शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

कोरोना से भी अधिक खतरनाक है ये वायरस, रूलायेगा आपको खून के ऑंसू।

भारत ही नहीं विश्व को परेशान करने वाले कोरोना की दवा तो नहीं बनी है, लेकिन कोरोना के बाद जिस वायरस ने आम आदमी को सबसे अधिक परेशान किया है उस वायरस की दवा होने के बाद भी इस वायरस का ईलाज नहीं हो पा रहा है। इस वायरस का ईलाज करने वाले डाक्टर ही इस वायरस को पनपने में पूरी मदद कर रहे हैं।  कोरोना वायरस तो केवल आदमी के तन को खा कर रहा है लेकिन यह वायरस तो आम आदमी के तन मन धन को खाते हुए उसका भविष्य पूरी तरह बर्बाद कर रहा है। इस वायरस की भूख इतनी अधिक है कि वह जिन्दगी को जीते जी पूरी तरह खा जा रहा है। सब कुछ खाने के बाद भी इस वायरस की भूख और दरिद्रता मिटने का नाम नहीं ले रही है। नित्य नये नये चोचले निकाल कर वह इस प्रकार दोहन कर रहे हैं कि उसके आगे भष्मारसुर व कोरोना भी शर्म के आगे चूल्लू भर पानी में डूब कर मर जाये। कोरोना से भी अधिक खतरनाक इस वायरस का नाम है नीजी स्कू‍ल व उसके संचालक।
                            दुनिया का हर प्राणी जानता है कि पूरा विश्व वर्ष 2020 के प्रारंम्भ से ही  जीवन को बचाते हुए दो वक्त की रोटी व सर की छत के लिए किस तरह संघर्ष कर रहा है किस तरह उसे बचा रहा है। यह दर्द तो वही बता सकता है जो इससे जूझ रहा है। इन सब से बेपरवाह कोरोना से भी खतरनाक राक्षस रूपी नीजी स्कूल संचालक उसे मौत के मुहँ में ढ़केले जा रहे है और वह केवल किस इस लिए बर्दाश्त करने को बाध्या है क्यों कि डर उसके बच्चों  के भविष्य का दिखाया जा रहा है। बच्चों के भविष्य रूपी तलावार से डरा किस प्रकार नीजी स्कूह इस काल में भी मनचाही वसूली कर रहें उसे रोकने का साहस मुझे लगता है किसी में नहीं। शासन प्रशासन भी नीजी स्कूलों के इस धिनौने कृत्य में पूरी तरह उसका साथ निभा रही है।
                                 कितना भी बड़ा व्यापारी क्यों न हो, चाहे वह भारत का सबसे अमीर घराना क्यों न हो वह गॉंव में विकास के निचले पावदान पर खड़े व्यक्ति के खरीदारी क्षमता जिसे अंग्रेजी में आप सब परचेंजिग पावर कहते हैं उसी पर निर्भर है। बाजार का मुख्य हिस्सा छोटी दुकान, ठेले, गुमटी जो बड़े से बड़े निर्माता के घर की रोटी चलाती हैं, महीनो महीनें से बंद पड़ी हैं। बड़ी कम्‍पनीयों के मालिक अपने अथाह धन होने के बाद भी अपने सेवको को दो वक्‍त की रोटी नहीं दे पाये। मालिकों ने अपने अकड़ के कारण, अपने छड़‍िक लाभ के कारण अपने मजदूरों को संभालना जरूरी नहीं। मजदूर भूखें नंगे पैदल चलते बेसहारा लाचार घर लौट गये। इसका नतीजा यह हुआ कि आज निर्माताओं के पास सब कुछ होते हुए भी मानव बल नहीं । जिससे वह उत्पादन करें।   
                             हर आदमी अपनी आमदनी ही नहीं गँवा चुका है बल्कि अपनी जमा पूँजी का बड़ा हिस्सा  निकाल कर अपने पेट की ज्वाला को शांत कर रहा है। आ‍खिर वह करें भी तो क्या  करें? कहॉं जाये? किससे कहें ? क्या कहें? सुनेगा कौन? बंद वातानुकुलित कमरे में बैठे अफसरशाहों का गुलाम हो चुके भारत के नेताओं के पास न तो अपनी सोच है न क्षमता, न तो उनकी यादाश्त ही इतनी तेज है जो वह जमीन की हकीकत को याद रख सकें। इस लिए वह जनता के दर्द निवारक दवा बन नहीं सकते। जब हर तरफ आर्थिक मंदी और बंदी दोनो है ऐसे में कहॉं से आयेगें इतने पैसे जो नीजी स्कूल नाम वायरस का ईलाज कर सके ? कुछ स्कूल कह रहे है जब आपकी हैसियत नहीं थी तो क्योंं बड़े स्कूल में डाला? भैया मैं 500 रूपया दैनिक कमाता था। आप के स्कूल की फीस 3000 रूपये थी और खर्च लेकर 5000 रूपये महीन, हम नमक रोटी से गुजारा कर के बच्चे को पढ़ा रहे हैं। आमदनी बचा कर आपको तो आपको फीस दे रहे थे परन्‍तु आज जब हम 1 रूपया महीना नहीं कमा रहे हैं तब भी आपको हम पैसे देने को तैयार है मगर आप कुछ तो छोड़ीये।
                           आज प्राइवेट स्कूल केवल दिखावे के नाम, फीस व अन्य  वसूली कायम रखने हेतु आनलाइन क्लासों का चोचला शुरू किये हैं। मैं पूछना चाहता हूँ कि भारत में कितने ऐसे परिवार होगें खास तौर से ग्रामीण व छोटे नगरी क्षेत्र में जो अपने आवश्यकता से अधिक मोबाइल फोन रखे होगें, यदि उनके घर में तीन बच्चें है तो भी एक मोबाइल खरीदना ही पड़ेगा और और तो किताबों की जरूरत भी बता कर सारी-सारी की किताबें खरीदवाई जा रही हैं। मैं दावे और जिम्मेदारी के साथ कहता हूँ कि जिस प्रकार की एनसीआरटी की किताबें बाजार में कम कीमत में उपलब्ध  हैं  उससे 90 प्रतिशत गिरे स्तर की किताबें प्राइवेट प्रकाशक  से मोटा कमीशन लेकर  नीजी स्कूल रूपी वायरस मँहगे दामो उसे बेच रहे हैं और बच्‍चों को इस समय भी उसे खरीदने पर बाध्य  कर रहे हैं। यही नहीं हर साल वह किताबों को बदलने की परम्‍परा इस साल भी शुरू रखें हैं।  बदलाव भी क्या प्रकाशन वही, उसकी सिरीज बदल दी जाती है जिससे एक ही परिवार का लड़का जो एक क्लास आगे पीछे है किताबो का प्रयोग न कर पाये और इन वायरसो का पेट और भरें।कुछ स्कूल संचालक बच्चों  को लैपटाप लेने की सलाह दे रहे हैं आज के बाजार भाव में बाजार में कम से कम लैपटाप की कीमत 15000 हजार रूपये, उसके साथ माडम ऐसोसिरिज मिला कर 18-19 हजार रूपये आप बताईये कहॉं से खर्च कर पायेगा इतने रूपये। आनलाइन क्लास के नाम पर मोबाइल की खरीद या मोबाइल देने की बात हो रही है मैं जानना चाहता हूँ कि आज हर आदमी कहॉं से मोबाइल लायेगा।
                    मैं दावे और जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूँ कि जिस प्रकार प्राइमरी और जूनियर हाई स्कूल के स्तर के बच्चों  का आनलाइन क्लास चल रहा है, जिस प्रकार नज़रे मोबाइल पर टिकाना पड़ रहा है, नेटवर्क और तमाम दिक्कहतें हो रही हैं बच्चें  कुछ दिन में पागल और शरीरिक रूप से बेजान व भूख न लगने अनिद्रा के शिकार न हो गये तो आप भी कहीयेगा। अधिक दिन नहीं यह समस्‍या इन आनलाइन क्‍लासो का परिणाम आपके सामने महीने के दिन के अंदर आने लगेगा। न यकीन हो तो अपने किसी अच्छे  बाल रोग विशेषज्ञ से पूछ कर देंख लें। आज जिस आनलाइन क्लास से बच्चे  के पढ़ने को अपने रूतबे से जोड़ रहे हैं भगवान न करें  खून के ऑंसू रोना पड़े।   ये नीजी स्कूल नामक वायरसो ने आम आदमीयों को इस कदर मजबूर कर दिया है कि वह न जी पा रहा है न मर पा रहा है और हमारी सरकार आम आदमी के परेशानी पर मजा ले रही है। ले भी क्यों न हमारी सरकार में बैठे लोगो की खुद या तो कई नीजी स्कूल है या तो उनके चहेतो के नीजी स्कूल हैं ऐसे में कोई अपने पैर पर कुल्हाड़ी कैसे मारेगें? यह तो साफ है। 
                    मानता हूँ कि नीजी स्कूल के भी कुछ ऐसे खर्च है जो किसी काल में बंद नहीं हो सकते हैं, जैसे अध्यापको व कर्मचारीयों का वेतन, प्रधानाचार्य/प्रचार्य/प्रधानाध्या पक का वेतन और उसके बाद स्कूल प्रंबधक का बड़ा पेट इस लिए उन खर्चो के लिए स्कूल की फीस जरूरी है मगर वह भी इस काल में उतनी ही  होनी चाहिए जितने में स्कूल के खर्च निकल जाये अध्यापको व कर्मचारीयों के भूखमरी के हालत न आवें। पर ऐसा नहीं है स्कूल की चारदिवारों की संख्या  बढ़ा कर अपना कद बढ़ाने की भूख, किताबों में कमीशन की भूख, इतनी अधिक है कि उन्हें मानवीय संवेदनाएं दिखाई ही नहीं पड़ती।

                   मेरा मानना है कि जान है तो जहान है। इस संकट के कम होने के बाद कोर्स को कम करके, सेशन देर से शुरू किया जा सकता है। एक्ट्रा  क्लास चलाये जा सकते हैं। महत्वपूर्ण चीजो को बता करे के परीक्षा कराई जा सकती है। वर्तमान में स्कूल अपने देय वेतन के हिसाब से फीस रखें, प्रवेश शुल्क, बिल्डिंग शुल्क, विकास शुल्क और अन्य शुल्कों  के नाम पर होने वाले लूट को कम से कम इस काल में बंद कर दें। जिससे आम आदमी भी जीवन जी सकें। कही ऐसा न हो कि आम आदमी नीजी स्कूलों के इस वायरस के हाथों इस कदर परेशान हो जाये कि या तो वह हाथ में हथियार उठा लें या अपनी ही जीवन लीला समाप्त कर लें।

अखंड गहमरी 

शनिवार, 11 जुलाई 2020

पत्रकार बस पैसे के

हम गहमर व बारा के कुछ पत्रकार कुछ दिनों से मूलभूत समस्याएं जिसका आम आदमी के जीवन पर सीधा बुरा प्रभाव पड़ रहा है जिला/ग्राम व प्रशासन के ऊपर दबाब बनाने को छोड़ कर गौ तस्करी, शराब तस्करी के, ओवर लोड़िग जैसे मुद्दो पर पुलिस खिलाफ मोर्चा खोले हुए। जिसका जनमानस के जीवन पर तो कोई प्रभाव नही है, परन्तु हमारी जेब पर प्रभाव जरूर है। आखिर जेबें तो हमारे पास भी हैं। पेट तो हमारे पास भी है?
हमें दिखाई ही नहीं दे रहा है कि हमारा क्षेत्र कितनी विषम परिस्थितियों से गुजर रहा है। मुख्य मार्ग से पकड़ीतर जाने वाले रास्ते पर जीवन नर्क से बत्तर हो गया है, पैदल चलना मुश्किल है वह हम पत्रकारों को दिखाई नहीं ले रहा है। गहमर के बाजारो, बैंको में सोशलडिक्टेनसिंग/ मास्क की खुले आम धज्जियां उड़ाई जा रही है वह हम पत्रकारों को दिखाई नहीं दे रहा है। गहमर रेलवे स्टेशन रोड को खोद कर छोड़ दिया गया है वह दिखाई नहीं दे रहा है। स्टेशन रोड पर जल-जमाव में बिजली के जर्जर तार रोज टूट रहा है वह हम पत्रकारों को दिखाई नहीं दे रहा, हम तो हादसे का इंतजार कर रहे हैं। पूरा गाँव गंदगी के आलम में त्राही-त्राही कर रहा है बिमारीयों का खतरा फैला हुआ है वह हमें दिखाई नहीं दे रहा है। आज कल हमारे चश्में में पुलिस ही पुलिस है।
और दिखाई दे रहा है भाजपा विधायक और जिला पंचायत के बीच शीत युद्ध, जिसे हम भुनाने में लगे हैं।
हमारे लिए जन समस्या और आम आदमी तो बिल्कुल दूध में गिरी मक्खी के समान है। आम आदमी की सुन कर करेगें भी क्या? पुलिस के खिलाफ मोर्चा खोलेगें तो देवल बारा बार्डर से शराब व गौ तस्करी और बालू ओवरलोडिंग में हम हिस्सा पायेगें। विधायक-जिला पंचायत के शीत युद्ध में पड़ेगे तो कुछ इधर से कुछ उधर से पायेगें। आने वाले पंचायत चुनाव के भावी प्रत्याशियों के साथ चलेगें उनकी बात सुननेगें तो भविष्य सुनहरा होगा। आम आदमी मरता है तो मरे अखंड गहमरी को बस अपनी जेब से मतलब है।

