‍विक महामारी कोरोना काल में बच्‍चों के अभिवावकों की दुश्‍वारियॉं दिखाई नहीं देती। वह इस बार भी उसी जोश के साथ गहमर इन्‍टर कालेज में उसी प्रकार विकास शुल्‍क यानि बिल्डिंग फीस ले रहे हैं जैसे आम दिन हो। उनको अपने मूल खर्च के हिसाब से इस शुल्‍क में कटौती करना दिखाई नहीं दे रहा है।
गहमर एक मध्‍यवर्गी किसानों एवं सैनिकों को गॉंव है। किसानों में ही किसी ने अपने दैनिक खर्चो की पूर्ति के लिए छोटी मोटी दुकानें खोल रखी हैं तो किसी ने अन्‍य संसाधन अपना रखें हैं जो इस कोरोना काल में पूरी तरह बंद हैं। जुलाई अगस्‍त का महीना किसानों के लिए खर्च का महीना होता है वह अपनी सारी जमाँ पूँजी किसानी में लगा देता है। ऐसी परिस्थित में मेरे  प्रधानाचार्य जी जो भवन शुल्‍क में अतिगरीबो को छूट का प्राविधान रखें हैं शासना आदेश पर वह कितना इस क्षेत्र को लाभ दे पायेगा इसके विषय में तो मैं खूब जानता हूँ यह ऊँट के मुहँ में जीरा से भी कम होगा। क्‍या नैतिकता की दुहाई देने वाले प्रबंन्‍धक महोदय को इस कोरोना काल में मानवीय संवेदनाओं के आधार पर तो कुछ कार्यवाही करनी ही चाहिए।

अखंड गहमरी


सोमवार, 27 जुलाई 2020

हिंदी साहित्‍य की नई लेखन विधा-गज़लोगीत, इतिहास में हीरे के अक्षरों से दर्ज हुआ अखंड गहमरी का नाम।

मैं अपने जीवन के 70 बसंत तो पार कर ही चुका हूँ। सारी उम्र गीत, गज़ल, छंद, दोहा, मुक्‍तक लिखने में बीत गई। कहानी, लेख भी खूब लिखा। परन्‍तु अपने शहर में क्‍या मुहल्‍लें में भी कोई नहीं जान पाया कि मैं कोैन हूँ। मंच की राजनीति में सेध लगाकर कुछ रूतवा तो कमाया मगर वो बात नहीं बनी जिससे मेरा नाम भी हिंदी के पुरोधाओं में शामिल हो सके। लोग हमारे भी भक्‍त बन सकें। हमारा नाम संगमरमर की चार दिवारी पर सुनहरे अच्‍छरों में खोदा जा सके। हिंदी गद्य व पद्य की जितनी प्रमाणिक विधाएं है सब पर तो इतना काम हो चुका हैं कि हम कितना भी काम करें हमारा नाम ऊपर तो आ ही नहीं सकता।  रोज-रोज इतने नये साहित्‍यकार आ रहे है कि पूछो मत। नित्‍य नये तकनीकी, नये-नये प्रयोग कर रहे हैं। किसी तरह जुगाड़ नाथ की कृपा से मैनें एक पुस्‍तक तो छपवा लिया है मगर वो भी ससुरी आधी तो सप्रेम भेेंट में ही चली गई। बाकी घर की जगह घेरे हैं यह उलहना रोज अपनी धनिया से सुनता हूँ।
सबके मुहँ से फेशबुक, वाटस्‍एप,टिविटर का नाम सुन रहा था। एक दिन मैनें सोचा क्‍यों न सोशलमीडिया से मैं भी जुड़ जाऊँ। पकी दाड़ी, पके बाल और चेहरे की झुर्रीयों का फायदा उठाऊँ। पटपटनियॉंगंज जाकर शानदार, जानदार वजनदार एक फोन खरीद लाया। अखंड गहमरी को खिला पिला कर उसे चलाना सीख गया। अपने कुछ पुराने मंचों के फोटो, कुछ रचनाएं पोस्‍ट कर दिया। क्‍या कमाल की चीज हैं यार ये सोशलमीडिया।
धडा-धड़ लोग जुड़ने लगे। मैं तो जितनी प्रसिद्वि 69 सालो में नहीं पाया। उम्र के पहले साल में इस क्षेत्र में काम नहीं किया। केवल केहा केहा कर के रोता था। उसके बाद तो बेसुरी आवाज में गाना गुरू ही कर दिया था, लिखना भले बाद में सीखा।रातो रात मेरा भाव बाजार बढ़ गया। अब मैं भारत ही नहीं विश्‍व का ख्‍याति प्राप्‍त, अन्‍तराष्‍ट्रीय, महाकवि बन गया हूँ। गीत गज़ल मुक्‍तक कहानी व्‍यंग्‍य सिखाता हूँ। मेरे भी भक्‍त बन गये हैं। भक्‍तों ने मुझे आचार्य, गुरूवर, गुरूदेव जैसे न जाने कितने उपाधियों से नवाजा है। अब कुछ नया करने को मन करता है, बहुत हो चुका काम। परन्‍तु अभी तक वो नहीं हुआ जिससे मेरा नाम रेत के महल पर पर संगमरमर के पत्‍थर पर लिखा जाये। यह सोच कर अपनी आत्‍मा को समझाता हूँ कि अभी पैर कब्र की तरफ बढ़ रहे हैं, लटके नहीं हैं। भक्‍तों ने कुछ किताबें तो छपवा दिया है लेकिन कब तक बासी प्रसाद खाते रहेगें ये भक्‍त। कही उनका दिमाग एकाग्र हो गया तो वह तकनीकी का सहारा लेकर बहुत आगे निकल जायेगें हमें छोड़ कर।यह बातें मुझे रात दिन परेशान करती हैं।

भगवान के घर में देर हैं अँधेर नही, एक दिन मैं अपनी वर्तमान पत्‍नी के साथ दातो का सेट नया लगवाने गया था। लौटते समय गलटनिया का होटल दिख गया। यादें ताजा हो गईं। सोचा तीनों की भॉंति इस नई दुल्‍‍हनियॉं को भी क्‍योंं न कैन्‍डल लाइट डिनर करा  दूँ, खुश हो जायेगी, मेरी भी यादें ताजा हो जायेगीं। सबसे कोने की एक खाली टेबुल देख कर बैठ गया, उस पर पड़ा मीनू ऐसे उठाया जैसे मोदी जी चाइना को भगाने के लिए बम उठाते हैं।
मीनू देख कर अपनी पसंद की खाना आर्डर ही करने वाला था कि एक मिक्स भेज दिखाई दिया। मैं सोचा कोई नई सब्जी आइ है। उसका भी आर्डर दे दिया और उसके आने का ऐसे इंतजार करने लगा जैसे मंडप में बैठा दुल्हन का  इंतजार कर रहा होता है। इंतजार की घड़ी समाप्त हुई, मेरा मिक्स वेज मेरे सामने था।
मैने मिक्स वेज देख कर वेटर को बुलाया और पूछा ये क्या है? मिक्स वेज कहाँ है? उसने कहा यही तो है मिक्स वेज, सभी सब्जीयों को मिक्स कर दिया हो गया नया डिस मिक्स वेज। अनायास ही मुहँ से निकला वाह! रे मिक्स भेज।
तभी मेरे दिमाग की बत्ती जली. मैं मुस्कुराया और जी भर खाया और खाते खाते सोचता रहा जब सब्जी मिक्स वेज हो सकती है तो काव्य मिक्‍स क्यों नही हो सकता।
अब मैं बनूगाँ नये विधा का जन्मदाता, और हर विधा को तोड़ मोड़ कर एक नई विदेशी विधा बनाऊँगा। अपने शिष्यों को सिखाऊँगा। हमारे मूल काव्यो से नई पीढ़ी का भटकाव होता है तो होता रहे। साहित्य का ब़टाधार होता है तो होता रहे। तभी मेरी बेगम जो तीन बेगमों के किचन में भुन जाने के बाद चौथी आई थी, शायद मेरे बार बार किचन और मिक्‍स वेज का नाम ले ले कर मुस्‍कुराने से डर पड़ी कि कही पुरानी घटनायें दुर्भाग्‍य बन कर उसके साथ ही तो नहीं आ रहा है, खैर वह चेहरे पर मुस्‍कान लिए बोली ।अरे जनाब हाथ तो धोईये..क्यों मुस्कुरा रहे हैं। मगर मैं तो अपनी धुन में था। मेरे सपनो में दो यह चल रहा था कि कैसे नये नये पद्वितीयों की परिभाषा बनाई जाये।
मेरे अनुभवों के आधार पर कई रूप आये कभी मैं शब्‍दों को घंटी के आकार में लिखने की विधा घंटोबजे पद्वति, तो धनुष के आकार का लिख कर धनुषोआकार पद्वति का गठन किया। कुछ बनी बनाई पद्वतियॉं भी मेरे काम आई। जैसे गीतोग़जल विधा,गीतोदोहा विधा, दोहा दोहा विधा, गज़ल के शब्‍द बदल कर हिंदी गज़ल, अंग्रेजी गज़ल, ऊदूँ गजल, गीतिकागज़ल, तो कभी ताजमहल विधा तो कभी दिव्‍याभारती विधा। धीरे धीरे अपने ख्‍यालो में खोया मैं चलता रहा मेरी बीबी के चेहरे पर हवाईयॉं उड़ती रही।
मैं घर आया चादर तान के सो गया। सुबह नेट गायब मैं टहलता रहा। शाम बीत गई, रात आ गई। तभी नेट आया।
मैं दौड़ कर आनलाइन आया। हजारो  भक्‍तों को मेरे गायब होने की चिंता थी। मैं ने भी गर्म तवे पर रोटी सेंका, भक्‍तों को बताया कि मैं नई विधाएं खोज रहा था सालो से रिर्सज कर रहा था। पूरा हुआ। भक्‍तों को खूब समझाया, वाह वाह हुई सभी ने इस नई विधा को पंसद किया। समझाते समझाते मुझे नींद आ गई मैं सो गया।
सुबह दिमाग काफी हल्‍का था,मैं गाडफादर की राह पर चल पड़ा था। नास्‍ता इत्‍यादि खाकर जब कम्‍प्‍यूटर खोला तो मन प्रसन्‍न हो गया मेरे भक्‍तों ने मेरी विधाओं पर अलग अलग समूह बना कर उसका प्रचार प्रसार शुरू कर दिया।
किसी ने मुझे आचार्य तो किसी शास्‍त्री ताे किसी साक्षत शिव की संज्ञा दे रखी थी। जो काम जीवन भर नहीं कर सका मैं वह सोशलमीडिया जी ने चंद महीनो में करके दिखा दिया। अब मेरा भी नाम बुर्गखलीफा के सबसे ऊपर हीरे के पत्‍थर पर लिखा जायेगा।
जय हिंद जय भारत
अखंड गहमरी












शनिवार, 25 जुलाई 2020

आईये मनाते हैं इस बार मिल कर ईकोफ्रैन्‍डली ईद-उल-जुहा यानी बकराईद ताकि हम रहें स्‍वस्‍थ देश रहे मस्‍त