अखंड गहमरी

बुधवार, 8 जुलाई 2020

8 जुलाई 2019

08 जुलाई 2019 की फेशबुक पोस्ट
आज आठ जुलाई है वनस्‍थली विद्यापीठ टोंक राजस्थान में सीमू दीदी को छोड़ कर हम और वाइफ होम घर पहुँच चुके हैं। सब कुछ अपनी जगह पर है, मगर फिर भी एक उदासी, खुशी यह है कि वह अपने जीवन पथ के प्रथम पायदान पर सफलता पूर्वक चढ़ गई, मगर एक खालीपन। 03 जुलाई की दुपहरिया जब सूरज आकाश के मध्‍य में था, उस वक्‍‍त यह टीन का बक्‍सा उसके दैनिक दिनचर्चा के साजो समान से भर जा रहा था, एक एक सामान पर उसका नाम लिखा जा रहा था। वह दृश्‍य मुझे वह आभास दे रहा था जो कहा जाता था कि बेटी का झॉंपी सजाया जा रहा है। ठीक वैसा ही माहौल था, खुशी थी, चहक थी, मिठास थी, हर तरफ शोर था, मगर इस खुशी के पीछे, इस चहक के पीछे, इस मिठास के पीछे एक गम, एक उदासी, जीवन की खटास, और शांति भी खड़ी थी। समय अपने गति से भागा जा रहा था, पकडने की चेष्‍ठा करना भी आसान नहीं था, और कोई पकड़ना भी नहीं चाहता था, क्‍योकिं वह अपने जीवन की सबसे अनमोल धरोहर को सजाने सवॉंरने उसके सपनों को साकार करने के लिए एक अंजान मगर सुरक्षित हाथो में सौपने अपनी मरजी से आया था। बेटी के विवाह के चरणों की तरह इस शिक्षा व्‍यवस्‍था के सारे चरण खुशी से पूरे कर रहा था, और उसी खुशी के बीच दबे पॉंव आ गई विदाई की घड़ी। हर तरफ चहकती बेटीयॉं नजर आ रही थी, मगर चेहरे पर एक गम साफ दिखाई दे रहा था। मॉं तो मॉं होती है और विदाई तो विदाई। स्‍त्रीयों के रूदन को तो सबने देखा है, वहॉं भी था, मगर पिता मोम के हृदय वाला भी पत्‍थर का बनते हुए अपने ऑंखो को सूखे रहने के लिए बेबस कर रहा था। ऑंखे कही उसका कहना न मानते हुए जलजल न हो जायें, घूप की परवाह किये बिना घूप ग्रहण करता रहा, दौडता रहा।
सब हकीकत जानते थे, फोन पर बात होगी, 4 महीने में अवकाश होगा, मगर जो पिता रोज कही से आने के बाद सबसे पहले चहकते हुए जिस फूल का दर्शन करता था, वह फूल वहॉं नहीं होगी। राजा हो, रंग हो, गरीब हो, अमीर हो संतान मोह से सब ग्रसित रहते थे, उसके पत्‍थर के ह़दय मोम से भी अधिक पीघले हैं।  उसे बस सकून रहता है कि जहॉं है स्‍वस्‍थ है, सुखी है।  वनस्‍थली जाने से पहले मैेने अनेको भ्रॉंतियॉं सुनी थी, मगर सारी की सारी गलत निकली। वैसे यह अटल सत्‍य है कि इस प्रवेश में मेरा कोई योगदान नहीं रहा। न फार्म भरवान में न तैयारी करने में न कागजो को तैयार कराने में, प्रवेश के लिए फार्म खुद उसने और उसकी और भाई चम्‍पू और उसके चचा प्रशान्‍त ने मिल कर भरा, और प्रक्रियाएं पूरी की। उसकी मॉं एवं उसके प्राइमरी पाठशाला के अध्‍यापक राजेश यादव, चन्‍द्रभान जी, एक अन्‍य लोगो के साथ उसके बाबा ने उसकी तैयारी कराई। और चयन के बाद गहमर के अधिवक्‍ता अशोक सिंह एवं  भदौरा के पत्रकार विवेक र्ऊ र्फ विक्‍की ने उसके सारे कागज तैयार कराये। चाचा विकास ने जाने से पहले उसे एक सैनिक की तरह तैयार किया, उसके हौसले को पत्‍थर की तरह मजबूत किया। बाकी आप सब के आशीर्वाद ने अन्‍य चीजो को पूरा किया, मैं किसी का धन्‍यवाद कर उसके महत्‍व को छोटा करना नहीं चाहूँगा
आज 4 दिन बीत चुके हैं, जब भी फोन किया जाता है एक सवाल पापा कब आयेगें, जी करता है अभी चल दूँ, मगर कुछ सोच कर शांत रह जाता हूँ कि कम से कम जिन्‍दगी की यह पहली जंग लडना तो सीख जाये। अपनी पहचान तो बना जायें।

अखंड गहमरी

शनिवार, 25 जनवरी 2020

गजगमिनियॉं और NRC

*हमारा नेता कैसा हो गजगमिनियाँ के जैसा हो*
तुम एक बेहुदा इंसान हो गये हो, दिमाग ठिकाने नही है? क्रोध में काँपते हुए मेरी बाइफ होम चीख पड़ी।
क्या हुआ जानेमन क्यों ज्वालामुखी की तरह फट रही हो?
कई हजार पतियों की आत्मा को अपने अंदर समाहित कर मैं साहस से बोल पड़ा।
मैं आगे कुछ बोल पाता उसके पहले एक अदद चरण पादुका राफेल की तफ्तार से मेरे चाँद से मुखड़े की बढ़ी, निशान और समय अचूक , मेरा मुखड़ा साफ। स्वर में सिंह का गर्जन लाते चीखी, मैनें कहाँ भेजा? स्टेशन न? बोला था न कि मेरे ससुर के समधी की बेटी की ननद की माँ के बेटे की पत्नी की माँ की बेटी आने वाली है जा कर स्टेशन से ले आना?
अरे! मेरी चन्दरमुखी मैं तो भूल गया। अरे मेरी जाने-जिगर अब मान भी जाओ। देखो इसमें मेरा कोई दोष नहीं।
तो किसका दोष है? मेरा?
अरे नहीं चुनमुनकी तुम तो दोष रहित, रहम दिल, प्यारी प्यारी मेरी लतमरूआ डार्लिंग हो।
ये किस किस चुड़ैलों का नाम ले रहे हो तुम? मेरा नाम भी याद नहीं। रूको बताती हूँ। तड़ाक -तड़ाक
हाय माँ , बचाओ बचाओ अरे मेरी ममता डार्लिग सब दोष तुम्हारे रमेश तिवारी जी का है, जो सुबह सुबह शहीनबाग लेकर चले गये।
चल भाग यहाँ से वह गरजते हुए बोली, और दौड़ कर जल्दी से शिवगतिया साव का रसगुल्ला ले कर आवो।
जिसको लाने गये थे वह आ चुकि है।
जैसी आज्ञा सरकार की, मैं यूँ गया और यूँ आया। दर्द को मुस्कान में छुपा कर बोलना पड़ा।
आप तो मेरी पीड़ा समझ ही रहे होगें? समझ रहे हैं न?
ये लो पैसे और पूरा हिसाब देना। जाकर उस कलमुँहे संतोष को पान के पैसे मत दे देना, बहुत पान खाते हो।
अब जाओ मुँह मत देखो।
चलो भाई गहमरी , जान बची तो लाँखो पाये। चल दिया मैं बाजार की तरफ , अभी दस कदम ही गया था कि
ट्रीन-ट्रीन मेरा मोबाइल बज उठा।
नम्बर देख कर तो मेरे पैर जमीन से दस फीट ऊँचे उठ गये।
आप तो समझ ही गये होगें फोन किसका था?
बिल्कुल सही समझा फोन मेरी जाने जिगर, मेरी लखते जिगर, मेरी सूरज मुँखी, मेरी चनर मुखी, दिल की रानी, मेरी दिवानी, बहुत सयानी *मेरी पूर्व प्रेमिका नम्बर वन गजगमिनियाँ का था*
हैलो डियर
इलू इलू इलू इलू
उधर से जो जबाब मैं उसको शब्दों में बयां नही करता।
बस दो मिनट में पहुँच मैने उसे आश्वासन दिया।
अब यो मेरे कदमों ने अग्नि, पृथ्वी और राफेल के चाल को भी फेल कर दिया।
उसके घर के बाहर की खुशबु की मेरा रोम रोम महक उठा।
हाय पीछे से एक तेज आवाज के साथ मेरे पीठ पर थपकी पड़ी।
मैं पीछे मुड़ कर देखा और देखते भाग लिया जैसे कोई भूत मेरे सामने आ गया हो।
डरे डरो मत मैं ही हूँ तुम्हारी गजगमिनियाँ, उसने नकाब उठाते हुए हँस कर कहा।
तुम और इस वेष में?
हाँ आज मुझे चुनाव प्रचार करने शहीनबाग जाना है न, त़ो ऐसे जाना होगा।
खैर छ़़ोड़ो ये सब, तुम नहीं समझोगे मेरे सावरे बलम।
बस जल्दी से मेरे साथ चलो।
मरता क्या न करता हाथो में हाथ डाले चल पड़ा।
जानते हो मेरे लतखौक मतलब मुसलमान किसी से नहीं डरते वह अपने ऊपर अन्याय बर्दाश्त नहीं करते है।
हाँ जानता हूँ मेरी धमकियां।
क्या जानते हो ?
यही जानता हूँ कि वह कितने निडर हैं। निडर सद्दाम निडर लादेन बंकर में, गद्दाफ़ी को पुलिया में छुपे थे।
फालतू की बात मत करो वह थोड़ा गरम हुई।
गरम मत हो प्रिय अभी तो आगे सुनो इनकी वीरता।
ईदी अमीन को महिला के वेश में सऊदी, रोहिंग्याओं को वर्मा से , ISIS को बुर्के मे भागते देखा है। नियाजी सरेंडर करते हुए सुना है। जाकिर को मलेशिया में छिपा और न जाने कितने मुल्ले आतंकवादीयों को पहाड़ो व अन्य जगह छुप कर निर्दोषो पर वार करते देखा है। ये वीरता नहीं तो और क्या है? ये डर नहीं तो और क्या है?
कहते हुए मैं गजगमिनियाँ की तरफ डर से देखा जो मेरी बातों को हवा में उड़ते हर आने जाने वाले अंजान बेगाने को झुक कर सलाम कर रही थी। आज तो उसका रूप देख कर सियार भी शर्मा रहा होगा।
तुमको जो बोलना है बोलो मेरे सावरेबलम मगर मैं तो आज यही जानती हूँ कि मुसलमान डरते नहीं झुकते नहीं।
सरकार को हर हाल में कैब और एनआरसी वापस लेना होगा , हम कोई कागज नहीं दिखायेगें।
हा हा हा हा कागज होगा तो दिखाओगी न। देख लो जिनके पास है वह सीना ठोंक कर हैं।
तुम भी सठिया गये हो, किसके पास पुराने कागज होगें।
देख मेरी झुनझुनियाँ पहले दोनो बिल के अन्तर को समझो तब बोलो ।
हमें कुछ नहीं समझा, बस कागज नहीं दिखायेगें तो कागज नहीं दिखायेगें, देखती हूँ मेरे भाईयों को कौन भगाता है,?
अरे यार कौन किसको भगा रहा है।
कागज कागज कागज
अरे कागज तो घुसपैठियों को अलग करने को माँगा जा रहा है। वो तो दिखा देना चाहिए।
बिल्कुल नहीं।
तब चिल्लाओ वैसे ही जैसे कहते हो लाल किला, कुतुबमीनार, ताजमहल हमारा है, हमारे बाप दादाओ ने बनवाया है।
मतलब क्या है तुम्हारा? उसने घूरते हुए कहा।
देखो देखो क्रोध से तुम्हारे चेहरे की लाली तुम्हारी सुंदरता में 11 चाँद लगा रही है।
भागते हो कि नही, उसने हल्का शर्माते हुए कहा।
अच्छा मतलब बताओ क्या चाहते हो..हम लालकिले और ताजमहल का कागज दिखायें?
बिल्कुल यदि तुम्हारा है तो कागज दिखाओ। देखो हमने काश्मीर का कागज दिखा कर ले लिया, 5000 साल पहले बने राममंदिर का इतिहास, प्रमाण और कागज दिखा कर ले लिया। तुम कहते हो कि 50 साल पहले का कागज नहीं है।इसका मतलब है कि तुम घुसपैठिए हो। साँच को आँच.अभी मेरे पूरे शब्द निकले ही नहीं थे कि
अच्छा बंद करो अपनी ये जुबान आ गये शहीनबाग।
तभी उसके पास कई महिलाएं दौड़ आई जो बड़े सम्मान उसे मंच पर ले गई। पूरे मतचमिश मिनट तक वो क्या क्या बोली में समझ में कुछ नहीं आया मगर गर्व तो इस बात का है कि उसकी हर बात पर खूब ताली बजी और हर बार एक स्वर गूजँता, हमारा नेता कैसा हो गजगमिनियाँ के जैसा हो।
कार्यक्रम समाप्त हो चुका था, उसके साथ साथ मेरा भी गदहे का जन्म छूँट चुका क्योंकि आशा थी हर अखबार में मेरी भी फोटो छपेगी। सब से निपटकर वह मेरे पास आई दूर से फ्लाइंग किस उड़ाते बोली, चलो मटमिटिया डार्लिंग घर चलते है, भाषणा सफल रहा , रास्ते में शिवगतिया साव का रसगुल्ला खाते हैं। रसगुल्ले की बात सुन कर मेरे इश्क का भूत उतर गया, मैने जेब की तरफ देखा तो जैसे लगा कि अंदर पड़ा 500 का नोट बोल रहा हो..बेटा अखंड गहमरी तुम नहीं सुधरेगा। आज तो तेरी बाँट लगेगी। मैं अब कर भी क्या सकता था। गजगमिनियाँ के हाथो में हाथ डाले शिवगतिया के दुकान पर रसोगुल्ला खाने पहुँच गया । उसके बाद तो आज मेरी वाइफ होम रसगुल्ले के साथ साथ उसके माँ-बापको भी निकालेगीं।।। जरा आप अखंड गहमरी की सलामती की प्रार्थना करें। बाकी तो आज पत्नी से पिटने का आनंद मुझे हस कर लेना ही होगा।
*अखंड गहमरी*

मंगलवार, 14 मई 2019

क्‍या केवल मतदाताओं को रिझाने के लिए गहमर के सैनिको का सम्‍मान किया जा रहा है ?

लोक सभा चुनाव 2019 और गहमर द्वितीय भाग-:
अब तक आपने पढ़ा
2019 लोक सभा चुनाव के परिपेक्ष ...................................देखते हैं हकीकत की तस्वीर।।।
आगे पढे़
गाजीपुर के पूर्व सांसदो ,वर्तमान सांसद रेल राज्‍यमंत्री/दूर संचार मंत्री औरभारत प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से  लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी तक ने कितनी बार गहमर के सैनिको की तारीफ कर चुके हैं यदि‍ अखंड गहमरी रख पाता तो वह भी कही लाल नीली बत्‍ती में होता न कि घर में बैठ वाइफ होम की सेवा में मगसूल रहता। आज मैं गहमर के बारे में एक और भ्रम तोड़ना चाहता हूँ। वह यह कि यहॉं के नौजवान केवल सेना में नहीं बल्कि देश की कोई भी ऐसी सुरक्षा एजेन्‍सी नहीं, भारत का कोई ऐसा राज्‍य नहीं जिसकी पुलिस में गहमर के दर्जनों नौजवान कार्यरत न हो। गहमर के वीरता के इतिहास की बात अगर मैं वर्ष 1535 से करूँ तो दो बाते समाने होेगीं पहली की आप पढ़ न सकेगें दूसरे मेरी लेखनी किसी न किसी के योगदान को छोड़ने के कलंक से कलंकित भी हो जायेगी।
इस लिए मैं शुरूआत करता हूँ प्रथम स्‍वतंन्‍त्रता संग्राम सेनानी वीर मैगर सिंह से जिनके वीरता का खौफ अंग्रेजी हूकूमत में इस कदर था कि उनके गहमर आगमन की सूचना मात्र से रात में अंग्रेज अधिकारी अपनी जान की परवाह न करते हुए गंगा नदी मे कूद कर अपनी जान बचा कर भागने पर मजबूर हो गये, प्रथम स्‍वतंत्रता संग्राम में हिस्‍सा लेने वाले मैगर सिंह अकेले नहीं थे उनके साथ दर्जनों गहमर के नौजवान थे। प्रथम विश्‍व युद्व से लेकर द्वितीय विश्‍व युद्व तक गहमर के 219 सैनिक शहीद हो चुके हैं। द्वितीय स्‍वतंन्‍त्रा संग्राम आन्‍दोलन की कोई ऐसी मुख्‍य या गुमनाम धारा नहीं जिसमें गहमर के वीर न रहे हो। चाहे गहमर डाकघर, रेलवे स्‍टेशन, पुलिस स्‍टेशन जलाना हो, या अंग्रेजो को शासन हटा कर अपना शासन 42 दिनो तक करना हो, यहॉं के नौजवानो ने किया।
(समस्‍त आन्‍दोलनकारीयों का नाम पिता का नाम व पटटी लिखना संभव  नहीं हैं, जो चाहे उसे उपलब्‍ध हो जायेगा, मेरी अप्रकाश्तिा पुस्‍तक गहमर दिगदिर्शका में सबका नाम है)आजादी के बाद भी गहमर के सैनिको का सिलसिला थमा नहीं। गहमर की इस वीरता को देखते हुए वर्ष 1989 तक गहमर के पंचायत भवन पर विशेष सैनिक भर्ती गहमर के लिए आती थी, जिसे रैली भर्ती शुरू होने के बाद बंद कर दिया गया।
वीरता के नित्‍य नये दिन आयाम रखने वाले गहमर को आखिर हकीकत के धरातल पर मिला क्‍या ? आज यह प्रश्‍न मैं रेल राज्‍यमंत्री मनोज सिन्‍हा के सामने रखना चाहता हूँ। मनोज सिन्‍हा के समझ इस लिए रखना हूँ क्‍योंकि गहमर ने हमेशा मनोज सिंन्‍हा के मान सम्‍मान की रक्षा की है, वह यदि चुनाव हारें भी हैं तो कभी गहमर में उनके मतो का प्रतिशत कम नहीं रहा है। आज सेना के नाम पर गहमर को अपने लक्षेदार बातो में उलझाने वाले इन सांसदो ने गहमर को दिया क्‍या ? गहमर को इन नेताओं से सुविधा लेने की बात मैं इस लिए हक से करता हूँ क्‍योंकि ये मत मॉंगते हुए गहमर के इतिहास को दुहरा कर गहमर के मतदाताओं को संवेदनाओं से खेलते हैं। आज यहॉं का नौजवान सीमा पर तैनात है मगर घर में जब उसकी बीबी, उसके बच्‍चे, उसके मॉं-बाप बिमार होते है तो वह तड़पने को मजबूर होते हैं क्‍योंकि एक सुविधा जनक चिकित्‍सालय गहमर में नहीं हैं। वह पड़ोसीयों की दया पर, अपने रिश्‍तेदारो की सहायता से गाजीपुर या बनारस पहुँचने का प्रयास करते है, ताकि वह अपना जीवन बचा सके, उनके ऑंखो में अश्‍क होते हैं मगर न वो कुछ कर पाते हैं और न देश की सीमा पर या अपने गॉंव से मीलो दूर अपने या किसी अन्‍य राज्‍य की पुलिस में तैनात उनका सिपाही बेटा, पति या पिता कुछ कर पाता है। वह लाचार होकर बस समय का इन्‍तजार करता है और मॉं कामाख्‍या से विनती करता है कि उसके परिवार को वह सुरक्षित रखें।
आज गहमर के सैनिकों के पास अपने रेलवे स्‍टेशन से भारत की किसी सीमा पर जाने की सीधी ट्रेन नहीं हैं, वह मीलों चल अन्‍य स्‍टेशनो पर जाकर देश की सीमाओं की तरफ जाने वाली ट्रेने पकड़ते है, गहमर रेलवे स्‍टेशन पर पार्सल की सुविधा न होने से वह अपने आवश्‍यक सामान, बक्‍सें लेकर कैसे यात्रा प्रारंभ्‍भ करते हैं ये तो सैनिको का दिल ही जानता होगा, मुझे तो बस लेखनी चलानी है। जब गहमर में बात सीमा पर जाने वाले ट्रेनो के ठहराव की बात होती है तो हमारे मंत्री जो गहमर के सैनिको की तारीफ करते नहीं थकते बडी आसानी से कह देते हैं कि एक ट्रेन के ठहराव में कितनी परेशानी आती है आपको नहीं पता, और वही मंत्री दूसरे दिन जाकर जनपद के विभिन्‍न भागों में ट्रेनो का ठहराव देते है, और जब सब खत्‍म होने को होता है तो मगध एक्‍सप्रेक्‍स जैसी ट्रेन का ठहराव कर अपना सीना ठोक लेते हैं।  गहमर के लोगो ने गहमर में सैनिक स्‍कूल की मॉंग उठाई थी, जिससे सैनिको के बच्‍चे अपने गॉंव में ही अच्‍छी शिक्षा ग्रहण कर सेना में जा सके, वर्ष 2001 के दशक में माननीय अटल बिहारी वाजपेई जी की सरकार में भी यह मॉंग उठी, मगर किसी को सुनाई नहीं दी, उसके बाद से हमेशा गाजीपुर का र्दुभाग्‍य रहा कि केन्‍द्र में जिसकी सरकार बनी हमारा सांसद उसका विरोधी ही था, मगर इस विरोधी खेमें में भी एक सांसद राधेमोहन सिंह ऐसा सांसद हआ जिसने जनता की कसौटी पर खरा उतरने का पूरा प्रयास किया, बहुत कुछ किया परन्‍तु वह भी गहमर में सैनिक स्‍कूल की मॉंग को पूरा न करा सका। माननीय सिन्‍हा जी के आगमन के बाद मोदी के सराकर बनने और गाजीपुर जनपद के मंच से बार बार गहमर का नाम लेने के बाद आशा बनी कि गहमर में सैनिक स्‍कूल खुलेगा, मगर चर्चा तक न हुई। गहमर के युवाओं के लिए आने वाली विशेष भर्ती को दुबारा चालू करने का पूरा प्रयास राधे मेाहन सिंह द्वारा किया गया मगर वह असफल रहें, मगर इसका प्रयास बार बार सैनिको का नाम लेकर गहमर को संबोधित करने वाले मोदी सरकार और इनके मंत्री द्वारा कोई प्रयास माननीय द्वारा नहीं किया गया, और यदि किया गया तो क्‍यों नहीं पूरा हुआ जबकि सारा कुछ इनका ही था।

यही नहीं गहमर के वीर आन्‍दोलन कारीयों के नाम पर जिससे दुनिया जानती है न गाजीपुर जनपद में किसी स्‍मारक, पुल, सड़क,  ईमारत का नामकरण किया गया, न डाक टिकट जारी किया गया और न ही इनके नाम पर रेल व्‍यवस्‍था में किसी ट्रेन का नामकरण किया गया।
आज यह सैनिको का नाम लेकर गहमर को संबोधित करने वाली सरकार न गहमर के सैनिको को अच्‍छा स्‍वास्‍थ दे सकी, न शिक्षा दे सकी और न ही उसको सीमा पर जाने का संसाधन दे सकी, तो किस बात की तारीफ, किस बात का संबोधन। क्‍या केवल मतदाताओं को रिझाने के लिए गहमर के सैनिको का सम्‍मान किया जा रहा  है ?

यह मेरा लेख किसी दुभावना से प्रेरित नहीं है, मैने वही लिखा जिसको मैने अपने 2001 में 21 साल की उम्र से पत्रकारिता ज्‍वाइन करने और 2014 में छोडने के बाद तक कई बार समाचार पत्र में प्रकाशित कराया। 
क्रमस: जारी
आगे पढे गहमर के साहित्‍यकारों पर सरकार की भूमिका।
अखंड गहमरी।