कुछ ही दिनों के बाद हमारे देश में आपसी भाईचारे का एक प्रमुख त्‍यौहार ईद-उल-जुहा यानी बकराईद आ रहा है जिसे हम बकरीद के नाम से भी ही अधिकाशं जानते हैं। बकरीद हजरत इब्राहिम की कुर्बानी की याद में  मनाया जाता है. हजरत इब्राहिम अल्लाह के हुकुम पर अपनी वफादारी दिखाने के लिए बेटे इस्माइल की कुर्बानी देने को तैयार हुए थे। उन्‍हीें के राह पर चलते हुए अब किसी जानवर की कुर्बानी प्रतिकात्‍मक पुत्र बना कर अल्‍लाह को दी जाती है।
यदि देखा जाये तो बकरीद के जहॉं कई फायदे हैं जिसमें प्रमुख रूप से आपसी मेल मिलाप होता है, हिंदु मुस्‍लामन का भेद-भाव खत्म कर आपस में मेल जोल कर एक साथ सबको बुलाया जाता है और बैठ कर खाया जाता है। गरीबों के घर भी कुर्बानी के नाम पर आदान प्रदान हुए मॉंस से कुछ अच्‍छा भोजन बन जाता है, वही इस कुर्बानी से पर्यावरण को कुछ नुकसान भी पहुँचता है।  जैसे 
क़ुर्बानी के बाद लाखों लीटर पानी सफ़ाई में बर्बाद हो जाता है। मीट के अलावा जानवर का बाक़ी शरीर का हिस्‍सा जो नहीं खाया जाता है गंदगी के रूप में चारो ओर फैलता है, जिससे बिमारी का खतरा बढ़ जाता है। खाने के बाद हड्डीयॉं इधर उधर फेंकने से जानवर उन्‍हें उठा ले जाते हैं और किसी के घर किसी के दरवाजे पर छोड़ देते हैं। जिससे गंदगी भी बढ़ती है और बिमारी का खतरा। सफाई के नाम पर जो लाखो लीटर पानी बहता है वह आपके आस-पास ही जमा होता, जो सड़गल  कर डेगु,मलेरिया जैसे घातक मच्‍छरों को जन्‍म देकर जीवन पर खतरा बढा देता है। ऐसे में जिस प्रकार वायु प्रदूषण के कारण दिपावली पर पटाखों का, जल प्रदूषण और पानी की बर्बादी रोकने हेतु होली में पानी व केमिकल के रंगों का कम प्रयोग होना शुरू हुआ, दुर्गापूजा में बनी प्रतिमाओं का गंगा में विर्सजन रोक कर ईको फ्रेन्‍डली मूर्तियों का निर्माण हुआ जो कि प्रदूषण का कारण बन जाता था। सावन में दूध की बर्बादी बचाने के लिए रूद्वाभिषेक का चलन कम हुआ उसी तरह हम पर्यावरण और स्‍वास्‍थ को बचाने के लिए आईये इस बार मनाते हैं ईकोफ्रैन्‍डली ईद-उल-जुहा यानी बकराईद। इस लिये सभी लोग आगे बड़े आकार के मिट्टी के बकरे की क़ुर्बानी दें। जिससे बाद में मिट्टी, मिट्टी में मिल जाये, परम्‍परा भी पूरी हो जाये और हमारे पर्यावरण का भी नुकसान न हो।
तो आईये हम सब एक होकर भारत के पर्यावरण की रक्षा और बिमारीयों से बचाव के लिए ईकोफ्रैन्‍डली ईद-उल-जुहा यानी बकराईद मनाये और  मिट्टी का बकरा क़ुर्बान करें। हम आपस में हिंदु मुस्‍लिम मिल कर गंगा यमुनवी तहजीव को बरकार रखें और ईकोफ्रैन्‍डली  त्‍यौहारों की मान्‍यता पर बल देकर उसे अपनी परम्‍पराओं में सामिल करें। जिससे हम भी स्‍वस्‍थ रहें हमारे आने वाली पीढ़ी भी स्‍वस्‍थ रहें, देश भी स्‍वस्‍थ रहे।   



शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

देखें कैसे अपनी के आगे शेर बन पत्रकार को पत्रकारिता सिखाते हैं गहमर कोतवाली के ड्राइवर अंजनी

साहब कितने भी बड़े साहब क्‍यों न हों पंच तत्‍व से बने इस शरीर में जो उनकी आत्‍मा है वह 5 मानवों से बहुत घबड़ाती है। सब पर रोब जमाने वाले बड़े साहब इस बात से हमेशा चिंता में रहते हैं कि ये 5 मानव उनकी कश्‍ती को न जाने कब सागर में डूबा दें पता ही नहीं चलेगा। ये 5 मानव उनके कर्म की आत्‍मा निकाल कर उनके कर्तव्‍यपरायण को खतरे में डाल सकते हैं, यही नहीं वह साहब की आत्‍मा को कब परमात्‍मा से मुलाकात करा दें बड़े से बड़े साहब भी नहीं जानते हैं। बड़े साहब की साहबगिरी इन 5 पर नहीं चलती और यदा कदा चल भी जाये तो वैसे ही चलती है जैसे कक्षा में अध्‍यापक के कहने पर एक सहेली दूसरे सहेली के गाल पर चपत लगाती है। प्‍यार से कि सॉंप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे। बड़े साहब की इस डर का पूरा फायदा ये उठाते हैं। जहॉं बड़े साहब नहीं पहुँचते वहॉं ये पहुँच कर बड़े साहब का प्रतिनिधित्‍व करते हुए उनके धन बल का पूरा कराते है। अब आप तभी से यह सोच रहे होगें कि मैं आपको इतना क्‍यों पका रहा हूँ तो खुदा कि कसम अब नही पकाऊँगा और बताता हूँ कि बड़े साहब के सर पर सवार कौन हैं ये पॉंच। वैसे एक बात तो पक्‍का है कि पॉंच में तो एक से आप भी डरते होगें बड़े साहब और मेरी तरह आपकी भी हालत खराब रहती होगी, बिल्‍कुल सही वह पहला प्राणी हैं पत्‍नी देवी। मेरे ख्‍याल से पत्‍नी नाम ही काफी विस्‍तार में जाने की जरूर नहीं। बाकी 4 हैं बड़े साहब के मुशीं, रसोईया, वकील और बड़े साहब का वाहन चालक। जिसके हाथों में अगल अलग तरीके से बडे़ साहब की गर्दन रहती है। कोई हाथो में कलम लिए तो कोई काला कोट पहने तो कोई चुल्‍हे की आग लिये तो कोई स्‍टेरिंग लिए। 
तो ऐसे ही एक बड़े साहब के बड़े साहब हैं गहमर थाने में तैनात कोतवाल साहब के वाहन चालक श्री अंजनी राय जी, जो एक स्‍थानीय पत्रकार को अब यह सिखा रहे हैं कि उन्‍हें कलम कैसे चलानी है और उनको किसके साथ रहना हैं।
जी हॉं गहमर थाने में तैनात सिपाही  अंजनी राय वाहन चालक के रूप में कार्यरत हैं। उनको एक पत्रकार के खबर पर इस कदर परेशानी थी कि उन्‍होनें उनके साथ रहने वाले राष्‍ट्रीय सहारा के पत्रकार सत्‍या उपाध्‍याय को सलाह दी कि वह अपने साथी पत्रकार का साथ छोड़ दें उनके साथ न रहें। कारण यह कि सत्‍या उपाध्‍याय के साथी पत्रकार ने महज एक खबर यह प्रकाशित कर दी जिसमें लिखा था कि अंजनी चला रहे हैं थाना।
अब अंजनी महाराज ने फोन करके सत्‍या उपाध्‍याय को पहले तो समझाया कि वह साथी पत्रकार का साथ छोड़ दे और बात करते करते उन्‍होेंने अपनी पत्‍नी को कान्‍फ्रेंस पर लेकर सत्‍या उपाध्‍याय को भड़काने के लिए गेयर लगाना शुरू किया, वह गेयर बदलते रहे, कभी बात को संभालने के लिए ब्रेक भी लगाते तो कभी टाप गेयर में फुल एक्‍सलेटर के साथ आते। परन्‍तु शायद राय साहब यह भूल गये कि उनका पाला एक ब्राहम्‍ण से पड़ गया है। जो उनके तेज स्‍पीड वाहन चालन से फँसेगा नहीं। राय साहब की पत्‍नी को भी न्‍यायालय में अपने जुबान को खोलने का कोई मौका पंडित जी महाराज ने नहीं दिया।
गहमर थाने में मौजूद यह वाहन चालन के पूरा प्रयास किया कि पंडित जी महाराज परशुराम के रूप में आ जाये मगर पंडित जी महाराज भी आज मुशीं के रूप में आ चुके थे। अपनी भड़क को दबाते रहे, मगर वाहन चालक महोदय कभी अपनी दो सालो में कप्‍तान साहब द्वारा दिये गये प्रशस्ति पत्र का जिक्र करते, तो कभी अपनी ईमानदारी का जिक्र करते, तो कभी पत्रकार महोदय को सही और पुष्‍ट खबर लिखना सिखाते, और घूम फिर कर फिर वहीं आ जाते साथ छोड़ दो। एक बार तो उन्‍होनें यहॉं तक कह दिया कि साथ छोड़ दो अच्‍छा होगा। और पत्रकार महोदय केवल यह पूछते रहे कि जब खबर दूसरे ने लिखी है तो सिपाही जी आपने मुझे फोन क्‍यों किया? यही खबर पर एतराज है या खबर गलत है तो न्‍यायालय जाईये, मानहानी का मुकदमा करीये। परन्‍तु सिपाही जी की वही डफली वही राग कि साथ छोड़ दो, सही पत्रकारिता करों।
अब मेरी तरह आपको भी समझ में नहीं आ रहा होगा कि अपने ऊपर के अधिकारीयों को छोड़ कर अपनी पत्‍नी को कान्‍फ्रेस पर लेन का क्‍या कारण था। वह अपनी गृहमंत्री के सामने कही यह साबित तो नहीं करना चाह रहे थे कि देखो जिसे तुम चुहा समझती हो वह कितना बलवान है।
अंजनी राय ने जिस प्रकार सत्‍या उपाध्‍याय को अपनी पत्‍नी को कान्‍फ्रेंस पर लेकर फोन किया और जिस प्रकार उन्‍होंने कभी प्‍यार तो कभी धमकी का प्रयोग किया और बार बार काल रिकाडिंग करने का जिक्र किया उससे साफ होता है कि या तो अंजनी राय के सर पर कोई भारी भरक हाथ हैं जिसके इशारे पर उन्‍होनें यह काम किया है, और वह ह‍ाथ भी ऐसा वैसा नहीं पूरी तरह से जानकार हाथ और बहुत कुछ सोच कर चलने वाला और या तो अंजनी राय बिल्‍कुल निरंकुश हो गये हैं। जिन्‍हें न अपने उच्‍चधिकारीयों का डर है, न अपने पद की हकीकत का पता न अपने कर्तव्‍यों का पता।
यदि उनको किसी भी खब़र पर एतराज था तो वह इसकी सूचना अपने अधिकारीयों को देते, जिस पत्रकार ने खबर लिखी है उससे बात करते, और यदि सत्‍या से ही बात करनी थी तो वह उनसे कहते कि साथी पत्रकार से बात करीये, जो समस्‍या है उसे दूर किया जाये, परन्‍तु उन्‍होंने ने सीधे अपनी पत्‍नी को हाट लाइन पर लेकर केवल साथ छोड़ने और प‍त्रकारिता सीखने की बात की।
अब देखना होगा कि विभागीय अधिकारी दो बार के प्रशस्ति पत्र प्राप्‍त अपने इस मुलाजिम पर कौन सी कार्यवाही करते हैं, या उसे इस प्रकार की घटना आगे भी करने के लिए खुला छोड़ देते हैं। हो भी सकता है सवाल ड्राइवर का है जिसके हाथो में न सिर्फ साहब की जिन्‍दगी है बल्कि उनके कई राज भी दफ़न होगें इस ड्राइवर के सीने में।
वैसे एक बात तो तय है कि गहमर में लोकतंत्र के चारो खंभे एक दूसरे से बंँधे हुए नहीं हैं। वह अपनी अपनी डफली अपनी अपने राग गा रहे हैं, जिससे आम जनता के सपनो की इमारत खतरे में हैं।
जो भी हो इस प्रकार कि घटना 1906 में बने गहमर थाने एवं 2019 में कोतवाली हुए गहमर कोतवाली के इतिहास में पहली घटना है, जिसकी जॉंच होनी चाहिए, और जो दोषी हो उस पर न्‍याेचित कार्यवाही हो।
साथ ही पुलिस विभाग अपने इस ड्राइवर को ही नहीं अपने विभाग के हर सिपाही को यह आदेश दें कि वह अपनी बात उच्‍चधिकारीयों को बताये, खुद पत्‍नी यानि अपनी गृहमंत्री को कान्‍फ्रेस पर लेकर इस प्रकार की हरकत न करें।उसकी पत्‍नी उसकी गृहमंत्री हैं संसार की नहीं। उस विभागीय मामले में कुछ नहीं कर सकती।