मंगलवार, 19 मार्च 2019

हाेली में पीट दिया मेरी पूर्वप्रेमिका गजगमिनियॉं ने मुझको।

उठीये मेरे पति परमेश्‍वर सुबह हो गई। अब तो ऑंखे खोलीये। ऐसी कुछ प्‍यार भरी आवाज मेरे कानो में जा रही थी। मैं मंद-मंद मुस्‍काता हुआ बिस्‍तर पर करवट बदलते हुए इस आवाज का सुख ले रहा था, जो अब शायद कभी सुनने को नहीं मिलती। मेरे सर ने माथे पर एक हल्‍की चपत का एहसास किया तो मेरी नींद खुल गई। सामने अपनी वाइफ होम के हाथो में चाय का प्‍याला देख कर मुझे अजीब लगा। मैंने पहले तो अपने शरीर पर चिकाेंटी काट कर स्‍वपन न देखने की पुष्‍टी किया। फिर खिड़की खोल कर यह देखने की चेष्‍ठा किया कि आज सूर्य देव कही पश्चिम दिशा से तो नहीं निकल पड़े, मगर वो भी अपनी सही दिशा से थे। मैंने अपने वाइफ होम के सिर पर हाथ रखा कि कही उसे ज्‍वर तो नहीं जिससे वह आज सुबह सुबह प्रेम की भाषा बोलते हुए मेरे लिए चाय का प्‍याला लेकर आ गई।
तभी अचानक मुझे अखंड गहमरी का वो शेर याद आ गया कि
सुबह उठ कर कभी वो प्‍यार से बोले समझ लेना
अभी तुम को लगा मक्‍खन, चलो झाडू लगाना है।।
 इस चाय के पीछे कौन सा राज छिपा हुआ हुआ हैं, लब खोलो, कुछ बोलो, तुम्‍हारी कसम मेरे दिल में तुफान आ गया है। मैं ने उसे प्‍यार से कहते हुए उसके चरणो में अपना सिर नवा बैठा और उसके मुँख से निकलने वाले आशीर्वाद रूपी बचन की प्रतिक्षा करने लगा।
उसने बड़े प्‍यार से मिला सर अपने हाथो से दबाते मेरे खडखडिया बलम इस बार होली में माइके जाने जाना हैं, अपनी तैयारी करो, रिजर्वेशन कराओ* सीधा प्रेम की चासनी में डूबा हुआ हिटलर साही फरमान सुना अौर मैं अपना दिल लेकर बैठ गया।
मैं अब सीधा अपनी तैयारी कैसे करूँ सोचने लगा क्‍योंकि उसके मुहँ से निकले शब्‍द तो पत्‍थर की लकीर होते हैं, बदलने की हिम्‍मत देवो में नहीं तो फिर मैं तो आम मानव हूँ, कैसे बदल सकता हूँ, फिर भी एक प्रयास किया, मैने अपने आराध्‍य देव डा0 रमेश तिवारी जी को फोन लगाया कि हो सकता है हनुमान की भूमिका में आकर मेरी वाइफ होम को कुछ समझा सकें, क्‍योकि शहर न सही प्रांत तो एक ही है, कुछ तो राशि मिलेगी ही, परन्‍तु नतीजा सिफर ही निकला।
मगर आप हकीकत मानीये यह तो मैं दिखावे के लिए कर रहा था, खुशी तो मुझे भी होली में ससुराल जाने की बहुत थी। साली, सरज के साथ के साथ रंगो की ठेला-ठेली, और फिर मेरी पूर्व प्रेमिका गजगमिनियॉं भी तो आज कल वही थी, अपने शहर में, उससे मिलने का भी सुनहरा अवसर मेरी वाइफ होम ने प्रदान कर दिया था।
मेरे दहेज में मिली चार चक्‍के की गाड़ी अब खटारा हो चुकी थी, मैैनें बार बार अपनी सासूँ मॉं से कहा कि आपका दिया दो प्रोडेक्‍ट खराब हो गया है, बदल दें, मगर एक ही जबाब मिलता , हैंडिल विथ केयर नहीं होगा तो यही हाल होगा। मैं एक खटारा प्रोडेक्‍ट को छोड कर दूसरे प्रोडेक्‍ट को लेकर लौ पथ गामिनी विश्राम स्‍थल की तरफ प्रस्‍थान कर गया। भारतीय परम्‍परा के अनुसार अपने निर्धारित समय से मात्र दो घंटा विलम्‍ब से मेरी लौ पथ्‍ज्ञ गामिनी कनघरियापुर रेलवे स्‍टेशन पर पहुँची, इतने देरे में मेरी वाइफ होम ने जाे तांडव मचाया कि कनघरियापुर रेलवे स्‍टेशन पर तैनात लौ पथ गामिनी विश्राम स्‍थल सरंक्षक साधु यादव भी डोल गये, जय श्री राम बोल गये। गिरते पडते हम आखिर पहुँच ही गये अपने सबसे बड़े तीर्थ स्‍थल टटमरियापुर जक्‍शन। एक गदहा खड़ा, उसकी सवारी कर हम उस मंदिर में प्रवेश किये जिस मंदिर से एक गौ जो अब शेर से भी अधिक खतरनाक है लेकर मैं निकला था।
सुबह ही होली का पवित्र पावन त्‍यौहार था, मैं चारो तरफ अपने कान दें कर सुनने की कोशिश कर रहा था कि शायद कहीं होली पर होने वाले फाग गीतो काे जलसे की अावाज आ जाये, मगर मेरे कानो को दूर दूर तक वह आवाज सुनने को नहीं मिली, दूर दूर तक कही, ढोल मजीरे की आवाज सुनने को नहीं मिली, मगर मैं चुपचाप बैठ जाऊँ ये तो हो नही सकता था।
सुबह होली का त्‍यौहार, मैं ससुराल में और सब शांत रहें ऐसा अगर हो जाये तो फिर अाप में और मुझमें फर्क ही क्‍या रह जायेगा।
बीस वर्ष पुराना दामाद ससुराल पहुँचा था, कुछ विशेष की आशा करना तो बेकार ही था,  एक मिठाई के साथ पानी पी चुका था, अब पेट पूजा की तैयारी थी, अागे खाना पड़ा था, एक सब्‍जी, एक दाल, दही, पापड,धी आचार और सामने डिस्‍को डानियॉं के रूप में साली और सरज पानी का जग और गिलास रख कर पीछे मुडी ही थी कि मैने दाल, सब्‍जी, दही से उनके गोरे गोर शरीर को मटमैला कर दिया, और उनके मुँंख की जगह उनके सिर  जग और गिलासो के पानी से पवित्र कर दिया। मचा हंगामा, दो मेरी तरफ ऐसी दौड़ी जैसे फ्रॉंक पहने वाली अवस्‍था में तितलियों की तरफ दौडती थी । मैं बच कर भाग, लेकिन घपतालिस  कुन्‍तल पडतालिस किलो ततियालिस सौ ग्राम की अपनी दोनो आधी घर वालीयों और अपनी अपनी वाइफ आउटर यानि साले की बीबी ने जो मेरी चटनी बनाई, मेरे शरीर का रोम राेम* आईहो दादा, आईहो माई* चिल्‍लााने लगा।
नींद तो दर्द के से दूर थी मगर उस में भी एक खुशी थी एक सुख था साली और सरजह से पिटने का सुख जो आप तो कभी पा ही नहीं सकते क्‍योकि आप तो ठहरे शहर के बड़े प्र‍िष्ठित आदमी, आधुनिक जमाने के माानव, रिश्‍तों के सुख काे अभद्रता का नाम देकर, बकवास की श्रेणी में रहते हुए महिलाअों की मान सम्‍मान की बात करते हैं, और मैं तो इसे सूली पर चढा देता हूंँ।
रात तो जैसे तैसे बीत गई, सुबह की कल्‍पना करते करते रात बीत जाने की दुआ कर रहा था, मगर न  ये रात बीतने का नाम नहीं ले रही थी और मेरी मंदिर के अन्‍दर से आने वाली आवाजे खत्‍म होने का नाम ले रही थी। सुबह गजगमिनियॉं से मिलने के स्‍वपन देखते देखते न जाने कब ऑंख लग गई।
ऑंख तो तब ख्‍ुाली जब मेरी वाइफ होम के परम पूज्‍य गदहे भाई के शरीफ औलाद ने मेरे ऊपर घडो का पानी फैक अपनी तोलती आवाज में बोल बैठा पूपा जी पूपा जी बुल्‍ला न मानो लोली है।
मैं ने उठते हुए उसकी मॉं को लेकर एक सुन्‍दर, सलीके दार शब्‍द का प्रयोग किया और दोडा कर गोद में ले लिया।
अभी उसे गोद में लिया ही था कि
चारो तरफ घंटिया बजने लगी, फि़जा में एक अजीब सी खुशबू फैलने लगी, सूरज छिपने लगा, फूल खिलने लगें, मैं समझ गया कि मेरी पूर्व प्रेमिका गजगमिनियॉं कही पास आ ही है। मैं चारो तरफ ऐसे देखने और भागने लगा जैसा जैसे कस्‍तूरी की तलाश में मृग, तभी मेरे नजर एक पेड़ की तरफ गई उसके पीछे एक काले परिधानो में सजी एक सुन्‍दर काया नजर आई आयी,मैं उधर भागा।
तभी मेरे पीठ पर एक जोरदार प्रहार हुआ, मैं कुछ समझ पाता उसके पहले ही आवाज सुनाई दी,
कनतालिस घंटे हो गये तुम्‍हें आये कहॉं थे अभी तक। अपना सिर उठा कर देखा तो हाथ में बिलतालिस नम्‍बर की सेंडल लिये मेरी गजगमिनियॉं मेरे सामने थी। चेहरा दूध की तरह सफेद, गालो पर लाली, मैं तो बाग बाग हो गया
मैं पहले तो झुक उसके चरणो में अपना प्रणाम निवेदित किया, वह हँसते हुए बोल पड़ी तुम नहीं सुधरो के मेरे लभोरनदास, उसकी हसी और बाते सुन कर मेरा दिल फुटबाल की तरह कूदने लगा। उसकी घडकन बढने लगी
मेरा दिल उसके दिल से मिलने को बेताबा होने लगा। मैंने धीरे से कहा कैसी हो। बस कट रही हैं जिन्‍दगी उसने जबाब दिया। मैं सहम उठा। क्‍यों मेरे खटछोडन डीयर ऐसी उदासी क्‍यों, कुछ नहीं बस ऐसे ही।
मैं तो तुम्‍हारे साथ होली खेलने उतनी दूर से चला आया और तुम हो कि ऐसी उदासी से बोल रही हो।
तब खेले न होली, मगर खेलोगे कैसे अब तो तुम आध‍ुनिक हो गये हो। होली याद भी  है कैसे खेली जाती है, मुझे तो नहीं लगता, उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा।
पागल हो गई हो क्‍या गजगमिनियॉं खोली खेलना भी कोई भूलने की चीज है, पानी में रंग डालो सब पर फेंको, सबको रंगो हो गई होली ।
वह जोर से हसी उसकी जोर की हसी से पूरा बाग थररा गया ऊपर के पेड पर लटक रहा एक सिरफल टूट कर सीधे मेरे सर पर गिरा, मैं सर पकड़ कर बैठ गया।
मेरे बैठते ही वह पेरशान अपने हाथो को मेरे सर पर रखते हुए बोली तेज चोट लगी क्‍या, मैं ने भी उसी तेजी से जबाब दिया नहीं  जी, फूल की बातो से गिरे फूल से भी किसी को चोट लगती है क्‍या, वह तो मुझसे प्रेम करने आया था, और प्रेम के निशान में सिर पर एक जख्‍़म दे गया ताकि मैं उसे याद रखूँ।
तब तो कोई बात नहीं ऐसे यह  सिरफल बहुत हिम्‍मती है, जो मेरी मौजूदगी में भी तुमसे प्‍यार करने चला आया, उसने उस सिरफल को हाथ में उठाते हुए कहा।
चलो अब यह सिरफल गिर ही गया तो इसको भी तोडते हैं रस निकलाते हैं और तुमको पिलाते हैं।मैने बुरा सा मुहँ बनाया। क्‍यों तुमको अच्‍छा नहीं लगता। आेह आज के लोगो को सिरफल नहीं अंगूर की रस पंसद हैं, जौ का रस पंसद है। सही न और उसमें भी आज तो होली हैं, रंग अबीर की जगह मॅास-मदिरा का त्‍यौहार
उसकी बाता सुन कर बिना हाथ दिये चौराहे पर मुड़ते मोटसाइकिल चालक की तरह घूम गया लेकिन कर क्‍या सकता था, बोलने की हिम्‍मत तो थी नहीं।इस लिए मुस्‍कुरा पड़ा। छोड़ो जी ये बाते और प्‍यार की बातें करें कुछ आज होली है हँसते हैं मुस्‍कुराते हैं।
वह ताव में गा गई। प्‍यार, हसंना, होली खेलना पूरे जंगली हो क्‍या, मेरे कनसूटिया प्रेमी
मैं आज उसकी बातो को समझ नहीं पा रहा था आखिर क्‍या हो गया था उसको, मेरी तो औकात नही थी जो उससे सीधे पूछ देता, क्‍योंकि एक तो उसके हाथो में वही सिरफल था जो कुछ देर पहले मेरे सर से प्रेम चुका है दूसरे उसके पॉंवो में बेहतरीन चप्‍पल, जो कभी भी मेरे गोरे, लाल , मक्‍खन से मुलायम गालो से प्रेम कर जाते।
फिर भी जो मार से डर जाये वह मैं क्‍या। रमेश तिवारी का जी का नाम लिया और कूद गया आग में और पूछ बैठा मेरी अठलिनियॉंं बताओं आखिर बात क्‍या है, इस होली में तुम्‍हारे चेहरे और शब्‍दो का भाव बिगडा क्‍यों है।
कुछ नहीं, वह उदासी से बोलती, आओ चलते है उधर बैठते है। मैं उसके पीछे पीछे चल पड़ा और वह जैसे यादो की दुनिया में खाे गई, उसने मेरा हाथ अपने हाथो में लेते हुए बोली, याद है खड़खडीयॉं होली का वो रंग जो महीनो नहीं छूटता था। महीनो ढोल, तासा, मजीरे की आवाज कानो  में गूँजती थी।
मैं कुछ धीरे धीरे समने लगा था उसकी उदासी का कारण
मगर मैं कुछ बोल तो सकता नहीं था, इस लिए उसकी बातो को चुपचाप सुनने लगा, और उसकी उदासी में भी हँसी का तड़का लगाने लगा, हॉं मेरी गलछोडी डीयर सब याद है, कैसे कूदती थी दिवारो पर चढकर तुम, जैसे हिरनी। मेरी बात सुन कर वह कुछ शर्माई।
कुछ सकुचाई। हॉं और तुम भी तो कम नहीं थी, मेरे बाबा को भॉंग पिला कर  दादी को सोते हुए  खटिया सहित उठा कर होलिका दहन पर ले जाकर गिरा दिये और उनकी खाट को होलिका में फेंक दिये, जब वह गाली देने लगी तो बाबा के हाथ में रंग भरी बाल्‍टी दे दे दिया बाबा ने भी बुरा न मानो होली है कहते हुए  दादी को नहलावा दिये। दादी का सारा गुस्‍सा और खटीया जलने का दर्द भूल कर शर्माती हुई वहॉं से तुम को गाली देते घर चली आई। वह रात तो हसते हसते बीती।
हॉ याद है, मगर डीयर वो बातें कहॉं अब, मैने भी अंग्रेजी शब्‍द का प्रयोग किया।  पता ही नहीं चला हम दोनो चलते चलते कब पास की एक  बस्‍ती की तरफ आ गये। मेरी निगाह जब उस बस्‍ती की तरह गई तो मैनें गजगजिनियॉं से कहा मेरी दतखोपड डीयर ये हम लोग कहॉं आ गये, इस बस्‍ती में तो होली के दिन भूल के भी नहीं आता कोई।
क्‍यों उसने कहा
याद नहीं है इस बस्‍ती की होली
घरो के दिवारो पर चढ कर कही युवा तो कही बच्‍चे भाभीयों पर रंग डालने के कैसे कैसे हथकड़े अपनाते हैं, तो कही भाभीयॉं छत के कोने से देवरो पर रंग डालने के लिए कूद फॉंद करती है।
होली गाने वालो की टोली जिसको पकड़ लेगी वह दिन भर कही का नहीं रह जायेगा ।
भागो यहॉं से।
वह जोड से हस पड़ी अरे मेरे लतखोर बलम ये तो कही पर खडे बच्‍चे ऊपर से रंग डालते तो कही शराब के नशे में घूमते लोग दिखाई दे रहे हैं। अब वो बातें अध्‍याय बन चुकी हैं।
अब होली एक त्‍यौहार नहीं एक मजूबरी बन गई हैं, त्‍यौहार तो कब का मर चुका हैं, अब तो होली पर
शेववाटर के जुमले सुनाई देते है।
मैने कहा ऐसी बात नहीं हैं, अभी भी हम होली खेलते हैं, पकवान बनाते है कहॉं कुछ बदला है मेरी फुलझरी, मैने मजे लेने के लिए बोला,।
चटाक चटाक दो झापड मेरे गाल पर उसने रसीद कर दिये, तुम्‍हें दिखाई नहीं देता या तुम अंधे हो
लात खाने की आदत तुम्‍हारी नही जायेगी कहते हुए वह गुस्‍से से काप गई।
अब न हम होली खेलते हैं न होली मनाते हैं, हम तो बस आध्‍ुानिकता का चादर ओढ कर अपनी सभ्‍यता अपने संस्‍कारो को भूल कर, सुख की खाल पहनते हैं।
तेज चोट लगी क्‍या, उसने अपने गुस्‍से को नीचे कर मुझसे पूछा, नहीं चोट नहीं लगी,ऐसे लगा जैसे कोई फूल गालो से टकराया हो, मैने जबाब दिया।
चलो तब ठीक है, उसने धीरे से कहा।
ये बताओं की अब तुम्‍हें कही रिश्‍तो की मिठास दिखाई देती हैं, देवर-भाभी की हँसी मज़ाक, जीजा-साली की चुलह, ननद-भौजाई का वह रिश्‍ता, नंनदोसी-भौजाई का रिश्‍ता या फिर साले सरहज का रिश्‍ता।
मुझे तब तो अब हर रिश्‍ता अंकल-आंटी, पर सिमटता दिखाई देता है।
मिठाथ की जगह थोथा सम्‍मान दिखाई देता है। समय की कमी के भूत पर विलासिता के ताक पर रखा हुआ अंहकार दिखाई देता है।
वह एक सास में बोल गई।
हा गजगमिनियॉं से बात तो सही कर रही हो, मैने चेहरा घुमाते हुए कहा।
अब तो रिश्‍तो के हसी मजाक असम्‍भ्‍यता की निशानी बन गये हैं। बच्‍चों को रिश्‍तो के नाम और अहमित की जगह हम केवल अंकल -आन्‍टी बता कर खोलता आदर्शवाद सिखा रहे है।  त्‍यौहारों को बस नाम पर ठो रहें है, और अादर्श केवल बयानो में सुन और लेखनी में पढ रहे हैं।
मेरा इतना कहना था कि मेरे सिर पर एक जोरदार प्रहार हुआ मैं गिर पड़ा मैं कुछ समझ पाता इसके पहले गजगमिनियॉं मेरे सीने पर सवार हो गई। हाथो में लिये रंग को मेरे पूरे चेहरे पर मलते हुए कहा कि यही बात तभी से समझा रही हूँ, सोच रही हूँ, कहॉं गया था तुम्‍हार दिमाग, घास चरने।
मैं ने करवट बदला उसे नीचे गिराया मगर वह संभल चुकी थी और सीधे समाने की तरह दौड पड़ी, मैने उसे पकड़ा और बुरा न मानो होली है कहते हुए पास के तालाब में फेंक दिया, वह तालाब आज सूना पड़ा था, कभ्‍ाी इस तालाब के किनारे कही युवाओं का तो, कही बूढो तो कही बच्‍चों का झुन्‍ड होली के दिन रंग झुडाता दिखाई देता, तो किसी कोने पर महिलाएं अपने रंग को छुडाते हुए अपने नंदोई और देवरो को गालीयॉं सुना रही होती थी।
तालाब ने मेरी तरह देख कर पूछा कहों साहित्‍यकार साहब कैसे हो, आज तो मुझे सुना देख कर तुम्‍हें आभास हो गया होगा कि तुम अब सभ्‍य समाज में जी रहे हो, आधुनिक हो गये हो, तुम्‍हारे बच्‍चे उन सब से दूर हो गये हैं, जिनके पास तुम रहा करते थे।
अच्‍छा है न तुम्‍हारा ये सम्‍भ्‍य एकल समाज, जहॉं तुम्‍हारी खुशियाें का दायरा छोटा अौर सिमटा हैं, त्‍यौहारो की मौलिकता, खत्‍म हो चुकी है।
मैं उस तलाब के सवाल के जबाब के बारे में कुछ सोचता मगर तभी पीछे से आकर मेरी साली और सरहज ने एक लात लगाते हुए कहा कि हम इनको चारो तरफ खोज रहे हैं और ये यहॉं छुपे हुए हैं मैं कुछ सोच पाता इसके पहले वो रंग भरी बाल्‍टी में ऊपर डाल बैठी, मैं ऑंखे मतला हुआ सामने देखा तो पोरखरे के दूसरे छोर पर तैर कर पहुँची गजगमिनियॉं मुस्‍कुरा रही थी, मगर उसके कहें हुए शब्‍द और पोखरे का सवाल मेरे रंग में भीगें हुए शरीर को भी जला रहा था। एक सवाल छोड रहा था कि क्‍या कभी हम फिर लौट पायेगें अपनी सभ्‍यता और संस्‍कृति की तरफ, फिर कभी हम मना पायेगें अपनी होली उसके  के रूप के अनुसार क्‍या हम फिर जी कभी जी सकेगें अपने रिश्‍तो के साथ, अपने अपनो के साथ, अपने चुलह, हसी ठिठोली के साथ, क्‍या हम दे पायेगें अपने बच्‍चों में बो पायेगें सम्‍भ्‍यता और संस्‍कृति का, रिश्‍तो के अहमित का उनके साथ मिलने वाले आंन्‍नद का बीच, कहा पायेेगें एक सच्‍चे सुख का एहसास या फिर शहर की चकाचौध में, रिश्‍तो के बनावटी पन में, सुखो के बनावटी पन में खो जायेगा सब सु:ख, सच्‍चा जीवन ।
आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ आपका अखंड गहमरी ।

रविवार, 17 फ़रवरी 2019

60 साल पहले गजग‍िमिनयॉं

60 साल पहले।
(दिल्‍ली बनारस बस यात्रा के दौरान)
आज तो मेरी गजगमिनियाँ के पाँव ही जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। मुझे बार- बार वाटस्प काल करके कभी अपना लहँगा दिखाती, तो कभी झुमका, टीका, नथिया। बला सी खूब सूरत लग रही थी वो,लगे भी क्यों न आज तो वह मेरी प्रेमिकाओं के बंधन से निकल कर मेरी प्राणो की प्यासी, अरे स्वारी प्राणो की प्यारी पूरीधांगनी बनने जा रही थी। मैं भी सजा-धजा बकलोलपुर एयरपोर्ट पर टहल रहा था, समय काटे नहीं कट रह रहा था। कभी मोबाइल तो कभी घड़ी में समय देखता। अभी तो पूरे 20 मिनट थे मेरी प्लेन आने में, आज उसे भी दुलहन की तरह सजाया जा रहा था। समय पूरा होने को ही था कि जहर से बुझे तीर की तरह मेरे कानो में फ्लाईट के 4 घंटे देर से आने की सूचना मेरे मामा ने दिया। मैं तो उनके पर पिल ही पड़ा '' बड़ी तारीफ करते थे इस बटेसरी फ्लाईट कम्पनी की, कभी देर नही होती हैं, ये है, वो हैं, अब क्या हुआ ? मेरे मामा अचानक ही मेरे द्वारा लगाये इस बाउंसर को संभाल नहीं पाये, वह मामी रूपी हेलमेट को देखने लगे, मामी के चेहरे से शायद उन्‍हें बोलने की प्रेरणा मिल गई, मेरे द्वारा फेंके गये बाउन्‍सर को वह समझ गये और अपने मुहँ रूपी बैट से प्रहार किया'' भानजे ये तो तकनीकि चीज है कभी भी खराब हो सकती है'' इस में कम्‍पनी की क्‍या गलती? जब किसी चीज का रख्‍ा रखाव ठीक नहीं होगा तो ऐसा ही होगा, कम्‍पनी खोलने से पहले तो यह तरह तरह के दावे करते है, मगर जब हकीकत से सामना होता है तो टाॅय, टॉंय फिस'' मैने उखड़ते हुए कहा। अरे भानजे क्‍यों व्‍याकुल हो रहे हो इतना अपनी गजगमिनियॉं से मिलने के लिए जरा इन्‍तजार करों, मैने भी तुम्‍हारी मामी से मिलने के लिए पूरे 24 घंटे ट्रेन में इन्‍तजार किया '' मामा ने मामी के चेहरे की तरफ देखते हुए कहा। मामा मोदी जी की तरह 60 साल और 70 में क्‍या हुआ जैसी बात मत करों, हमने आज की व्‍यवस्‍था देखी है कल की नहीं। हम तुम्‍हारी तरह शादी के बाद मामी का चेहरा नहीं देखेेगें, हमने तो अपनी गजगमिनियॉं को देख कर ही उसे घुघॅंट में लायेगें। तुम्‍हारी बारात बैलगाड़ी से गई तो क्‍या हम ये आशा करें मेरी भ्‍ाी बारात बैलगाड़ी से जायेगी। अब मामा के माथे पर पसीना आ गया, मामी ने आगे बढ़ कर मोर्चा संभाला, बेटा न परेशान हो तुम्‍हारी गजगमिनयॉं अभी तैयार हो रही होगी, बारात आने का समय 10 बजे का था न तो वह 1 बजे से पहले तैयार नहीं होगी, तुम्‍हारे मामा जब मुझे व्‍याह कर लाये थे तो 3 से 6 पिक्‍चर का टिकट लाते और मुझसे 12 से 3 बताते थे, तब भी फिल्‍म शुरू होने के बाद ही मैं पहुँच पाती थी। मैं तो कुछ सुनने को तैयार नहीं था , मेरी निगाहों में तो बस गजगमिनियॉं ही छाई हुई थी। हाय रे मेरी गजगमिनियॉं कितना इन्‍तजार मेरा कर रही होगी, घूप में उसकी रंगत काली हो रही होगी। सही कहा जाता है कि मामा पर भरोसा करके पचताना, न करके पचताना। मैने मामा से फिर पूछा मामा कहॉं है आपकी ज‍हजिया? अब मामा के सब्र का बाध मोदी जी के सर्मथको जैसा टूट चुका था, मेरी बारात 2 दिन में पहुँची थी बैलगाड़ी से और तुम 1 घंटे बर्दाश्‍त नहीं कर सकते हो, मामा ने आव देखा न ताव चिल्‍ला पड़े। गुस्‍सा मुझे भी आ गया, क्‍यों पैदा हुए आप उस जमाने में जब संसाधन नहीं थे आज की तरह, पैसा नहीं था आज की तरह। आज मेरा जमाना है संसाधन है पैसा है तो मैं क्‍यों देर सहूँ, मुझसे बर्दाश्‍त नहीं होता है। मुझे तुरन्‍त पहुँचना है अपनी गजगमिनियाँ के पास। अब आप पर भ्‍ाी विश्‍वास नहीं करेगें। आप को अब हटाना होगा मुझे अपने साथ से। तभ्‍ाी बगल में मामा के मामा उनके समर्थन्‍ा में बोल पड़े, क्‍यो दोष दे रहे हो इनका, इन्‍होनें तो व्‍यवस्‍था किया ही था तेजी का मगर जब प्‍लेन में खराबी आ गई तो क्‍या करेंगे, क्‍या आज पहली बार किसी प्‍लेन में खराबी आई है क्‍या। अब मेरा दिल टूट रहा था, मैने टूटती सॉंस से कहा '' मामा जी जब प्‍लेन कम्‍पनी ये जानती है थी कि संचालन और वक्‍तव्‍य में अन्‍तर होता है तो उसे दावे नहीं करने चाहिए जैसे नेता चुनाव से पहले देते है। ऐसा कुछ नहीं होता भानजें के भानजें तुम्‍हारी ऑंखो पर अभी मेरी होने वाली बहू का पर्दा पड़ा है तुम कुछ देख नहीं पा रहे हो, मामा ने तुम्‍हारे विवाह में कितना कार्य किया है, ये किया वो किया।
आप भी मामा के मोदी भक्‍त हो गये हो क्‍या, मामा ने जो जो कहा वो किया नहीं, जो हमें चा‍हिए था, जिसके लिए हम उनको अपने साथ लाये, उनकी बातें माने, और आप बाते करते हैं, दुनिया जहान की। मुझे जो चाहिए जिसके लिए मैने मामा पर भरोसा किया वो कहॉं है, मुझे पहले वो चाहिए, बाद में सब। बेटा अगर तुम अपने मामा को अपने साथ से हटा दोगो तो क्‍या आने वाला समय तुम्‍हारी समस्‍या दूर कर देगा, मेरे मामा के मामा ने कहा। तभी मेरे मोबाइल की घंन्‍टी बजी, मैं जल्‍दी से मोबाइल लिया, मेेरे गजगमिनियॉं का वीडियों काल था, वह अपने सूपनखे से चेहरे पर गुस्‍सा लिये बोली, जो आदमी विवाह करने में समय से नहीं पहुँच सकता, जो केवल झूठा वादा करता हो मैं उससे विवाह नहीं कर सकती, आज के बाद फोन मत करना,कहते हुए उसने फोन काट दिया, मैने बहुत ही प्रयास किया मगर फोन नहीं उठा। लानत हो ऐसे प्‍लेन कम्‍पनी पर जिसने अपना वादा पूरा न करके मेरा विवाह तोड़वा दिया। हाय रे मेरी गजगमिनयॉं, हाय रे हाय टूटी मेरी शादी। हो गई मेरी बरबादी। हम भी लुट गये वैसे ही जैसा आज मेरा हिन्‍दू समाज लुट गया, कुछ तो आज के काम की तुलना 60 वर्षो से करके अपने मन को शांति देते हैं। मैं कैसे दूँ, 60 साल तो संसाधन बनाने में निकल गये, और फिर हमें आज के आधुनिक जमाने में 60 साल के कामों से तुलना ही करनी होती तो फिर आप की क्‍यों, कोई भी अच्‍छा है, आखिर वह भी तो कुछ करेगा, सबके अपने अपने दिमाग है। तुलना ही तो करनी है, मैं ही प्रधानमंत्री बन जाता हूँ, आखिर मेरी भी गजगमिनियॉं तो मेरे साथ नहीं है।
अखंड गहमरी, गहमर गाजीपुर ।।