अखंड गहमरी





बुधवार, 22 जुलाई 2020

मोती कम पत्‍थर ही अधिक है यूटियूब ज्ञान सागर मे

घर बैठें लाखों कमाए, ये जानीयें, वो जानीयें, घरती पर खतरा, यूटियूब चैनल कैसे करें monetization जैसे तमाम लुभावने देकर अपनी तरफ आकर्षित करने वाले यूटियूब पर ज्ञान के देवता आये दिन हजारों की संख्‍या में ज्ञान बाँटते दिखाई देते हैं। वीडियों की शुरूआत हुई नहीं कि आधा समय तो वह अपनी महिमा गाते और चैनल को सस्‍क्राइव करने की बात कहते हुए वीडियो को पूरा देखने की बात कहते नज़र आते है। यहॉं तक तो सब ठीक है। परन्‍तु जब यह ज्ञान के देवता अपनी जानकारीयों की घुट्टी हमें पिला कर चले जाते हैं और हम उसका हकीकत के धरालत पर प्रयोग करते हैं तो खोदा पहाड़ निकली चुहिया की बात प्रमाणित हो जाती है। 
वर्तमान समय में यूटियूब चैनल का रूप पूरा बदल चुका है। विगत 10-12 सालो में यूटियूब पर दर्शकों की संख्‍या भले नहीं उतनी बढ़ी है मगर यूटियूबर की संख्‍या में बेतहासा इजाफा हुआ है। पैसे और प्रतिष्‍ठा के सपने संजोये यूटियूब की तरफ आते हैं और अपने चैनल को बना कर उस पर वीडियों डालना शुरू करते हैं। हमें ज्ञान का खुद पता नहीं लेकिन हम ज्ञान देने लगते है। अपने अनुभवों को इस कदर शेयर करने लगते हैं जैसे भगवान राम ने लंका युद्व के अनुभव को शेयर किया हो। आपकी मदद का वीडियों जब आप देखना शुरू करते हैं तो आपको लगेगा कि भवसागर आप पार कर लेगें, परन्‍तु वीडियों की समाप्‍ती तक वही सब टायटाय फिस हो जाता है।
मैं आपको अपने दो अनुभव शेयर करता हूँ।
मैं यूटियूब का प्रयोग वीडियों इत्‍यादि डालने के लिए लगभग 2009 से कर रहा था। गहमर गॉंव पर आधारित कुछ वीडियो बनाता और डालता। आपको पता ही है कि गॉंव तक पहुँचते पहुँचते विकास बूढ़ा हो जाता है। सस्‍क्राइबर, monetization जैसे शब्‍द तो मुझे पता ही नहींं। इस की जानकारी तो तब हुई जब वर्ष 2015 में एक गोपाल राम गहमरी साहित्‍यकार सम्‍मेलन के चक्‍कर में दिल्‍ली गया और अपने मौसी के लड़के देवेन्‍द्र ऊर्फ बमबम के पास ठहरा था। रात में हम और उसके कुछ दोस्‍त साथ बैठे थे। हँसी मज़ाक का दौर चल रहा था। इसी बीच उसने मेरे मोबाइल में उसने यूटियूब खोल दिया मेरे एक वीडियो पर उसने काफी संख्‍या में व्‍ययू देखा तो उसके नकहा कि आपको इससे पैसे नहीं मिलते हैं। मैने कहा नहीं। तो उसने न जाने क्‍या क्‍या सेटिंग की और कहा कि आप चैनल तो monetizationहै। आपको तो पैसे मिलने चाहिए। 
उसने जो किया नहीं किया मैं नहीं जानता। वर्ष 2019 अगस्‍त में कुछ सीखते समय वह monetization एकाउन्‍ट डीलिट हो गया। मैं एक महीने तक यूटियूब पर उसे वापस लाने का वीडियो देखता रहा था, मगर नतीजा कुछ नहीं निकला आज भी वह वापस नहीं आया।
दूसरी बात वर्ष 2020 में जब लाकडाउन हुआ तो मेरा कम्‍प्‍यूटर खराब हो गया। मोबाइल पर काम होता रहा मैं यूटियूब चैनल में तरह तरह के वीडियों देखने लगा। खास तौर से मैने घर बैठे आनलाइन पैसे कमाने का वीडियों, कार्टून बनाने के वीडियों, यूटियूब चैनल को ग्रो करने के वीडियों जैसे कई श्रेणी के वीडियो देखें। हर वीडियों शुरू में तो हमारे उद्वेश्‍यों की पूर्ति करते दिखाई दिये। वीडियों सब कुछ आसान और मुफ्त बताया जाता है, लेकिन जब मैं उस वीडियों के आधार पर हकीकत के धरातल पर आता तो सब जगह या तो पैसे मॉंगे जाते या तो वह किसी के काम के नहीं निकलते। ऐसा नहीं कि मैंने घासपात वीडियों देखें मैने ऐसे ऐसे यूटिूयबर के वीडियों देखें जितने सस्‍क्राइवर लाखो में हैं। कोई फायदा नहीं आया। मैं ये नहीं कहता हूँ कि सब गलत है, मगर इतना जरूर है कि यूटियूब पर जो ज्ञान के भंडार का सागर है उसमें मोती बहुत कम पत्‍थर ही आपको अधिक मिलेगें, इस लिए आप अपने ज्ञान के विस्‍तार में आपसी सहयोग और अपने विवेक से जानकारों को खोज कर हकीकत के धरातल पर ज्ञान प्राप्‍त करें, यूटियूब के चक्‍कर में न आये, यह सिर्फ आपको  समय के साथ साथ पैसे की बर्बादी छोड़ कर कुछ नहीं देगा।





















मत खोदो पहाड़ निकलेगी चुहिया।

जी हॉं यदि न यकीन हो तो यूटियूब पर '' घर बैठे कैसे कमाये पैसें'', यूटियूब चैनल कैसे करें monetization

शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

कोरोना से भी अधिक खतरनाक है ये वायरस, रूलायेगा आपको खून के ऑंसू।

भारत ही नहीं विश्व को परेशान करने वाले कोरोना की दवा तो नहीं बनी है, लेकिन कोरोना के बाद जिस वायरस ने आम आदमी को सबसे अधिक परेशान किया है उस वायरस की दवा होने के बाद भी इस वायरस का ईलाज नहीं हो पा रहा है। इस वायरस का ईलाज करने वाले डाक्टर ही इस वायरस को पनपने में पूरी मदद कर रहे हैं।  कोरोना वायरस तो केवल आदमी के तन को खा कर रहा है लेकिन यह वायरस तो आम आदमी के तन मन धन को खाते हुए उसका भविष्य पूरी तरह बर्बाद कर रहा है। इस वायरस की भूख इतनी अधिक है कि वह जिन्दगी को जीते जी पूरी तरह खा जा रहा है। सब कुछ खाने के बाद भी इस वायरस की भूख और दरिद्रता मिटने का नाम नहीं ले रही है। नित्य नये नये चोचले निकाल कर वह इस प्रकार दोहन कर रहे हैं कि उसके आगे भष्मारसुर व कोरोना भी शर्म के आगे चूल्लू भर पानी में डूब कर मर जाये। कोरोना से भी अधिक खतरनाक इस वायरस का नाम है नीजी स्कू‍ल व उसके संचालक।
                            दुनिया का हर प्राणी जानता है कि पूरा विश्व वर्ष 2020 के प्रारंम्भ से ही  जीवन को बचाते हुए दो वक्त की रोटी व सर की छत के लिए किस तरह संघर्ष कर रहा है किस तरह उसे बचा रहा है। यह दर्द तो वही बता सकता है जो इससे जूझ रहा है। इन सब से बेपरवाह कोरोना से भी खतरनाक राक्षस रूपी नीजी स्कूल संचालक उसे मौत के मुहँ में ढ़केले जा रहे है और वह केवल किस इस लिए बर्दाश्त करने को बाध्या है क्यों कि डर उसके बच्चों  के भविष्य का दिखाया जा रहा है। बच्चों के भविष्य रूपी तलावार से डरा किस प्रकार नीजी स्कूह इस काल में भी मनचाही वसूली कर रहें उसे रोकने का साहस मुझे लगता है किसी में नहीं। शासन प्रशासन भी नीजी स्कूलों के इस धिनौने कृत्य में पूरी तरह उसका साथ निभा रही है।
                                 कितना भी बड़ा व्यापारी क्यों न हो, चाहे वह भारत का सबसे अमीर घराना क्यों न हो वह गॉंव में विकास के निचले पावदान पर खड़े व्यक्ति के खरीदारी क्षमता जिसे अंग्रेजी में आप सब परचेंजिग पावर कहते हैं उसी पर निर्भर है। बाजार का मुख्य हिस्सा छोटी दुकान, ठेले, गुमटी जो बड़े से बड़े निर्माता के घर की रोटी चलाती हैं, महीनो महीनें से बंद पड़ी हैं। बड़ी कम्‍पनीयों के मालिक अपने अथाह धन होने के बाद भी अपने सेवको को दो वक्‍त की रोटी नहीं दे पाये। मालिकों ने अपने अकड़ के कारण, अपने छड़‍िक लाभ के कारण अपने मजदूरों को संभालना जरूरी नहीं। मजदूर भूखें नंगे पैदल चलते बेसहारा लाचार घर लौट गये। इसका नतीजा यह हुआ कि आज निर्माताओं के पास सब कुछ होते हुए भी मानव बल नहीं । जिससे वह उत्पादन करें।   
                             हर आदमी अपनी आमदनी ही नहीं गँवा चुका है बल्कि अपनी जमा पूँजी का बड़ा हिस्सा  निकाल कर अपने पेट की ज्वाला को शांत कर रहा है। आ‍खिर वह करें भी तो क्या  करें? कहॉं जाये? किससे कहें ? क्या कहें? सुनेगा कौन? बंद वातानुकुलित कमरे में बैठे अफसरशाहों का गुलाम हो चुके भारत के नेताओं के पास न तो अपनी सोच है न क्षमता, न तो उनकी यादाश्त ही इतनी तेज है जो वह जमीन की हकीकत को याद रख सकें। इस लिए वह जनता के दर्द निवारक दवा बन नहीं सकते। जब हर तरफ आर्थिक मंदी और बंदी दोनो है ऐसे में कहॉं से आयेगें इतने पैसे जो नीजी स्कूल नाम वायरस का ईलाज कर सके ? कुछ स्कूल कह रहे है जब आपकी हैसियत नहीं थी तो क्योंं बड़े स्कूल में डाला? भैया मैं 500 रूपया दैनिक कमाता था। आप के स्कूल की फीस 3000 रूपये थी और खर्च लेकर 5000 रूपये महीन, हम नमक रोटी से गुजारा कर के बच्चे को पढ़ा रहे हैं। आमदनी बचा कर आपको तो आपको फीस दे रहे थे परन्‍तु आज जब हम 1 रूपया महीना नहीं कमा रहे हैं तब भी आपको हम पैसे देने को तैयार है मगर आप कुछ तो छोड़ीये।
                           आज प्राइवेट स्कूल केवल दिखावे के नाम, फीस व अन्य  वसूली कायम रखने हेतु आनलाइन क्लासों का चोचला शुरू किये हैं। मैं पूछना चाहता हूँ कि भारत में कितने ऐसे परिवार होगें खास तौर से ग्रामीण व छोटे नगरी क्षेत्र में जो अपने आवश्यकता से अधिक मोबाइल फोन रखे होगें, यदि उनके घर में तीन बच्चें है तो भी एक मोबाइल खरीदना ही पड़ेगा और और तो किताबों की जरूरत भी बता कर सारी-सारी की किताबें खरीदवाई जा रही हैं। मैं दावे और जिम्मेदारी के साथ कहता हूँ कि जिस प्रकार की एनसीआरटी की किताबें बाजार में कम कीमत में उपलब्ध  हैं  उससे 90 प्रतिशत गिरे स्तर की किताबें प्राइवेट प्रकाशक  से मोटा कमीशन लेकर  नीजी स्कूल रूपी वायरस मँहगे दामो उसे बेच रहे हैं और बच्‍चों को इस समय भी उसे खरीदने पर बाध्य  कर रहे हैं। यही नहीं हर साल वह किताबों को बदलने की परम्‍परा इस साल भी शुरू रखें हैं।  बदलाव भी क्या प्रकाशन वही, उसकी सिरीज बदल दी जाती है जिससे एक ही परिवार का लड़का जो एक क्लास आगे पीछे है किताबो का प्रयोग न कर पाये और इन वायरसो का पेट और भरें।कुछ स्कूल संचालक बच्चों  को लैपटाप लेने की सलाह दे रहे हैं आज के बाजार भाव में बाजार में कम से कम लैपटाप की कीमत 15000 हजार रूपये, उसके साथ माडम ऐसोसिरिज मिला कर 18-19 हजार रूपये आप बताईये कहॉं से खर्च कर पायेगा इतने रूपये। आनलाइन क्लास के नाम पर मोबाइल की खरीद या मोबाइल देने की बात हो रही है मैं जानना चाहता हूँ कि आज हर आदमी कहॉं से मोबाइल लायेगा।
                    मैं दावे और जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूँ कि जिस प्रकार प्राइमरी और जूनियर हाई स्कूल के स्तर के बच्चों  का आनलाइन क्लास चल रहा है, जिस प्रकार नज़रे मोबाइल पर टिकाना पड़ रहा है, नेटवर्क और तमाम दिक्कहतें हो रही हैं बच्चें  कुछ दिन में पागल और शरीरिक रूप से बेजान व भूख न लगने अनिद्रा के शिकार न हो गये तो आप भी कहीयेगा। अधिक दिन नहीं यह समस्‍या इन आनलाइन क्‍लासो का परिणाम आपके सामने महीने के दिन के अंदर आने लगेगा। न यकीन हो तो अपने किसी अच्छे  बाल रोग विशेषज्ञ से पूछ कर देंख लें। आज जिस आनलाइन क्लास से बच्चे  के पढ़ने को अपने रूतबे से जोड़ रहे हैं भगवान न करें  खून के ऑंसू रोना पड़े।   ये नीजी स्कूल नामक वायरसो ने आम आदमीयों को इस कदर मजबूर कर दिया है कि वह न जी पा रहा है न मर पा रहा है और हमारी सरकार आम आदमी के परेशानी पर मजा ले रही है। ले भी क्यों न हमारी सरकार में बैठे लोगो की खुद या तो कई नीजी स्कूल है या तो उनके चहेतो के नीजी स्कूल हैं ऐसे में कोई अपने पैर पर कुल्हाड़ी कैसे मारेगें? यह तो साफ है। 
                    मानता हूँ कि नीजी स्कूल के भी कुछ ऐसे खर्च है जो किसी काल में बंद नहीं हो सकते हैं, जैसे अध्यापको व कर्मचारीयों का वेतन, प्रधानाचार्य/प्रचार्य/प्रधानाध्या पक का वेतन और उसके बाद स्कूल प्रंबधक का बड़ा पेट इस लिए उन खर्चो के लिए स्कूल की फीस जरूरी है मगर वह भी इस काल में उतनी ही  होनी चाहिए जितने में स्कूल के खर्च निकल जाये अध्यापको व कर्मचारीयों के भूखमरी के हालत न आवें। पर ऐसा नहीं है स्कूल की चारदिवारों की संख्या  बढ़ा कर अपना कद बढ़ाने की भूख, किताबों में कमीशन की भूख, इतनी अधिक है कि उन्हें मानवीय संवेदनाएं दिखाई ही नहीं पड़ती।

                   मेरा मानना है कि जान है तो जहान है। इस संकट के कम होने के बाद कोर्स को कम करके, सेशन देर से शुरू किया जा सकता है। एक्ट्रा  क्लास चलाये जा सकते हैं। महत्वपूर्ण चीजो को बता करे के परीक्षा कराई जा सकती है। वर्तमान में स्कूल अपने देय वेतन के हिसाब से फीस रखें, प्रवेश शुल्क, बिल्डिंग शुल्क, विकास शुल्क और अन्य शुल्कों  के नाम पर होने वाले लूट को कम से कम इस काल में बंद कर दें। जिससे आम आदमी भी जीवन जी सकें। कही ऐसा न हो कि आम आदमी नीजी स्कूलों के इस वायरस के हाथों इस कदर परेशान हो जाये कि या तो वह हाथ में हथियार उठा लें या अपनी ही जीवन लीला समाप्त कर लें।

अखंड गहमरी 

शनिवार, 11 जुलाई 2020

पत्रकार बस पैसे के

हम गहमर व बारा के कुछ पत्रकार कुछ दिनों से मूलभूत समस्याएं जिसका आम आदमी के जीवन पर सीधा बुरा प्रभाव पड़ रहा है जिला/ग्राम व प्रशासन के ऊपर दबाब बनाने को छोड़ कर गौ तस्करी, शराब तस्करी के, ओवर लोड़िग जैसे मुद्दो पर पुलिस खिलाफ मोर्चा खोले हुए। जिसका जनमानस के जीवन पर तो कोई प्रभाव नही है, परन्तु हमारी जेब पर प्रभाव जरूर है। आखिर जेबें तो हमारे पास भी हैं। पेट तो हमारे पास भी है?
हमें दिखाई ही नहीं दे रहा है कि हमारा क्षेत्र कितनी विषम परिस्थितियों से गुजर रहा है। मुख्य मार्ग से पकड़ीतर जाने वाले रास्ते पर जीवन नर्क से बत्तर हो गया है, पैदल चलना मुश्किल है वह हम पत्रकारों को दिखाई नहीं ले रहा है। गहमर के बाजारो, बैंको में सोशलडिक्टेनसिंग/ मास्क की खुले आम धज्जियां उड़ाई जा रही है वह हम पत्रकारों को दिखाई नहीं दे रहा है। गहमर रेलवे स्टेशन रोड को खोद कर छोड़ दिया गया है वह दिखाई नहीं दे रहा है। स्टेशन रोड पर जल-जमाव में बिजली के जर्जर तार रोज टूट रहा है वह हम पत्रकारों को दिखाई नहीं दे रहा, हम तो हादसे का इंतजार कर रहे हैं। पूरा गाँव गंदगी के आलम में त्राही-त्राही कर रहा है बिमारीयों का खतरा फैला हुआ है वह हमें दिखाई नहीं दे रहा है। आज कल हमारे चश्में में पुलिस ही पुलिस है।
और दिखाई दे रहा है भाजपा विधायक और जिला पंचायत के बीच शीत युद्ध, जिसे हम भुनाने में लगे हैं।
हमारे लिए जन समस्या और आम आदमी तो बिल्कुल दूध में गिरी मक्खी के समान है। आम आदमी की सुन कर करेगें भी क्या? पुलिस के खिलाफ मोर्चा खोलेगें तो देवल बारा बार्डर से शराब व गौ तस्करी और बालू ओवरलोडिंग में हम हिस्सा पायेगें। विधायक-जिला पंचायत के शीत युद्ध में पड़ेगे तो कुछ इधर से कुछ उधर से पायेगें। आने वाले पंचायत चुनाव के भावी प्रत्याशियों के साथ चलेगें उनकी बात सुननेगें तो भविष्य सुनहरा होगा। आम आदमी मरता है तो मरे अखंड गहमरी को बस अपनी जेब से मतलब है।