गाजीपुर वाले हो क्‍या

होटल चाहिए भाई साहब,तकधनिया रेलवे स्टेशन उतरते एक अंजान आवाज आई।
नही चाहिए , कह मैं आगे बढ़ गया।
देख लो भाई साहब एक से एक होटल हैं.वह शायद मुझे बड़ा आदमी समझ बैठा और मेरे पीछे पड़ गया।
नहीं भाई नहीं चाहिए, मैं डायमेट्री की औकात रखता हूँ मैं बोल चल दिया।
वह आगे बढ़ मेरा बैग पकड़ देख लो साहब. ।
मुझे गुस्सा आ गया, मगर पीते हुए बोला हाँ चाहिए बोलो दिलाओगे।
हाँ दिलायेगें..कैसा चाहिए ? वह ताव में बोला।
मैने अपनी डिमांड बताई..
वो पूस की सुबह आया पसीना पोछते हुए ऐसा होटल तो नहीं मिलेगा तकधनिया में।
बनवाना होगा मुझे, उसने व्यगंय कसते हुए कहा।
मैं जेब से एक दस का नोट निकाल उसे देते हुए
यह लो जब आदमी कोई निर्माण कार्य, बच्चों का शादी-व्याह करता है तो अपनो और गैर से मदद लेता है.. ये लो 10 रूपये
मेरी तरफ से सहयोग और जब होटल बन जाये तौ एक कमरा मैरा परमानेन्ट बुक रखना।
अब वह कभी मुझे देख रहा था कभी उस नोट को.
बड़ी मुश्किल से वह इतना ही कह पाया
गाजीपुर वाले हो क्या?
मैं मुस्कराते हुए बोला हाँ, मगर वह जबाब सुनने के लिए मौजूद नही थाः मैं सामान उठाया और चल दिया रेलवे डारमेट्री की तरफ।।

पत्‍नी का लाइसेंन्‍स

आज न जाने क्यों एक पुरानी घटना बहुत याद आ रही है।
बात 2004 की है, जब मेरे पुत्र का जन्म नहीं हुआ, पत्नी प्रेग्नेंट थी। मेरे पास एक मारूती वैन हुआ करती थी जो कुछ दिनो से खराब थी और मैं उसे बक्सर शहर में जयप्रकाश चौक के पास एक गैरेज में बनने दिया था। एक दिन पत्नी के रूटीन चेकप के लिए बक्सर डाक्टर अनारकली के पास ले जाना था। मेरे मोहल्ले के ही डा. जितेन्द्र सिंह के ससुर जी जिनका आवास पटना है बक्सर में मेडिसिन स्पलायर थे, भीड़ के बावजूद न सिर्फ तुरन्त निरक्षण करवा बल्कि सारी दवाएं भी काफी रियाती दर पर उपलब्ध करवा दी । हमारी कार गैरेज में बन रही थी, जो मिस्तरी 3 बजे तक देने को कहा था। हम लोग उस दिन ट्रेन से बक्सर आये थे, योजना थी कि मेडिकल चेकप के बाद कुछ मारकेटिंग कर कार से लौटते समय , निकटवर्ती गाँव बारा में डाक्टर अमर सिंह के नर्सिंग होम में एडमिट अपनी चचेरी दादी अस्तुरना देवी पत्नी स्व.लालबहादुर सिंह को देखते हुए गहमर चले जायेगें।
मेडिकल चेकप के बाद हम लोग के उस समय के बक्सर के सबसे बडे वीडियो एवं सीडी कैसेट के होलसेलर बाम्बे वीडियो जिनसे मेरा परिवारिक संबंध भी हो गया था, उनके पास चले गये, वही भोजन उपरान्त पत्नी आराम करने लगी और मैं कार के पास आ गया। कार का एक समान पटना से आकर लगना था, मगर वह शाम 4 बजे तक नहीं आ पाया। मैं आकर बाम्बे भाई को बताया तो वह मुझ पर नाराज होने लगे। उन्होनें मुझे अपनी स्कूटर दिया और अँधेरा होने से पहले घर पहुँचने का फरमान सुना दिया। हम लोग बिना मारकेटिंग किये बक्सर से चल दिये। महज 9 किलोमीटर चौसा आने के बाद वह स्कूटर बिगड़ गई। शाम तेजी से ढल रही थी। उस समय शाम 6 बजे के बाद यादवमोड़ जो बक्सर से 11 किलोमीटर था वहाँ से बिहार सीमा पार कर 11 किलोमीटर यूपी में गहमर आने के लिए कोई साधन नहीं मिलता था। हम लोग परेशान।
तभी बक्सर से यादवमोड जाने वाली एक ऊपर नीचे फुल जीप आती दिखाई दी, उसकी हालत देख कर मदद संभव नहीं लगी।
फिर भी मैने हाथ दिया, वह रूक गई। संयोग था कि उस जीप में बक्सर गहमर के बीच चलने वाले जीप के टाइम टेकर बैठे थे। वह तुरन्त उतरे मेरे स्कूटर को सुरक्षित रखवाया, जीप में जगह वनवा कर पत्नी को बैठाया और मुझे पीछे खड़ा कराया।
यादवमोड़ पहुँचते पहुँचते गहमर के सारे साधन जा चुके थे।
मैं परेशान नहीं हुआ। कहा कि रिक्से से पड़ोसी गाँव 4 किमी बारा चले जाते हैं, वहाँ दादी एडमिट है देख कर वहाँ से कोई व्यवस्था हो जायेगी या कोई रिजर्व जीप ले लेगें। तब तक एक रिक्से बाला जो शायद मुझे जानता था बोला ''बिट्टू भाई न परेशान हो , बारा तक चलो अगर वहाँँ से कुछ नहीं मिला तो हम गहमर छोड़ देगें। सूरज डूब चुका था, हम लोग रिक्से से बिहार की सीमा से निकल उत्तर प्रदेश की पहली पुलिस चौकी बारा पहुँचने वाले थे कि कुछ पहले ही बारा फुटबाल मैदान के पास बनी पुलिया पर बैठे दो वर्दीधारियों ने रिक्शे को रूकने का ईशारा किया। रिक्शा रूका लेकिन 5 कदम आगे, यह उन पुलिसकर्मीयों को नागवार लगा, उन्होनें एक भद्दी गाली रसीद की और मुझको बुलाया।
मैं रिक्शे से उतर कर रिक्से वाले को 5 कदम आगे जाने का ईसारा किया और उनके पास पहुँचा। रिक्से को आगे जाते देख कर आग बबुला हो गये। मुझसे पूछा कहा से आ रहे हो, मैने सब बता दिया।
पुलिसकर्मियों ने कहा'' अच्छी कहानी सुनाई''.। वो सवाल करते रहे है मैं जबाब देता रहा।
रिक्से वाला और मेरी पत्नी दोनो जानते थे कि मेरी बर्दाश्त करने की शक्ति अधिक नही है, दोनो उतर कर पास आ गये।
उनमें से एक ने पूछा जो गाड़ी खराब है उसके कागज कहाँ है?
तभी दूसरे ने पूछा कि अच्छा बताओ कि क्या सबूत है कि यह तुम्हारी पत्नी है?
अब मेरा सब्र टूट चुका था, मैने तेज आवाज में चिल्ला कर पूछा ''शासन ने पत्नी को साथ लेकर चलने में कौन कौन से दस्तावेज लेकर चलना अनिर्वाय किया है?
पुलिसकर्मियों का गुस्सा उफान पर आ गया, वह पुल से उतरना चाहे मगर नशे की अधिकता से उतर नहीं पाये।
अब मामला बढ़ता और रात बढ़ती जा रही थी,
अब मेरे और उनके बीच हाथापाई की नौबत आ गई।
तभी बारा इन्टर कालेज बारा के अँग्रेजी के प्रवक्ता आर.के. सिंह एवं बारा इन्टर कालेज के अध्यापक और आज समाचार पत्र के पत्रकार सलीम मास्टर जो शायद टहल कर लौट रहे थे, हमारी आवाज पहचान कर पास आ गये। सब मामला जाना। और मुझे सीधे रिक्शे पर बैठने को कहा, मैं शिक्शे पर बैठने जा रहा था कि उनमें एक पुलिसकर्मी मेरी तरफ दौड़ा , मैं कुछ बोलता तभी आ.के सर ने उसका हाथ पकड़ा, तब तक काफी भीड़ जमा हो गई थी। जिनमें 80% मुझे पहचानते थे। अब मैं रिक्से से अस्पताल पहुँच गया। वहाँ मौजूद अपनी बुआ किरण और चचा कौशलेंद्र सिंह ऊर्फ गुडु जो आर्मी में थे सारी बात बताया। पहले तो दादी और बुआ दोनो मेरे पर नाराज होने लगी कि इतनी रात तक बहू को इस हालत में क्यों बाहर रखें , पापा मम्मी गहमर नहीं हैं,तो क्या हुआ। तभी मेरे चचा जो बात सुन कर ही गुस्से में भरे थे कहे'' चल सालन के खोज के मारल जाये'', हम लोग प्लानिंग कर ही रहे थे कि डाक्टर अमर सिंह आते दिखाई दिये। मैं नमस्कार करता इसके पहले ही वह काफी कड़क और गम्भीर आवाज में बोले'' नीचे बुलोरो खड़ी है, आप तुरन्त घर जाओ, वाइफ को घर छोड़ कर जो करना हो करना।
हम दोनो चल दिये, हम गहमर पहुँचते इससे पहले ही गहमर में यह घटना पहुँच चुकी थी, मैं पत्नी को लेकर थाने में चला गया। उस समय के दरोगा का नाम नही याद आ रहा मगर मुंशी थे कृष्णा अवतार पांडें और रामदुलार यादव थे सब बात बता कर वही थाने में बैठ गया। सब बहुत समझाये मगर मैं दरोगा के आगमन और पत्नी को साथ लेकर चलने वाले कागजातो के बारे में जाने तक बैठने की जिद कर बैठ गया। तभी गाँव के कुछ लोगों के समझाने और उनके थाने में मौजूद रहने के आश्वासन पर मैं बिजली कि गति से पत्नी को घर छोड़ कर थाने में आ गया। सभी मौजूद थे। तब तक थाने के मुशीं कृष्ण अवतार जी ने वायलेस से पूरी जानकारी ले लिये थे, उपरोक्त सिपाही उनसे भी बद्तमीजी से बात कर रहे थे। तब तक दरोगा जी पहुँच चुके थे, संभवत पी.पी सिंह या ईशा खान में कोई एक थे और मेरे पिता जी के बारे में जानते थे, मुझसे पूछा कि यह घटना उनको पता है मैनें कहा नहीं, टेलीफोन हो रहा था मगर लगा नही( उस समय पिता जी बरहज देवरिया में पोस्ट थे, और माता जी भी वही गई थी, मेरे घर में मात्र 0597265213 फोन था) वह दोनो सिपाही लाये दोनो की यह पहली या दूसरी पोस्टिंग थी। रात में उनकी क्लास लगी, और मुझे सुबह आने को बोला गया। मैं सुबह पहुँचा तो सिपाहियों की भाषा बदल चुकी थी, नौकरी जाने , सजा मिलने का खतरा साफ दिख रहा था, रात की हेकड़ी उतर चुकी थी। दरोगा जी ने एक शब्द कहा आप अपलिकेशन लिख कर दो , कार्यवाही हो जाये।
मैं अपलिकेशन लिखता जा रहा था क्रोध से काँपता जा रहा था, लाल होते चेहरे को देख दरोगा जी घबड़ा उठे, पानी मगाँया पिलाया, हाथ मुहँ धुलाया।
अब मैं नार्मल था फिर अपलिकेशन लिखने लगा, तभी उनमें से एक आकार मेरा पैर पकड़ लिया। मैं सोच में पड़ गया उसी समय माता जी का एक शब्द जो हरदम कहती थी '' बेटा किसी के पीठ पर लात मारना, पेट पर नहीं। मैं अप्लीकेशन फाड़ दिया और दरोगा से बोला आप ही सज़ा जो चाहे दे। सभी मेरी तरफ देखने लगे, चूकि मामला भी बड़ा था अन्त में मेरे मुहल्ले के चाचा जो अब नहीं है महेन्द्र सिंह, जिनका नाम गहमर के इतिहास में अमर है, गाजीपुर, बनारस में शायद ही कोई ऐसा पुस्तक व्यवसायी हो जो उनको न जानता हो, गहमर थाने के सामने किताब की दुकान थी और है भी. बोले की पहले तो यह सिपाही सार्वजनिक रूप से बीटू से और घर जा कर बहू से माफी माँगे और इनका तबादला बारा से कर दिया। इस सब सभी सहमत हुए, उनको वारनिंग देकर , तबादला कामाख्या धाम चौकी किया गया, और माँफी मगवाई गई।
परन्तु आज भी सवाल जिंदा है, पत्नी को साथ लेकर चलने के लिए कौन से कागजात चाहिए?
*अखंड गहमरी*

बापू इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी हम आपको नहीं भूलें। आप के दिये जख्‍़मों की आग में हम आज भी जल रहे हैं-अखंड गहमरी

        बापू इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी हम आपको नहीं भूलें। आप के दिये जख्‍़मों की आग में हम आज भी जल रहे हैं। परन्‍तु आज भी अखंड गहमरी सहित पूरा विश्‍व आपका जन्मदिवस धूमधाम से मना रहे हैं। आज भी हम सब आप के जन्मदिवस पर पूर्व प्रधानमंत्री स्‍व0 लाल बहादुर शास्‍त्री जी को गौण कर आपको राष्ट्रपिता कहते हुए यह भूल कर तिरंगे को गगन में फहरा रहे हैं कि आपने किस तरह तिरंगे के नीचे आने वाले हिन्दुओँ और तिरंगे के नीचे से चाँद-तारे के नीचे जाने वाले लोगो के लिए कैसे अपने रूप को बदला। आप जहाँ कहीं, जिस धर्म, जिस जाति में हैं मेरी तरफ से अपने पूर्व अथवा पूर्व के पूर्व जन्मदिवस की बधाई एवं शुभकामनाएं स्वीकार करें। मैनें पूर्व के पूर्व शब्‍द का प्रयोग इस लिए किया कि मोहन दास करम चंद्र गाँधी के रूप में आप अपनी काया नाथू राम गोड़से जी  की कृपा से 30 जनवरी 1948 को त्याग चुके हैं। 

        उस समय को बीते पूरे 72 साल 9 महीने हो चुके हैं। कलयुग में इतना लम्बा जीवन कम ही लोग पाते हैं और कही मैनें पढ़ा था कि आपके मरने पर देवता भी जमीन पर आकर रो रहे थे तो निश्चित ही आप दुबारा- तिबारा क्या अन्नत काल तक मानव में ही जन्म लेगें इस लिए मैने पूर्व के पूर्व वाक्‍य का प्रयोग किया।वैस देवताओं के आप के मृत्यु पर आने पर मुझे संदेह है, इस लिए क्योंकि जिस व्यक्ति के सर पर देवता होने के साथ लाखो हिन्दूओ के साथ नाइंसाफी करने का तथाकथित आरोप लगा हो देवता तो दूर यमराज भी न आवें, वो अखंड गहमरी जैसे किसी पागल को आपको लेने भेज देगें।
स्व. मोहनदास करमचंद गाँधी जी आपका भारत द्वारा पाकिस्तान को पैसे देने, भारत में मस्जिदो में शरण लिये हिन्दूओं को जाड़े की रात की कपकपाती सर्दी में बाहर निकालने और लाशो की शक्ल में आते हिन्दुओ पर पाकिस्तान के प्रति आप का रूख क्या था। मैने सुना है, पढ़ा है, हाँ देखा भले नहीं कि किस प्रकार आपका आजादी पूर्व से लेकर आजादी के बाद भी आपका योगदान हिन्दुओं के विरोध में कम नहीं था । यदि हिन्द के टुकड़े और सरहद पार से आती लाशों का यदि परीक्षण हो, तो शायद उन लाशों के एक-एक रोम से यही निष्कर्ष निकलेगा कि आप भी उनकी हत्या में शामिल हैं। आपको देवता बनने का शौक था। आप जानते थे कि आज 70 प्रतिशत हिन्दू आबादी उसके साथ है अन्ध-भक्त है, ऐसे में यदि इतनी ही मुसलमानो की आबादी को अपने पक्ष में करने में कामयाब हो जायेगें तो जो अपने द्वारा खीचीं गई सरदह पार भी अपने आपको देवता की श्रेणी में स्थापित कर लेगें। मगर आपकी इच्छा, इच्‍छा ही बन कर रह गई। पाकिस्तान ने जीते जी आपको दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका और तो और आपकी मौत के बाद आपकी अस्थियों को पाक की सिन्धु नदी में विसर्जित तक करने नहीं दिया।
पुराने लोग कहते हैं कि उनके जमाने में बच्चे अपने बाबा-पिता-चाचा तो दूर गाँव के हर आदमी से डरते उनका सम्मान करते, वो आज के जमाने की तरह कलयुगी नहीं होते थे ऐसे में आप जो खुद संस्कारी थे, आप के पुत्र और पौत्र के कुपुत्र होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती तो फिर बी.बी.सी को दिये अपने साक्षात्कार में गोपाल दास गाँधी ने क्यों कहा कि आप के पुत्र देवदास गाँधी ने नाथू राम गोड़से की सजा रूकवाने के लिए पूरे तीन महीने तक प्रयास किया। कोई पुत्र अपने पिता के हत्‍यारे को सजा क्‍यों नहीं दिलवाना चाहेगा यह क्‍या सेाचने का विषय नहीं है।
भारत की आजादी की लड़ाई में लाखों शहीद हो गये, सभी के अपने अपने योगदान थे, कोई शान्तिपूर्ण ढ़ग से, कोई उग्रता को अपना कर तो कोई किसी समूह का नेतृत्व कर अपना योगदान परतंत्रता की बेडियां खुलवाने में दिया। किसी का योगदान कम नहीं था, मगर जिस प्रकार आपको आपके तथाकथित योगदान का प्रतिफल मिला, उसके आगे सभी के योगदान बौने सिद्ध हो गये। 

        आजादी की लड़ाई में अपने अपने से आगे होते क्रांतिकारीयों को मौत के मुहँ में धकेल दिया और अपने स्वभाव और अपने अभिमान को नैतिकता का नाम देकर क्रांतिकारीयों के लिए फाँसी की रस्सी का निर्माण किया। मुझे एक बात नहीं समझ में आई ही नहीं कि आजादी की लड़ाई में भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, मैगर सिंह, सुभाषचंद्र बोस जैसे लाखो उग्र और शांतिपूर्ण आजादी के दिवाने सिपाही अँग्रेजो का शिकार बने वही अपको आपके खतरनाक कामो के बाद भी अँग्रेजो ने केवल बार-बार जेल ही भेज कर छोड़ दिया, न कभी आपको फाँसी की सजा हुई और न कभी अँग्रेज सिपाहियों की गोली आपको छू कर निकली।आजादी के समर में आपके योगदान वास्तव में भूलाया नहीं जा सकता, आपके योगदान को भूलाना माँ भारती का अपमान करने जैसा होगा , परन्तु मगर इतिहास के निष्पक्ष लेखको की माने तो उनके कृत्यों को भी नहीं भुलाया जा सकता।
            आदरणीय मैं सैनिक तो नहीं और न युद्धों के नियम कायदे जानता हूँ परन्तु एक सैनिक बहुल्य गाँव में रहने के कारण लड़ाई का एक निमय जानता हूँ कि हारा हुआ सिपाही, हारा हुआ देश, हारा हुआ राजा कभी शर्त रखने की स्थित में नहीं होता, तो अगर फिरंगियों लड़ाई आपसे हार चुके थे तो फिर कैसे न उन्होंने आजादी के बटवारे की शर्त रखा और मनवाया भी, यही नहीं उन्होंने भारत को आजाद भी नहीं किया, बल्कि 99 साल वर्ष 2046 तक के लिए केवल सत्ता-शासन का हस्तांतरण किया। अब यह भविष्य के गर्भ में है कि 2046 के बाद भी हम आजाद रहेगे या पुनः अंग्रेजो का शासन स्वीकार करेगें। यह तो वही बात हुई आसमान से गिरे खजूर पर लटके।
        आज आधुनिक समाज में जब इतिहास और इतिहासकारों द्वारा श्रेष्ठ लिखे गये कार्यो की विवेचना होने लगी इतिहास के हर पर्त से धूल हटती हुई दिखाई दे रही है। इस हटती धूल के नीचे की चीजों को कोई मान रहा है कोई नहीं मान रहा है।ऐसे परिवेश में जब गाँधी जी आपके जीवन के तमाम राज दूध का दूध पानी का पानी हो रहे हैं, अच्छे -बुरे, जख्म-मलहम, झूठ-सच सब समाने आ रहे हैं, इतिहा और वर्तमान को देखते हुए ये कथन बिल्कुल सत्य हो जाता है कि "बापू हम तुमको नहीं भूले"। हस कर या रोक, आपके दिये जख्मों को नासूर बनता देख कर 'बापू तुमको नहीं भूले।

जय हिन्द
अखंड गहमरी गहमार गाजीपुर।



बापू और गजगमिनियॉं

रात के बारह बजने वाले थे। मैं अपनी डियूटी निभा रहा था। पलंग पर सोई अपनी वाइफ होम के सुन्दर-सलोने पैरो दबा रहा था। कभी-कभी नींद से ऑंखे बंद हो जाती तो वाइफ होम के हाथ मेरे गाल से प्रेम कर बैठते और कुछ देर के लिए निद्रा रानी मुझसे दूर हो जाती। वैसे निद्रा रानी का प्रेम मुझसे कुछ अधिक ही है, वह चली ही आती है। मुझे नींद आ ही गई, मैं बैठे-बैठे सो गया?
बेटा क्या कर रहे हो ? एक बूढ़ी सी काया ने आकर पूछा।
ऑंख नहीं है क्या देखते नहीं ? मैं पत्नी सेवा में व्यस्त हूॅं, मैने झुझलाते हुए जबाब दिया।
बेटा यह काम पुरूषो के लिए नहीं उसने कहा।
जाओ लेक्चर मत दो, ऐसे बोल रहे हो जैसे तुमने यह काम नहीं किया, मैने बुरा सा मुहॅं बनाते हुए कहा।
लगता है तुम मुझे पहचान नहीं पा रहे हो? उस काया ने मेरी तरफ एक सवाल उछाला।
नहीं मेरे पास इतनी फुरसत नहीं जो मैं तुम जैसे को पहचानता फिरूॅं, मैने गुस्से से कहा।
बेटा मैं बापू हूॅं, जिसे तुमने कल यानि 2 अक्टूबर को बड़ी अच्छी बधाई भेजी।
ओह! तो आप बापू है, मेरे पास क्यों आये हैं?
मैं तो तुमसे मिलने आया हूॅं, तुमने ही तो कहा था कि परदेशी लौट के आजा, कल बनेगी दाल तो मैं दाल खाने आया हूॅं।
दाल सुबह बनेगी, सुबह आना जाओ अभी मेरा दिमाग न खाओ, मैने खीजते हुए बोला।
अच्छा ये बताओ टैट का फार्म भर दिये? दो दिन से परेशान हो, उन्होंने संवेदना जताते हुए बोला।
नहीं अभी नहीं भरा गया, कोई आरक्षण वाला इंजिनियर बैठा है साइट डबलप करने। इस लिए रोज साइट क्रैस कर रही है।
बेटा आरक्षण से इतना नाराज क्यों हो, वह तो उनका हक है। वह समाज के दबे कुचले लोग हैं।
ठीक कहा तुमने बापू ये तो उनका हक है मैंने गुस्से से कहा।
गुस्सा क्यों होते हो बेटा, इससे तुमको क्या परेशानी है, मेहनत करो उनसे अधिक काम करो।
ठीक कह रहे हो बापू, मेहनत और पैसे तो केवल सवर्णो के पास है, उसमें गरीब, बेसहारा लोग तो हैं नहीं।
संख्‍या तो दलितो की अधिक है, परेशान तो सबसे अधिक वह है, बापू ने मेरी बात का जबाब देते हुए कहा।
ठीक है आरक्षण को खत्म मत करो बल्कि और बढ़ा दो, लेकिन एक काम करो, मैने अपने रूख को नम्र करते हुए कहा।
बोलो क्या करें ? बापू ने मेरी तरफ प्रश्‍न उछाल दिया।
बापू इतनी व्यवस्था कर दो कि भारत के सभी नेता और आरक्षण पाने वाले आरक्षण प्राप्त डाक्टरो से ही इलाज करायेगें, वह विदेश इलाज के लिए नहीं जा सकते और ना ही समान्य वर्ग के अस्पताल में जा सकेगें। संविधान में ऐसा संसोधन कर दो।
मतलब ? बापू ने मेरी तरफ देखते हुए कहा।
अभी आगे सुनो बापू, मतलब वतलब बाद में पूछना।
सभी नेताओं के बच्चे और आरक्षण पाने वाले, आरक्षण प्राप्त अध्यापको से ही पढ़ेगें वह किसी समान्य जाति के न स्कूल-कालेजो में न पढ़े। ये भी संविधान में डलवा दो।
ऐसा कैसे हो सकता बापू को अब मेरी बात पर गुस्सा आ रहा था।
क्यों नहीं हो सकता है मैने भी थोड़ा गुस्से में कहा।
हो सकता है प्लेन,ट्रेन,बस सब नेताओं एवं आरक्षण पाने वाले तथा न पाने वालो के लिए अलग हो।
मैं तुम्‍हारी बात का मतलब नहीं समझ पा रहा हूँ गहमरी, मेरा सिर पट रहा है साफ- साफ कहो, बापू परेशान होते जा रहे थे।
तब तो पता चले।कितनी योग्‍यता है, और अयोग्‍य कैसे योग्‍य बनते हैं, जब आरक्षण वाले डाक्‍टरो से हारेगी नेताओं की जिन्‍दगीयॉं तभी तो ऑंख खुलेगी। मैं अपने रय में बोले जा रहा था।
यह बात गहमरी जो तुम बोल रहे हो वह कितनी व्यवहारिक है ऐसा कैसे हो सकता है, बापू ने कहा।
क्यों नहीं हो सकता है? कम नम्बर पाकर योग्य होना यह कहॉं का व्यवहारिक है बापू? मैने भी उसी आक्रोश में बोल पड़ा।
क्यों नहीं हैं वह समाज के दबे कुचले लोग हैं बापू फिर बोल पड़े।
बापू तुम्हें लोगो के जेब में, बैंक के लाकरो में, फाईलो और मेज के नीचे, तिजोरीयों में रहते रहते अॅंधेरे की आदत पड़ गई है तुम्हें बाहर की रौशनी नहीं दिखाई देगी, अब मेरा गुस्सा सॉंतवे आसमान पर था।
बापू को मेरी बात लग गई, बोले होश में रहो गहमरी, अपनी औकात से बढ़ रहे हो, मेरे बिना आज तुम्हारे जीवन की कल्पना ही बेमानी है, मैं अॅंधेरे में रहता हूॅं ताकि तुम उजाले में रहो।
बापू जिस उजाले की बात तुम कर रहे हो वह उजाला तो तुम काफी पहले छीन चुके हो, नर्क बना दिया तुमने हिन्दूओं और हिन्दुओं में सवर्ण की जिन्दगी, नर्क बना दिया है। हम तो सूरज के उजाले को भी बादलो के रहम पर पा रहे है, आरक्षण रूपी काले घने बादलो से निकल कर जो हल्‍का सा उजाला आ रहा है उसी से जिन्‍दा है।
अब बापू जान चुके थे कि इस बार पंगा जवाहर से नहीं, अंग्रेजो से नहीं बल्कि एक सिरफिरे अखंड गहमरी से पड़ गया है, धीरे से बोले तुम्हें समझाना ही व्यर्थ है, तुम देश और दलितो के दुश्मन हो, मैं जा रहा हूॅं।
मैं जोर से बोला रूको-रूको कहॉं जा रहे हो अभी तो मेरी बात ही नहीं शुरू हुई।
मैं जोर से बोले जा रहा था।
तब तक मेरी कमर पर एक जोर दार प्रहार हुआ मैं पलंग के नीचे गिर चुका था।
मेरी पत्नी रणचंडी का रूप ले चुकी थी, बापू के चक्‍कर में मेरा हाथ उसके पैरो से बढ़ कर उसके गले तक पहुँच चुका था।
एक काम तुम से ठीक से नहीं होता, पॉंव दबाते दबाते मेरा गला दबाने चल दिये, भागो यहॉं से।
मैं पलंग के नीचे गिरा कभी अपनी चोट को देख रहा था, कभी अपनी रणचंडीका बनी पत्‍नी को, कुछ समझ में नहीं आया धीरे से गेट खोला और बाहर आकर जमीन पर बिस्तर बिछाया और लेट कर बापू और बापू के आरक्षण युक्त भारत के बारे में फिर सोचने लगा जिसका कोई अंत नहीं था।
अखंड गहमरी, गहमर, गाजीपुर