अखंड गहमरी

बुधवार, 8 जुलाई 2020

8 जुलाई 2019

08 जुलाई 2019 की फेशबुक पोस्ट
आज आठ जुलाई है वनस्‍थली विद्यापीठ टोंक राजस्थान में सीमू दीदी को छोड़ कर हम और वाइफ होम घर पहुँच चुके हैं। सब कुछ अपनी जगह पर है, मगर फिर भी एक उदासी, खुशी यह है कि वह अपने जीवन पथ के प्रथम पायदान पर सफलता पूर्वक चढ़ गई, मगर एक खालीपन। 03 जुलाई की दुपहरिया जब सूरज आकाश के मध्‍य में था, उस वक्‍‍त यह टीन का बक्‍सा उसके दैनिक दिनचर्चा के साजो समान से भर जा रहा था, एक एक सामान पर उसका नाम लिखा जा रहा था। वह दृश्‍य मुझे वह आभास दे रहा था जो कहा जाता था कि बेटी का झॉंपी सजाया जा रहा है। ठीक वैसा ही माहौल था, खुशी थी, चहक थी, मिठास थी, हर तरफ शोर था, मगर इस खुशी के पीछे, इस चहक के पीछे, इस मिठास के पीछे एक गम, एक उदासी, जीवन की खटास, और शांति भी खड़ी थी। समय अपने गति से भागा जा रहा था, पकडने की चेष्‍ठा करना भी आसान नहीं था, और कोई पकड़ना भी नहीं चाहता था, क्‍योकिं वह अपने जीवन की सबसे अनमोल धरोहर को सजाने सवॉंरने उसके सपनों को साकार करने के लिए एक अंजान मगर सुरक्षित हाथो में सौपने अपनी मरजी से आया था। बेटी के विवाह के चरणों की तरह इस शिक्षा व्‍यवस्‍था के सारे चरण खुशी से पूरे कर रहा था, और उसी खुशी के बीच दबे पॉंव आ गई विदाई की घड़ी। हर तरफ चहकती बेटीयॉं नजर आ रही थी, मगर चेहरे पर एक गम साफ दिखाई दे रहा था। मॉं तो मॉं होती है और विदाई तो विदाई। स्‍त्रीयों के रूदन को तो सबने देखा है, वहॉं भी था, मगर पिता मोम के हृदय वाला भी पत्‍थर का बनते हुए अपने ऑंखो को सूखे रहने के लिए बेबस कर रहा था। ऑंखे कही उसका कहना न मानते हुए जलजल न हो जायें, घूप की परवाह किये बिना घूप ग्रहण करता रहा, दौडता रहा।
सब हकीकत जानते थे, फोन पर बात होगी, 4 महीने में अवकाश होगा, मगर जो पिता रोज कही से आने के बाद सबसे पहले चहकते हुए जिस फूल का दर्शन करता था, वह फूल वहॉं नहीं होगी। राजा हो, रंग हो, गरीब हो, अमीर हो संतान मोह से सब ग्रसित रहते थे, उसके पत्‍थर के ह़दय मोम से भी अधिक पीघले हैं।  उसे बस सकून रहता है कि जहॉं है स्‍वस्‍थ है, सुखी है।  वनस्‍थली जाने से पहले मैेने अनेको भ्रॉंतियॉं सुनी थी, मगर सारी की सारी गलत निकली। वैसे यह अटल सत्‍य है कि इस प्रवेश में मेरा कोई योगदान नहीं रहा। न फार्म भरवान में न तैयारी करने में न कागजो को तैयार कराने में, प्रवेश के लिए फार्म खुद उसने और उसकी और भाई चम्‍पू और उसके चचा प्रशान्‍त ने मिल कर भरा, और प्रक्रियाएं पूरी की। उसकी मॉं एवं उसके प्राइमरी पाठशाला के अध्‍यापक राजेश यादव, चन्‍द्रभान जी, एक अन्‍य लोगो के साथ उसके बाबा ने उसकी तैयारी कराई। और चयन के बाद गहमर के अधिवक्‍ता अशोक सिंह एवं  भदौरा के पत्रकार विवेक र्ऊ र्फ विक्‍की ने उसके सारे कागज तैयार कराये। चाचा विकास ने जाने से पहले उसे एक सैनिक की तरह तैयार किया, उसके हौसले को पत्‍थर की तरह मजबूत किया। बाकी आप सब के आशीर्वाद ने अन्‍य चीजो को पूरा किया, मैं किसी का धन्‍यवाद कर उसके महत्‍व को छोटा करना नहीं चाहूँगा
आज 4 दिन बीत चुके हैं, जब भी फोन किया जाता है एक सवाल पापा कब आयेगें, जी करता है अभी चल दूँ, मगर कुछ सोच कर शांत रह जाता हूँ कि कम से कम जिन्‍दगी की यह पहली जंग लडना तो सीख जाये। अपनी पहचान तो बना जायें।

अखंड गहमरी

शनिवार, 25 जनवरी 2020

गजगमिनियॉं और NRC

*हमारा नेता कैसा हो गजगमिनियाँ के जैसा हो*
तुम एक बेहुदा इंसान हो गये हो, दिमाग ठिकाने नही है? क्रोध में काँपते हुए मेरी बाइफ होम चीख पड़ी।
क्या हुआ जानेमन क्यों ज्वालामुखी की तरह फट रही हो?
कई हजार पतियों की आत्मा को अपने अंदर समाहित कर मैं साहस से बोल पड़ा।
मैं आगे कुछ बोल पाता उसके पहले एक अदद चरण पादुका राफेल की तफ्तार से मेरे चाँद से मुखड़े की बढ़ी, निशान और समय अचूक , मेरा मुखड़ा साफ। स्वर में सिंह का गर्जन लाते चीखी, मैनें कहाँ भेजा? स्टेशन न? बोला था न कि मेरे ससुर के समधी की बेटी की ननद की माँ के बेटे की पत्नी की माँ की बेटी आने वाली है जा कर स्टेशन से ले आना?
अरे! मेरी चन्दरमुखी मैं तो भूल गया। अरे मेरी जाने-जिगर अब मान भी जाओ। देखो इसमें मेरा कोई दोष नहीं।
तो किसका दोष है? मेरा?
अरे नहीं चुनमुनकी तुम तो दोष रहित, रहम दिल, प्यारी प्यारी मेरी लतमरूआ डार्लिंग हो।
ये किस किस चुड़ैलों का नाम ले रहे हो तुम? मेरा नाम भी याद नहीं। रूको बताती हूँ। तड़ाक -तड़ाक
हाय माँ , बचाओ बचाओ अरे मेरी ममता डार्लिग सब दोष तुम्हारे रमेश तिवारी जी का है, जो सुबह सुबह शहीनबाग लेकर चले गये।
चल भाग यहाँ से वह गरजते हुए बोली, और दौड़ कर जल्दी से शिवगतिया साव का रसगुल्ला ले कर आवो।
जिसको लाने गये थे वह आ चुकि है।
जैसी आज्ञा सरकार की, मैं यूँ गया और यूँ आया। दर्द को मुस्कान में छुपा कर बोलना पड़ा।
आप तो मेरी पीड़ा समझ ही रहे होगें? समझ रहे हैं न?
ये लो पैसे और पूरा हिसाब देना। जाकर उस कलमुँहे संतोष को पान के पैसे मत दे देना, बहुत पान खाते हो।
अब जाओ मुँह मत देखो।
चलो भाई गहमरी , जान बची तो लाँखो पाये। चल दिया मैं बाजार की तरफ , अभी दस कदम ही गया था कि
ट्रीन-ट्रीन मेरा मोबाइल बज उठा।
नम्बर देख कर तो मेरे पैर जमीन से दस फीट ऊँचे उठ गये।
आप तो समझ ही गये होगें फोन किसका था?
बिल्कुल सही समझा फोन मेरी जाने जिगर, मेरी लखते जिगर, मेरी सूरज मुँखी, मेरी चनर मुखी, दिल की रानी, मेरी दिवानी, बहुत सयानी *मेरी पूर्व प्रेमिका नम्बर वन गजगमिनियाँ का था*
हैलो डियर
इलू इलू इलू इलू
उधर से जो जबाब मैं उसको शब्दों में बयां नही करता।
बस दो मिनट में पहुँच मैने उसे आश्वासन दिया।
अब यो मेरे कदमों ने अग्नि, पृथ्वी और राफेल के चाल को भी फेल कर दिया।
उसके घर के बाहर की खुशबु की मेरा रोम रोम महक उठा।
हाय पीछे से एक तेज आवाज के साथ मेरे पीठ पर थपकी पड़ी।
मैं पीछे मुड़ कर देखा और देखते भाग लिया जैसे कोई भूत मेरे सामने आ गया हो।
डरे डरो मत मैं ही हूँ तुम्हारी गजगमिनियाँ, उसने नकाब उठाते हुए हँस कर कहा।
तुम और इस वेष में?
हाँ आज मुझे चुनाव प्रचार करने शहीनबाग जाना है न, त़ो ऐसे जाना होगा।
खैर छ़़ोड़ो ये सब, तुम नहीं समझोगे मेरे सावरे बलम।
बस जल्दी से मेरे साथ चलो।
मरता क्या न करता हाथो में हाथ डाले चल पड़ा।
जानते हो मेरे लतखौक मतलब मुसलमान किसी से नहीं डरते वह अपने ऊपर अन्याय बर्दाश्त नहीं करते है।
हाँ जानता हूँ मेरी धमकियां।
क्या जानते हो ?
यही जानता हूँ कि वह कितने निडर हैं। निडर सद्दाम निडर लादेन बंकर में, गद्दाफ़ी को पुलिया में छुपे थे।
फालतू की बात मत करो वह थोड़ा गरम हुई।
गरम मत हो प्रिय अभी तो आगे सुनो इनकी वीरता।
ईदी अमीन को महिला के वेश में सऊदी, रोहिंग्याओं को वर्मा से , ISIS को बुर्के मे भागते देखा है। नियाजी सरेंडर करते हुए सुना है। जाकिर को मलेशिया में छिपा और न जाने कितने मुल्ले आतंकवादीयों को पहाड़ो व अन्य जगह छुप कर निर्दोषो पर वार करते देखा है। ये वीरता नहीं तो और क्या है? ये डर नहीं तो और क्या है?
कहते हुए मैं गजगमिनियाँ की तरफ डर से देखा जो मेरी बातों को हवा में उड़ते हर आने जाने वाले अंजान बेगाने को झुक कर सलाम कर रही थी। आज तो उसका रूप देख कर सियार भी शर्मा रहा होगा।
तुमको जो बोलना है बोलो मेरे सावरेबलम मगर मैं तो आज यही जानती हूँ कि मुसलमान डरते नहीं झुकते नहीं।
सरकार को हर हाल में कैब और एनआरसी वापस लेना होगा , हम कोई कागज नहीं दिखायेगें।
हा हा हा हा कागज होगा तो दिखाओगी न। देख लो जिनके पास है वह सीना ठोंक कर हैं।
तुम भी सठिया गये हो, किसके पास पुराने कागज होगें।
देख मेरी झुनझुनियाँ पहले दोनो बिल के अन्तर को समझो तब बोलो ।
हमें कुछ नहीं समझा, बस कागज नहीं दिखायेगें तो कागज नहीं दिखायेगें, देखती हूँ मेरे भाईयों को कौन भगाता है,?
अरे यार कौन किसको भगा रहा है।
कागज कागज कागज
अरे कागज तो घुसपैठियों को अलग करने को माँगा जा रहा है। वो तो दिखा देना चाहिए।
बिल्कुल नहीं।
तब चिल्लाओ वैसे ही जैसे कहते हो लाल किला, कुतुबमीनार, ताजमहल हमारा है, हमारे बाप दादाओ ने बनवाया है।
मतलब क्या है तुम्हारा? उसने घूरते हुए कहा।
देखो देखो क्रोध से तुम्हारे चेहरे की लाली तुम्हारी सुंदरता में 11 चाँद लगा रही है।
भागते हो कि नही, उसने हल्का शर्माते हुए कहा।
अच्छा मतलब बताओ क्या चाहते हो..हम लालकिले और ताजमहल का कागज दिखायें?
बिल्कुल यदि तुम्हारा है तो कागज दिखाओ। देखो हमने काश्मीर का कागज दिखा कर ले लिया, 5000 साल पहले बने राममंदिर का इतिहास, प्रमाण और कागज दिखा कर ले लिया। तुम कहते हो कि 50 साल पहले का कागज नहीं है।इसका मतलब है कि तुम घुसपैठिए हो। साँच को आँच.अभी मेरे पूरे शब्द निकले ही नहीं थे कि
अच्छा बंद करो अपनी ये जुबान आ गये शहीनबाग।
तभी उसके पास कई महिलाएं दौड़ आई जो बड़े सम्मान उसे मंच पर ले गई। पूरे मतचमिश मिनट तक वो क्या क्या बोली में समझ में कुछ नहीं आया मगर गर्व तो इस बात का है कि उसकी हर बात पर खूब ताली बजी और हर बार एक स्वर गूजँता, हमारा नेता कैसा हो गजगमिनियाँ के जैसा हो।
कार्यक्रम समाप्त हो चुका था, उसके साथ साथ मेरा भी गदहे का जन्म छूँट चुका क्योंकि आशा थी हर अखबार में मेरी भी फोटो छपेगी। सब से निपटकर वह मेरे पास आई दूर से फ्लाइंग किस उड़ाते बोली, चलो मटमिटिया डार्लिंग घर चलते है, भाषणा सफल रहा , रास्ते में शिवगतिया साव का रसगुल्ला खाते हैं। रसगुल्ले की बात सुन कर मेरे इश्क का भूत उतर गया, मैने जेब की तरफ देखा तो जैसे लगा कि अंदर पड़ा 500 का नोट बोल रहा हो..बेटा अखंड गहमरी तुम नहीं सुधरेगा। आज तो तेरी बाँट लगेगी। मैं अब कर भी क्या सकता था। गजगमिनियाँ के हाथो में हाथ डाले शिवगतिया के दुकान पर रसोगुल्ला खाने पहुँच गया । उसके बाद तो आज मेरी वाइफ होम रसगुल्ले के साथ साथ उसके माँ-बापको भी निकालेगीं।।। जरा आप अखंड गहमरी की सलामती की प्रार्थना करें। बाकी तो आज पत्नी से पिटने का आनंद मुझे हस कर लेना ही होगा।
*अखंड गहमरी*

मंगलवार, 14 मई 2019

क्‍या केवल मतदाताओं को रिझाने के लिए गहमर के सैनिको का सम्‍मान किया जा रहा है ?

लोक सभा चुनाव 2019 और गहमर द्वितीय भाग-:
अब तक आपने पढ़ा
2019 लोक सभा चुनाव के परिपेक्ष ...................................देखते हैं हकीकत की तस्वीर।।।
आगे पढे़
गाजीपुर के पूर्व सांसदो ,वर्तमान सांसद रेल राज्‍यमंत्री/दूर संचार मंत्री औरभारत प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से  लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी तक ने कितनी बार गहमर के सैनिको की तारीफ कर चुके हैं यदि‍ अखंड गहमरी रख पाता तो वह भी कही लाल नीली बत्‍ती में होता न कि घर में बैठ वाइफ होम की सेवा में मगसूल रहता। आज मैं गहमर के बारे में एक और भ्रम तोड़ना चाहता हूँ। वह यह कि यहॉं के नौजवान केवल सेना में नहीं बल्कि देश की कोई भी ऐसी सुरक्षा एजेन्‍सी नहीं, भारत का कोई ऐसा राज्‍य नहीं जिसकी पुलिस में गहमर के दर्जनों नौजवान कार्यरत न हो। गहमर के वीरता के इतिहास की बात अगर मैं वर्ष 1535 से करूँ तो दो बाते समाने होेगीं पहली की आप पढ़ न सकेगें दूसरे मेरी लेखनी किसी न किसी के योगदान को छोड़ने के कलंक से कलंकित भी हो जायेगी।
इस लिए मैं शुरूआत करता हूँ प्रथम स्‍वतंन्‍त्रता संग्राम सेनानी वीर मैगर सिंह से जिनके वीरता का खौफ अंग्रेजी हूकूमत में इस कदर था कि उनके गहमर आगमन की सूचना मात्र से रात में अंग्रेज अधिकारी अपनी जान की परवाह न करते हुए गंगा नदी मे कूद कर अपनी जान बचा कर भागने पर मजबूर हो गये, प्रथम स्‍वतंत्रता संग्राम में हिस्‍सा लेने वाले मैगर सिंह अकेले नहीं थे उनके साथ दर्जनों गहमर के नौजवान थे। प्रथम विश्‍व युद्व से लेकर द्वितीय विश्‍व युद्व तक गहमर के 219 सैनिक शहीद हो चुके हैं। द्वितीय स्‍वतंन्‍त्रा संग्राम आन्‍दोलन की कोई ऐसी मुख्‍य या गुमनाम धारा नहीं जिसमें गहमर के वीर न रहे हो। चाहे गहमर डाकघर, रेलवे स्‍टेशन, पुलिस स्‍टेशन जलाना हो, या अंग्रेजो को शासन हटा कर अपना शासन 42 दिनो तक करना हो, यहॉं के नौजवानो ने किया।
(समस्‍त आन्‍दोलनकारीयों का नाम पिता का नाम व पटटी लिखना संभव  नहीं हैं, जो चाहे उसे उपलब्‍ध हो जायेगा, मेरी अप्रकाश्तिा पुस्‍तक गहमर दिगदिर्शका में सबका नाम है)आजादी के बाद भी गहमर के सैनिको का सिलसिला थमा नहीं। गहमर की इस वीरता को देखते हुए वर्ष 1989 तक गहमर के पंचायत भवन पर विशेष सैनिक भर्ती गहमर के लिए आती थी, जिसे रैली भर्ती शुरू होने के बाद बंद कर दिया गया।
वीरता के नित्‍य नये दिन आयाम रखने वाले गहमर को आखिर हकीकत के धरातल पर मिला क्‍या ? आज यह प्रश्‍न मैं रेल राज्‍यमंत्री मनोज सिन्‍हा के सामने रखना चाहता हूँ। मनोज सिन्‍हा के समझ इस लिए रखना हूँ क्‍योंकि गहमर ने हमेशा मनोज सिंन्‍हा के मान सम्‍मान की रक्षा की है, वह यदि चुनाव हारें भी हैं तो कभी गहमर में उनके मतो का प्रतिशत कम नहीं रहा है। आज सेना के नाम पर गहमर को अपने लक्षेदार बातो में उलझाने वाले इन सांसदो ने गहमर को दिया क्‍या ? गहमर को इन नेताओं से सुविधा लेने की बात मैं इस लिए हक से करता हूँ क्‍योंकि ये मत मॉंगते हुए गहमर के इतिहास को दुहरा कर गहमर के मतदाताओं को संवेदनाओं से खेलते हैं। आज यहॉं का नौजवान सीमा पर तैनात है मगर घर में जब उसकी बीबी, उसके बच्‍चे, उसके मॉं-बाप बिमार होते है तो वह तड़पने को मजबूर होते हैं क्‍योंकि एक सुविधा जनक चिकित्‍सालय गहमर में नहीं हैं। वह पड़ोसीयों की दया पर, अपने रिश्‍तेदारो की सहायता से गाजीपुर या बनारस पहुँचने का प्रयास करते है, ताकि वह अपना जीवन बचा सके, उनके ऑंखो में अश्‍क होते हैं मगर न वो कुछ कर पाते हैं और न देश की सीमा पर या अपने गॉंव से मीलो दूर अपने या किसी अन्‍य राज्‍य की पुलिस में तैनात उनका सिपाही बेटा, पति या पिता कुछ कर पाता है। वह लाचार होकर बस समय का इन्‍तजार करता है और मॉं कामाख्‍या से विनती करता है कि उसके परिवार को वह सुरक्षित रखें।
आज गहमर के सैनिकों के पास अपने रेलवे स्‍टेशन से भारत की किसी सीमा पर जाने की सीधी ट्रेन नहीं हैं, वह मीलों चल अन्‍य स्‍टेशनो पर जाकर देश की सीमाओं की तरफ जाने वाली ट्रेने पकड़ते है, गहमर रेलवे स्‍टेशन पर पार्सल की सुविधा न होने से वह अपने आवश्‍यक सामान, बक्‍सें लेकर कैसे यात्रा प्रारंभ्‍भ करते हैं ये तो सैनिको का दिल ही जानता होगा, मुझे तो बस लेखनी चलानी है। जब गहमर में बात सीमा पर जाने वाले ट्रेनो के ठहराव की बात होती है तो हमारे मंत्री जो गहमर के सैनिको की तारीफ करते नहीं थकते बडी आसानी से कह देते हैं कि एक ट्रेन के ठहराव में कितनी परेशानी आती है आपको नहीं पता, और वही मंत्री दूसरे दिन जाकर जनपद के विभिन्‍न भागों में ट्रेनो का ठहराव देते है, और जब सब खत्‍म होने को होता है तो मगध एक्‍सप्रेक्‍स जैसी ट्रेन का ठहराव कर अपना सीना ठोक लेते हैं।  गहमर के लोगो ने गहमर में सैनिक स्‍कूल की मॉंग उठाई थी, जिससे सैनिको के बच्‍चे अपने गॉंव में ही अच्‍छी शिक्षा ग्रहण कर सेना में जा सके, वर्ष 2001 के दशक में माननीय अटल बिहारी वाजपेई जी की सरकार में भी यह मॉंग उठी, मगर किसी को सुनाई नहीं दी, उसके बाद से हमेशा गाजीपुर का र्दुभाग्‍य रहा कि केन्‍द्र में जिसकी सरकार बनी हमारा सांसद उसका विरोधी ही था, मगर इस विरोधी खेमें में भी एक सांसद राधेमोहन सिंह ऐसा सांसद हआ जिसने जनता की कसौटी पर खरा उतरने का पूरा प्रयास किया, बहुत कुछ किया परन्‍तु वह भी गहमर में सैनिक स्‍कूल की मॉंग को पूरा न करा सका। माननीय सिन्‍हा जी के आगमन के बाद मोदी के सराकर बनने और गाजीपुर जनपद के मंच से बार बार गहमर का नाम लेने के बाद आशा बनी कि गहमर में सैनिक स्‍कूल खुलेगा, मगर चर्चा तक न हुई। गहमर के युवाओं के लिए आने वाली विशेष भर्ती को दुबारा चालू करने का पूरा प्रयास राधे मेाहन सिंह द्वारा किया गया मगर वह असफल रहें, मगर इसका प्रयास बार बार सैनिको का नाम लेकर गहमर को संबोधित करने वाले मोदी सरकार और इनके मंत्री द्वारा कोई प्रयास माननीय द्वारा नहीं किया गया, और यदि किया गया तो क्‍यों नहीं पूरा हुआ जबकि सारा कुछ इनका ही था।

यही नहीं गहमर के वीर आन्‍दोलन कारीयों के नाम पर जिससे दुनिया जानती है न गाजीपुर जनपद में किसी स्‍मारक, पुल, सड़क,  ईमारत का नामकरण किया गया, न डाक टिकट जारी किया गया और न ही इनके नाम पर रेल व्‍यवस्‍था में किसी ट्रेन का नामकरण किया गया।
आज यह सैनिको का नाम लेकर गहमर को संबोधित करने वाली सरकार न गहमर के सैनिको को अच्‍छा स्‍वास्‍थ दे सकी, न शिक्षा दे सकी और न ही उसको सीमा पर जाने का संसाधन दे सकी, तो किस बात की तारीफ, किस बात का संबोधन। क्‍या केवल मतदाताओं को रिझाने के लिए गहमर के सैनिको का सम्‍मान किया जा रहा  है ?