गजगमिनियॉं है दोषी

रावण के साथ जल गई सैकड़ो परिवार की जिन्‍दगीयॉं। हम एक दूसरे पर दोषारोपण करते रह गये। दोषी कौन था इसकी तलाश करते रह गये। सही पूछीये तो दोषी न रेल प्रशासन है, न वह ड्राइवर, न पुलिस, न प्रशासन और ना ही आयोजक। दोषी तो मैं हूँ, अखंड दोषी है इस घटना का,क्‍योंकि वही तो गया था, अपनी गरीबी भूल चंद खुशियों के पल जीने को, ढेले पर बिकते चाट-पकौड़े को पॉंच सितारा होटल के लजीज व्‍यंजन की भॉंति खाने को। वह अखंड भूल गया था कि एक-एक मत पाकर, जिले के, प्रान्‍त के और देश की कमान संभालने वालो की सुरक्षा में लगे सैकड़ो शासन-प्रशासन के कर्मचारीयाें को गरीब जनता की सुरक्षा से कोई सरोकार नहीं।
हादसो का क्‍या है होते रहेगें, जिसका लिखा है वह जाता रहेगा, यह होनी-अनहोनी तो सब काल का चक्र है, इसके लिए क्‍यों कोई दोषी। दोषी हो भी कैसे अखंड जैसे गरीबो के लिए तो संविधान में इतने छेद हैं जिसको देख कर शायद चलनी भी शर्म से पानी-पानी हो जाये।
अखंड को समझना चाहिए था कि रेलवे ट्रैक रेल के लिए होता है, इंसानो के लिए नहीं, उसे समझना चाहिए था कि रावण के जलने के बाद होने वाले धमाको से बचने के लिए वह कहॉं जायेगा। ये गलती उसकी है कि वह ट्रेन की आवाज क्‍यों नहीं सुना। आयोजक, पुलिस तो मुख्‍यअतिथि के सेवा में रहेगें, वह तो बिन बुलाया मेहमान है, जो शायद आयोजको को एक रूपये चंदा भी नहीं दे सकता, ऐसे में अखंड किस अधिकार से किस हक से अपनी सुरक्षा के लिए शासन- प्रशासन पर निर्भर है। दोष अखंड का था सजा उसे मिली, खुद को गँवाकर, अपने परिजनो को गवॉं कर, अपने अंग भंग करा कर। उसे तो खुश भी होना चाहिए कि उसकी गलती पर भी लाशो के सौदागर उसकी लाशो को रूपये से उसे तौल रहे हैं। दिन रात खोज रहे हैं कारण इस घटना का, अपने घर से घटना स्‍थल एक किये हैं, एक दूसरे पर दोषारोपण जैसा महान कार्य कर रहे हैं, ऐसे में आप उनके इस महान कार्य को समझे, उस पर पानी न डाले, उनकी भावनाओं उनके अरमानो को उनपर दोषरोपण कर व्‍यर्थ न जाने दें। मैं जनता से अपील करता हूँ कि गलती किसी की नहीं, गलती केवल उस पागल अखंड की हैं जो अपने खुशियों के चंद पल तलाशने अपने पैरो पर गया था और न जाने किस पर लौट कर आया, अपने घर को सूना कर, चिरागों को बुझा कर।

रेल राज्‍यमंत्री जी

वर्षो बाद आज माननीय रेल राज्‍यमंत्री जी सकलडीहा से बारा तक करोड़ो रूपये की परियोजनाओं का लोकापर्ण और शिलान्‍यास किये। बहुत ही अच्‍छी बात है , खुशी हुई कि आज चार साल 6 महीने के बाद माननीय मनोज सिन्‍हा जी ने गाजीपुर के पूर्व सांसद राधेमोहन सिंह द्वारा जनवरी 2014 में स्‍वीकृत कराये गये गहमर रेलवे स्‍टेशन की लम्‍बाई एवं सुन्‍दरीकरण के कार्य को पूरा किया । वैसे भी मनेाज सिन्‍हा का इन्‍तजार गहमर गाँव बहुत दिनो से कर रहा था। आज मनोज जी सरकारी कार्यक्रम के तहत गहमर आये और गहमर की जनता की आशाओं पर कितना खरा उतरे वह तो गहमर की जनता ही बता पायेगी क्‍योंकि हम तो ठहरे विरोधी खेमा, हर बात गलत ही लगेगी। वैसे आज मनोज सिन्‍हा जी का यह लोकापर्ण और शिलान्‍यास का सरकारी कार्यक्रम मेरे गले नहीं उतरा। अमृतसर में 19 अक्‍टूबर की रात रावण दहन के दौरान हुए हुए रेल हादसे को अभी 40 घंटे भी नहीं बीते। लोगो की माने तो 13 अप्रैल 1919 के यह दूसरा जलियावाला बाग कांड था। जिसमें सैकड़ो लोग अपनी जान गँवा बैठे। सैकड़ो अपाहिज हो गये। सैकड़ लोग अस्‍पताल में जिन्‍दगी और मौत के बीच में फँसे हुए हैं। ऐसे समय में माननीय मंत्री जी का यह कार्यक्रम मानवीय संवेदनाओं की हद में कहाँ तक उचित है मुझे समझ में नहीं आ रहा है। माननीय रेलमंत्री जी शायद यह भूल गये कि आज हर व्‍यक्ति उस घटना को लेकर दुखी है। हर आदमी चाहे वह किसी दल का हो, किसी जाति का हो इस हृदय विदारक कांड को लेकर आहत है।यही नहीं पंजाब में घटना होने के वाबजूद इसका सीधा असर यूपी और बिहार पर पड़ा है, आप जहाँ के प्रतिनिधि हैं वह गाजीपुर, जौनपुर, आजमगढ़ और पड़ोसी राज्‍य बिहार के न जाने कितने घरो के चुल्‍हें बंद हो गये, रावण के साथ जल गया कितनो का सुहाग, कितनो की गोद, माँ दुर्गा के प्रतिमा के साथ विसर्जित हो गये कितनो के अरमान। ऐसे समय में जब माननीय महोदय को अपने विभागीय कर्मचारीयों के साथ कंधा से कंधा मिला कर पूरे घटना पर निगाहें रखते हुए, पीड़ितो को न्‍याय दिलाना चाहिए आप चुनावी आचार संहिता के डर से अपने वर्षो से लंबित पड़े कार्यो को याद करने चले है। माननीय महोदय मृतको को तो लौटा नहीं सकते, मगर आप की कार्य कुशलता आपका अधिकारीयों,कर्मचारीयों के साथ रहना, अस्‍पताल में निगाह रखना कई लोगो की जिन्‍दगीयों को बचा सकता है। माननीय मंत्री जी भले ही यह कार्यक्रम रेल का नहीं था, ड्राइवर दोषी नहीं था, मगर कही न कही इस घटना का जिम्‍मेदार रेल प्रशासन भी है, रेलवे के क्रिया-कलापो में गड़बडी इस घटना की जिम्‍मेदार है। जिससे आप और आपका विभाग, आपके विभाग के अधिकारी अपना पल्‍ला नहीं झाड़ सकते हैं। आपको भी जिम्‍मेदारी लेनी होगी, आप चाहे या न चाहे। आपको आज घटना स्‍थल या दुखी परिजनो के बीच रहना चाहिए, उनके गमो में शरीक होना चाहिए था, ना कि लोकापर्ण और शिलान्‍यास के कार्यक्रम में। माननीय जी घटना में आहत लोग समाज के गरीब तबके से आते थे, रोजी रोजगार की तलाश में परदेश में थे इस लिए आपके विभाग की जिम्मेदारी और अधिक थी, मगर शायद आपकी सोच रही हो कि यह गरीब आपको दे भी क्या सकते हैं।
माननीय मंत्री जी मैं पूरे गाजीपुर जनपद एवं गहमर की जनता की तरह से एक बात अंहकार और अभिमान के साथ-साथ बहुत ही जिम्‍मेदारी से कहना चाहूँगा कि जब 20 नवम्‍बर 2016 को पुरखाया रेलवे स्‍टेशन के पास दलेलनगर के पास इन्‍दौर पटना एक्‍सप्रेक्‍स दुर्घटना ग्रस्‍त हुई तो उस दिन गहमर में पूर्वांचल बचाओं आन्‍दोलन के तहत रेल रोको योजना थी, परन्‍तु जैसे ही इस घटना की सूचना मिली, गहमर गॉंव के लोगो ने इस रेल रोको आन्‍दोलन का विरोध यह कह कर कर दिया कि आज पूरा देश आहत है और आज यदि यह आंन्‍दोलन होता है तो मेरा मंत्री पूरे देश को क्‍या मुहँ दिखाये कि वह जहाँ से सांसद है वहॉं के लोग ही इस प्रकार अमानवीय हो गये है कि उन्‍हें 152 लोगो की जिन्‍दगी से जाने का कोई गम नहीं, वह स्‍वार्थ हैं। इस लिए आज यदि यह आपका कार्यक्रम निरस्‍त भी होता तो सकलडीहा से लेकर गहमर की जनता आप को जितना सिर माथे पर बैठाई है उतना ही बैठा थी। खैर माननीय सिन्‍हा जी आप के लिए मानवीय मुल्‍य कितनी अहमित रखते हैं मुझे मालूम है, लोकसभा का चुनाव हारने के बाद आप गाजीपुर क्षेत्र से गदहे के सींग की तरह गायब हुए, आप उस दौरान आग से तवाह हुए शेरपुर गॉंव में एक दिन नहीं गये, वर्ष 2013 में बाढ़ से त्रस्‍त गाजीपुर जनपद के गॉंवो में एक दिन आपके चरण नहीं गये। 2005 से 2009 तक गहमर के किसान मारे जा रहे थे मगर आपका आगमन नहीं हुआ। 2013 में गहमर के युवको द्वारा किये गये गहमर बचाओ आन्दोलन की आग लखनऊ तक पहुँच गई, मगर उसकी तपिश को आपने महसूस नहीं किया। ऐसे में आपसे मानवीय संवदेना की बात करना बेमानी है।
आप लगे रहें अब चुनाव नजदीक है, मैं आपके द्वारा किये गये विकास कार्यो पर कोई बहस नहीं करना चाहता, क्योंकि मैं विकास दिखाने में यकीन रखता हूँ और समय आने पर दिखाऊँगा भी। मुझे यह महसूस हो रहा है कि गत 2014 लोकसभा चुनावो की थकावट उतर चुकी है, समय कम बचा है 4 साल 6 महीने का कोटा 3 महीने में पूरा करने में लगे रहीये और कामना करीये कि यह चुनाव कोई लहर या कोई ऐसा दाँव लेकर आये जिससे आप की नैया दुबारा पार लगे।
जय हिन्‍द, जय भारत, जय गहमर।