यह मेरा लेख किसी दुभावना से प्रेरित नहीं है, मैने वही लिखा जिसको मैने अपने 2001 में 21 साल की उम्र से पत्रकारिता ज्‍वाइन करने और 2014 में छोडने के बाद तक कई बार समाचार पत्र में प्रकाशित कराया। 
क्रमस: जारी
आगे पढे गहमर के साहित्‍यकारों पर सरकार की भूमिका।
अखंड गहमरी।

मंगलवार, 19 मार्च 2019

हाेली में पीट दिया मेरी पूर्वप्रेमिका गजगमिनियॉं ने मुझको।

उठीये मेरे पति परमेश्‍वर सुबह हो गई। अब तो ऑंखे खोलीये। ऐसी कुछ प्‍यार भरी आवाज मेरे कानो में जा रही थी। मैं मंद-मंद मुस्‍काता हुआ बिस्‍तर पर करवट बदलते हुए इस आवाज का सुख ले रहा था, जो अब शायद कभी सुनने को नहीं मिलती। मेरे सर ने माथे पर एक हल्‍की चपत का एहसास किया तो मेरी नींद खुल गई। सामने अपनी वाइफ होम के हाथो में चाय का प्‍याला देख कर मुझे अजीब लगा। मैंने पहले तो अपने शरीर पर चिकाेंटी काट कर स्‍वपन न देखने की पुष्‍टी किया। फिर खिड़की खोल कर यह देखने की चेष्‍ठा किया कि आज सूर्य देव कही पश्चिम दिशा से तो नहीं निकल पड़े, मगर वो भी अपनी सही दिशा से थे। मैंने अपने वाइफ होम के सिर पर हाथ रखा कि कही उसे ज्‍वर तो नहीं जिससे वह आज सुबह सुबह प्रेम की भाषा बोलते हुए मेरे लिए चाय का प्‍याला लेकर आ गई।
तभी अचानक मुझे अखंड गहमरी का वो शेर याद आ गया कि
सुबह उठ कर कभी वो प्‍यार से बोले समझ लेना
अभी तुम को लगा मक्‍खन, चलो झाडू लगाना है।।
 इस चाय के पीछे कौन सा राज छिपा हुआ हुआ हैं, लब खोलो, कुछ बोलो, तुम्‍हारी कसम मेरे दिल में तुफान आ गया है। मैं ने उसे प्‍यार से कहते हुए उसके चरणो में अपना सिर नवा बैठा और उसके मुँख से निकलने वाले आशीर्वाद रूपी बचन की प्रतिक्षा करने लगा।
उसने बड़े प्‍यार से मिला सर अपने हाथो से दबाते मेरे खडखडिया बलम इस बार होली में माइके जाने जाना हैं, अपनी तैयारी करो, रिजर्वेशन कराओ* सीधा प्रेम की चासनी में डूबा हुआ हिटलर साही फरमान सुना अौर मैं अपना दिल लेकर बैठ गया।
मैं अब सीधा अपनी तैयारी कैसे करूँ सोचने लगा क्‍योंकि उसके मुहँ से निकले शब्‍द तो पत्‍थर की लकीर होते हैं, बदलने की हिम्‍मत देवो में नहीं तो फिर मैं तो आम मानव हूँ, कैसे बदल सकता हूँ, फिर भी एक प्रयास किया, मैने अपने आराध्‍य देव डा0 रमेश तिवारी जी को फोन लगाया कि हो सकता है हनुमान की भूमिका में आकर मेरी वाइफ होम को कुछ समझा सकें, क्‍योकि शहर न सही प्रांत तो एक ही है, कुछ तो राशि मिलेगी ही, परन्‍तु नतीजा सिफर ही निकला।
मगर आप हकीकत मानीये यह तो मैं दिखावे के लिए कर रहा था, खुशी तो मुझे भी होली में ससुराल जाने की बहुत थी। साली, सरज के साथ के साथ रंगो की ठेला-ठेली, और फिर मेरी पूर्व प्रेमिका गजगमिनियॉं भी तो आज कल वही थी, अपने शहर में, उससे मिलने का भी सुनहरा अवसर मेरी वाइफ होम ने प्रदान कर दिया था।
मेरे दहेज में मिली चार चक्‍के की गाड़ी अब खटारा हो चुकी थी, मैैनें बार बार अपनी सासूँ मॉं से कहा कि आपका दिया दो प्रोडेक्‍ट खराब हो गया है, बदल दें, मगर एक ही जबाब मिलता , हैंडिल विथ केयर नहीं होगा तो यही हाल होगा। मैं एक खटारा प्रोडेक्‍ट को छोड कर दूसरे प्रोडेक्‍ट को लेकर लौ पथ गामिनी विश्राम स्‍थल की तरफ प्रस्‍थान कर गया। भारतीय परम्‍परा के अनुसार अपने निर्धारित समय से मात्र दो घंटा विलम्‍ब से मेरी लौ पथ्‍ज्ञ गामिनी कनघरियापुर रेलवे स्‍टेशन पर पहुँची, इतने देरे में मेरी वाइफ होम ने जाे तांडव मचाया कि कनघरियापुर रेलवे स्‍टेशन पर तैनात लौ पथ गामिनी विश्राम स्‍थल सरंक्षक साधु यादव भी डोल गये, जय श्री राम बोल गये। गिरते पडते हम आखिर पहुँच ही गये अपने सबसे बड़े तीर्थ स्‍थल टटमरियापुर जक्‍शन। एक गदहा खड़ा, उसकी सवारी कर हम उस मंदिर में प्रवेश किये जिस मंदिर से एक गौ जो अब शेर से भी अधिक खतरनाक है लेकर मैं निकला था।
सुबह ही होली का पवित्र पावन त्‍यौहार था, मैं चारो तरफ अपने कान दें कर सुनने की कोशिश कर रहा था कि शायद कहीं होली पर होने वाले फाग गीतो काे जलसे की अावाज आ जाये, मगर मेरे कानो को दूर दूर तक वह आवाज सुनने को नहीं मिली, दूर दूर तक कही, ढोल मजीरे की आवाज सुनने को नहीं मिली, मगर मैं चुपचाप बैठ जाऊँ ये तो हो नही सकता था।
सुबह होली का त्‍यौहार, मैं ससुराल में और सब शांत रहें ऐसा अगर हो जाये तो फिर अाप में और मुझमें फर्क ही क्‍या रह जायेगा।
बीस वर्ष पुराना दामाद ससुराल पहुँचा था, कुछ विशेष की आशा करना तो बेकार ही था,  एक मिठाई के साथ पानी पी चुका था, अब पेट पूजा की तैयारी थी, अागे खाना पड़ा था, एक सब्‍जी, एक दाल, दही, पापड,धी आचार और सामने डिस्‍को डानियॉं के रूप में साली और सरज पानी का जग और गिलास रख कर पीछे मुडी ही थी कि मैने दाल, सब्‍जी, दही से उनके गोरे गोर शरीर को मटमैला कर दिया, और उनके मुँंख की जगह उनके सिर  जग और गिलासो के पानी से पवित्र कर दिया। मचा हंगामा, दो मेरी तरफ ऐसी दौड़ी जैसे फ्रॉंक पहने वाली अवस्‍था में तितलियों की तरफ दौडती थी । मैं बच कर भाग, लेकिन घपतालिस  कुन्‍तल पडतालिस किलो ततियालिस सौ ग्राम की अपनी दोनो आधी घर वालीयों और अपनी अपनी वाइफ आउटर यानि साले की बीबी ने जो मेरी चटनी बनाई, मेरे शरीर का रोम राेम* आईहो दादा, आईहो माई* चिल्‍लााने लगा।
नींद तो दर्द के से दूर थी मगर उस में भी एक खुशी थी एक सुख था साली और सरजह से पिटने का सुख जो आप तो कभी पा ही नहीं सकते क्‍योकि आप तो ठहरे शहर के बड़े प्र‍िष्ठित आदमी, आधुनिक जमाने के माानव, रिश्‍तों के सुख काे अभद्रता का नाम देकर, बकवास की श्रेणी में रहते हुए महिलाअों की मान सम्‍मान की बात करते हैं, और मैं तो इसे सूली पर चढा देता हूंँ।
रात तो जैसे तैसे बीत गई, सुबह की कल्‍पना करते करते रात बीत जाने की दुआ कर रहा था, मगर न  ये रात बीतने का नाम नहीं ले रही थी और मेरी मंदिर के अन्‍दर से आने वाली आवाजे खत्‍म होने का नाम ले रही थी। सुबह गजगमिनियॉं से मिलने के स्‍वपन देखते देखते न जाने कब ऑंख लग गई।
ऑंख तो तब ख्‍ुाली जब मेरी वाइफ होम के परम पूज्‍य गदहे भाई के शरीफ औलाद ने मेरे ऊपर घडो का पानी फैक अपनी तोलती आवाज में बोल बैठा पूपा जी पूपा जी बुल्‍ला न मानो लोली है।
मैं ने उठते हुए उसकी मॉं को लेकर एक सुन्‍दर, सलीके दार शब्‍द का प्रयोग किया और दोडा कर गोद में ले लिया।
अभी उसे गोद में लिया ही था कि
चारो तरफ घंटिया बजने लगी, फि़जा में एक अजीब सी खुशबू फैलने लगी, सूरज छिपने लगा, फूल खिलने लगें, मैं समझ गया कि मेरी पूर्व प्रेमिका गजगमिनियॉं कही पास आ ही है। मैं चारो तरफ ऐसे देखने और भागने लगा जैसा जैसे कस्‍तूरी की तलाश में मृग, तभी मेरे नजर एक पेड़ की तरफ गई उसके पीछे एक काले परिधानो में सजी एक सुन्‍दर काया नजर आई आयी,मैं उधर भागा।
तभी मेरे पीठ पर एक जोरदार प्रहार हुआ, मैं कुछ समझ पाता उसके पहले ही आवाज सुनाई दी,
कनतालिस घंटे हो गये तुम्‍हें आये कहॉं थे अभी तक। अपना सिर उठा कर देखा तो हाथ में बिलतालिस नम्‍बर की सेंडल लिये मेरी गजगमिनियॉं मेरे सामने थी। चेहरा दूध की तरह सफेद, गालो पर लाली, मैं तो बाग बाग हो गया
मैं पहले तो झुक उसके चरणो में अपना प्रणाम निवेदित किया, वह हँसते हुए बोल पड़ी तुम नहीं सुधरो के मेरे लभोरनदास, उसकी हसी और बाते सुन कर मेरा दिल फुटबाल की तरह कूदने लगा। उसकी घडकन बढने लगी
मेरा दिल उसके दिल से मिलने को बेताबा होने लगा। मैंने धीरे से कहा कैसी हो। बस कट रही हैं जिन्‍दगी उसने जबाब दिया। मैं सहम उठा। क्‍यों मेरे खटछोडन डीयर ऐसी उदासी क्‍यों, कुछ नहीं बस ऐसे ही।
मैं तो तुम्‍हारे साथ होली खेलने उतनी दूर से चला आया और तुम हो कि ऐसी उदासी से बोल रही हो।
तब खेले न होली, मगर खेलोगे कैसे अब तो तुम आध‍ुनिक हो गये हो। होली याद भी  है कैसे खेली जाती है, मुझे तो नहीं लगता, उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा।
पागल हो गई हो क्‍या गजगमिनियॉं खोली खेलना भी कोई भूलने की चीज है, पानी में रंग डालो सब पर फेंको, सबको रंगो हो गई होली ।
वह जोर से हसी उसकी जोर की हसी से पूरा बाग थररा गया ऊपर के पेड पर लटक रहा एक सिरफल टूट कर सीधे मेरे सर पर गिरा, मैं सर पकड़ कर बैठ गया।
मेरे बैठते ही वह पेरशान अपने हाथो को मेरे सर पर रखते हुए बोली तेज चोट लगी क्‍या, मैं ने भी उसी तेजी से जबाब दिया नहीं  जी, फूल की बातो से गिरे फूल से भी किसी को चोट लगती है क्‍या, वह तो मुझसे प्रेम करने आया था, और प्रेम के निशान में सिर पर एक जख्‍़म दे गया ताकि मैं उसे याद रखूँ।
तब तो कोई बात नहीं ऐसे यह  सिरफल बहुत हिम्‍मती है, जो मेरी मौजूदगी में भी तुमसे प्‍यार करने चला आया, उसने उस सिरफल को हाथ में उठाते हुए कहा।
चलो अब यह सिरफल गिर ही गया तो इसको भी तोडते हैं रस निकलाते हैं और तुमको पिलाते हैं।मैने बुरा सा मुहँ बनाया। क्‍यों तुमको अच्‍छा नहीं लगता। आेह आज के लोगो को सिरफल नहीं अंगूर की रस पंसद हैं, जौ का रस पंसद है। सही न और उसमें भी आज तो होली हैं, रंग अबीर की जगह मॅास-मदिरा का त्‍यौहार
उसकी बाता सुन कर बिना हाथ दिये चौराहे पर मुड़ते मोटसाइकिल चालक की तरह घूम गया लेकिन कर क्‍या सकता था, बोलने की हिम्‍मत तो थी नहीं।इस लिए मुस्‍कुरा पड़ा। छोड़ो जी ये बाते और प्‍यार की बातें करें कुछ आज होली है हँसते हैं मुस्‍कुराते हैं।
वह ताव में गा गई। प्‍यार, हसंना, होली खेलना पूरे जंगली हो क्‍या, मेरे कनसूटिया प्रेमी
मैं आज उसकी बातो को समझ नहीं पा रहा था आखिर क्‍या हो गया था उसको, मेरी तो औकात नही थी जो उससे सीधे पूछ देता, क्‍योंकि एक तो उसके हाथो में वही सिरफल था जो कुछ देर पहले मेरे सर से प्रेम चुका है दूसरे उसके पॉंवो में बेहतरीन चप्‍पल, जो कभी भी मेरे गोरे, लाल , मक्‍खन से मुलायम गालो से प्रेम कर जाते।
फिर भी जो मार से डर जाये वह मैं क्‍या। रमेश तिवारी का जी का नाम लिया और कूद गया आग में और पूछ बैठा मेरी अठलिनियॉंं बताओं आखिर बात क्‍या है, इस होली में तुम्‍हारे चेहरे और शब्‍दो का भाव बिगडा क्‍यों है।
कुछ नहीं, वह उदासी से बोलती, आओ चलते है उधर बैठते है। मैं उसके पीछे पीछे चल पड़ा और वह जैसे यादो की दुनिया में खाे गई, उसने मेरा हाथ अपने हाथो में लेते हुए बोली, याद है खड़खडीयॉं होली का वो रंग जो महीनो नहीं छूटता था। महीनो ढोल, तासा, मजीरे की आवाज कानो  में गूँजती थी।
मैं कुछ धीरे धीरे समने लगा था उसकी उदासी का कारण
मगर मैं कुछ बोल तो सकता नहीं था, इस लिए उसकी बातो को चुपचाप सुनने लगा, और उसकी उदासी में भी हँसी का तड़का लगाने लगा, हॉं मेरी गलछोडी डीयर सब याद है, कैसे कूदती थी दिवारो पर चढकर तुम, जैसे हिरनी। मेरी बात सुन कर वह कुछ शर्माई।
कुछ सकुचाई। हॉं और तुम भी तो कम नहीं थी, मेरे बाबा को भॉंग पिला कर  दादी को सोते हुए  खटिया सहित उठा कर होलिका दहन पर ले जाकर गिरा दिये और उनकी खाट को होलिका में फेंक दिये, जब वह गाली देने लगी तो बाबा के हाथ में रंग भरी बाल्‍टी दे दे दिया बाबा ने भी बुरा न मानो होली है कहते हुए  दादी को नहलावा दिये। दादी का सारा गुस्‍सा और खटीया जलने का दर्द भूल कर शर्माती हुई वहॉं से तुम को गाली देते घर चली आई। वह रात तो हसते हसते बीती।
हॉ याद है, मगर डीयर वो बातें कहॉं अब, मैने भी अंग्रेजी शब्‍द का प्रयोग किया।  पता ही नहीं चला हम दोनो चलते चलते कब पास की एक  बस्‍ती की तरफ आ गये। मेरी निगाह जब उस बस्‍ती की तरह गई तो मैनें गजगजिनियॉं से कहा मेरी दतखोपड डीयर ये हम लोग कहॉं आ गये, इस बस्‍ती में तो होली के दिन भूल के भी नहीं आता कोई।
क्‍यों उसने कहा
याद नहीं है इस बस्‍ती की होली
घरो के दिवारो पर चढ कर कही युवा तो कही बच्‍चे भाभीयों पर रंग डालने के कैसे कैसे हथकड़े अपनाते हैं, तो कही भाभीयॉं छत के कोने से देवरो पर रंग डालने के लिए कूद फॉंद करती है।
होली गाने वालो की टोली जिसको पकड़ लेगी वह दिन भर कही का नहीं रह जायेगा ।
भागो यहॉं से।
वह जोड से हस पड़ी अरे मेरे लतखोर बलम ये तो कही पर खडे बच्‍चे ऊपर से रंग डालते तो कही शराब के नशे में घूमते लोग दिखाई दे रहे हैं। अब वो बातें अध्‍याय बन चुकी हैं।
अब होली एक त्‍यौहार नहीं एक मजूबरी बन गई हैं, त्‍यौहार तो कब का मर चुका हैं, अब तो होली पर
शेववाटर के जुमले सुनाई देते है।
मैने कहा ऐसी बात नहीं हैं, अभी भी हम होली खेलते हैं, पकवान बनाते है कहॉं कुछ बदला है मेरी फुलझरी, मैने मजे लेने के लिए बोला,।
चटाक चटाक दो झापड मेरे गाल पर उसने रसीद कर दिये, तुम्‍हें दिखाई नहीं देता या तुम अंधे हो
लात खाने की आदत तुम्‍हारी नही जायेगी कहते हुए वह गुस्‍से से काप गई।
अब न हम होली खेलते हैं न होली मनाते हैं, हम तो बस आध्‍ुानिकता का चादर ओढ कर अपनी सभ्‍यता अपने संस्‍कारो को भूल कर, सुख की खाल पहनते हैं।
तेज चोट लगी क्‍या, उसने अपने गुस्‍से को नीचे कर मुझसे पूछा, नहीं चोट नहीं लगी,ऐसे लगा जैसे कोई फूल गालो से टकराया हो, मैने जबाब दिया।
चलो तब ठीक है, उसने धीरे से कहा।
ये बताओं की अब तुम्‍हें कही रिश्‍तो की मिठास दिखाई देती हैं, देवर-भाभी की हँसी मज़ाक, जीजा-साली की चुलह, ननद-भौजाई का वह रिश्‍ता, नंनदोसी-भौजाई का रिश्‍ता या फिर साले सरहज का रिश्‍ता।
मुझे तब तो अब हर रिश्‍ता अंकल-आंटी, पर सिमटता दिखाई देता है।
मिठाथ की जगह थोथा सम्‍मान दिखाई देता है। समय की कमी के भूत पर विलासिता के ताक पर रखा हुआ अंहकार दिखाई देता है।
वह एक सास में बोल गई।
हा गजगमिनियॉं से बात तो सही कर रही हो, मैने चेहरा घुमाते हुए कहा।
अब तो रिश्‍तो के हसी मजाक असम्‍भ्‍यता की निशानी बन गये हैं। बच्‍चों को रिश्‍तो के नाम और अहमित की जगह हम केवल अंकल -आन्‍टी बता कर खोलता आदर्शवाद सिखा रहे है।  त्‍यौहारों को बस नाम पर ठो रहें है, और अादर्श केवल बयानो में सुन और लेखनी में पढ रहे हैं।
मेरा इतना कहना था कि मेरे सिर पर एक जोरदार प्रहार हुआ मैं गिर पड़ा मैं कुछ समझ पाता इसके पहले गजगमिनियॉं मेरे सीने पर सवार हो गई। हाथो में लिये रंग को मेरे पूरे चेहरे पर मलते हुए कहा कि यही बात तभी से समझा रही हूँ, सोच रही हूँ, कहॉं गया था तुम्‍हार दिमाग, घास चरने।
मैं ने करवट बदला उसे नीचे गिराया मगर वह संभल चुकी थी और सीधे समाने की तरह दौड पड़ी, मैने उसे पकड़ा और बुरा न मानो होली है कहते हुए पास के तालाब में फेंक दिया, वह तालाब आज सूना पड़ा था, कभ्‍ाी इस तालाब के किनारे कही युवाओं का तो, कही बूढो तो कही बच्‍चों का झुन्‍ड होली के दिन रंग झुडाता दिखाई देता, तो किसी कोने पर महिलाएं अपने रंग को छुडाते हुए अपने नंदोई और देवरो को गालीयॉं सुना रही होती थी।
तालाब ने मेरी तरह देख कर पूछा कहों साहित्‍यकार साहब कैसे हो, आज तो मुझे सुना देख कर तुम्‍हें आभास हो गया होगा कि तुम अब सभ्‍य समाज में जी रहे हो, आधुनिक हो गये हो, तुम्‍हारे बच्‍चे उन सब से दूर हो गये हैं, जिनके पास तुम रहा करते थे।
अच्‍छा है न तुम्‍हारा ये सम्‍भ्‍य एकल समाज, जहॉं तुम्‍हारी खुशियाें का दायरा छोटा अौर सिमटा हैं, त्‍यौहारो की मौलिकता, खत्‍म हो चुकी है।
मैं उस तलाब के सवाल के जबाब के बारे में कुछ सोचता मगर तभी पीछे से आकर मेरी साली और सरहज ने एक लात लगाते हुए कहा कि हम इनको चारो तरफ खोज रहे हैं और ये यहॉं छुपे हुए हैं मैं कुछ सोच पाता इसके पहले वो रंग भरी बाल्‍टी में ऊपर डाल बैठी, मैं ऑंखे मतला हुआ सामने देखा तो पोरखरे के दूसरे छोर पर तैर कर पहुँची गजगमिनियॉं मुस्‍कुरा रही थी, मगर उसके कहें हुए शब्‍द और पोखरे का सवाल मेरे रंग में भीगें हुए शरीर को भी जला रहा था। एक सवाल छोड रहा था कि क्‍या कभी हम फिर लौट पायेगें अपनी सभ्‍यता और संस्‍कृति की तरफ, फिर कभी हम मना पायेगें अपनी होली उसके  के रूप के अनुसार क्‍या हम फिर जी कभी जी सकेगें अपने रिश्‍तो के साथ, अपने अपनो के साथ, अपने चुलह, हसी ठिठोली के साथ, क्‍या हम दे पायेगें अपने बच्‍चों में बो पायेगें सम्‍भ्‍यता और संस्‍कृति का, रिश्‍तो के अहमित का उनके साथ मिलने वाले आंन्‍नद का बीच, कहा पायेेगें एक सच्‍चे सुख का एहसास या फिर शहर की चकाचौध में, रिश्‍तो के बनावटी पन में, सुखो के बनावटी पन में खो जायेगा सब सु:ख, सच्‍चा जीवन ।
आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ आपका अखंड गहमरी ।